अमेरिकी सेना की वापसी: अफगानिस्तान का क्या होगा
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प्रधानमंत्री के रूप में सितंबर, 2014 में अपनी पहली अमेरिका यात्रा के दौरान न्यूयॉर्क में एक सार्वजनिक सभा में नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को सलाह दी थी, 'हड़बड़ी में अफगानिस्तान से मत जाइए।' संत जैसी यह सलाह उनके उत्तराधिकारी डोनाल्ड ट्रंप को भी बिना शर्त दी गई। ऐसा लगता है कि मोदी की इस दोस्ताना सलाह को कंधे उचका कर झटक दिया गया। ओबामा और ट्रंप, दोनों ही सारे अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर उत्सुक थे। यह अलग बात है कि ये दोनों वापसी के लिए खुद की बनाई समय-सीमा का पालन नहीं कर सके; विधाता ने इस काम को पूरा करने की जिम्मेदारी जो बाइडन को सौंपी। रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स, दोनों ही अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी चाहते हैं।
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अफगानिस्तान वह दलदल है, जहां वियतनाम युद्ध के बाद अमेरिकी फौजी सबसे लंबे समय से फंसे हुए हैं। अमेरिका के सार्वजनिक विमर्श में ऊब और युद्ध की थकान छाई हुई है। आखिर क्यों न हो? बीस खरब डॉलर खर्च करने और तकरीबन 2800 सैनिकों की जान गंवाने के बाद अमेरिका को हासिल क्या हुआ? साफगोई से कहें, तो अफगानिस्तान से उसकी वापसी पिछले पैंतालीस वर्षों में अमेरिका की विदेश नीति की सबसे बड़ी पराजय है! ऐसे में यह लोककथा सच साबित होती लगती है कि कोई भी विदेशी ताकत अफगानिस्तान पर कब्जा करने में सफल नहीं हुई है।
ओबामा के कार्यकाल के बाद से अमेरिका तालिबान के साथ आमने-सामने की वार्ता करने की कोशिश कर रहा है, जिसे उसने 2001 में उखाड़ फेंका था और उसके कई शीर्ष नेताओं को ग्वांतानामो जेल में भी डाल दिया था। पाकिस्तान और कतर, दोनों ने इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई थी। यह विडंबना ही है कि अमेरिका से बात कर रहे तालिबान के कुछ शीर्ष वार्ताकार अमेरिका के पूर्व बंदी हैं! तालिबान की सैन्य क्षमता और देश के बड़े हिस्से में उन्हें मिल रहे कबायली समर्थन तथा निर्दोष लोगों के खिलाफ उनके हिंसक हमले को ध्यान में रखकर राष्ट्रपति अशरफ गनी और उनके पूर्ववर्ती हामिद करजई, दोनों अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि तालिबान अफगान नागरिक हैं, जो कि भटक गए हैं और उन्हें मुख्यधारा की राष्ट्रीय राजनीति में लाया जाना चाहिए बशर्ते कि वे हिंसा छोड़ दें, अल कायदा तथा अन्य आतंकी संगठन से नाता तोड़ लें और खासतौर से देश की महिलाओं और बच्चों के मानवाधिकार का सम्मान करें।
अमेरिका के आखिरी फौजी की वापसी से पहले ही तालिबान ने गांवों और कस्बों पर जिस तरह आसानी से कब्जा किया है, उससे कुछ पर्यवेक्षकों को लग रहा है कि काबुल की सरकार जल्द ही गिर सकती है। 26 जून को जो बाइडन के साथ अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी की मुलाकात ने मौजूदा अफगान सरकार की अंतरराष्ट्रीय वैधता को रेखांकित किया है। बाइडन ने भरोसा दिलाया, हमारी फौज वहां से जा रही है, लेकिन अफगानिस्तान को समर्थन खत्म नहीं हो रहा है। बाइडन ने जो सबसे अहम बात कही है, वह थी, अफगान अपना भविष्य तय करने जा रहे हैं कि वह क्या चाहते हैं।
तालिबान के बढ़ते हमलों के बावजूद अमेरिका वापसी की समय-सीमा पर कायम है। ऐसे में अब अफगान सरकार को अपने भविष्य के लिए खुद से लड़ना होगा। जटिल जमीनी हकीकत और बदलती वफादारियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि अफगानिस्तान सबसे कठिन संभावनाओं का सामना कर रहा है; जिसके नतीजे न केवल अफगानिस्तान के लोगों को प्रभावित करेंगे, बल्कि जिसकी गूंज भारत, पाकिस्तान, ईरान, रूस, चीन और अमेरिका और उसके नाटो सहयोगियों को भी सुनाई देगी। बहुत कम लोग मानते हैं कि तालिबान की दिलचस्पी सत्ता में साझेदारी करने में है, उनका मुख्य लक्ष्य है जितनी जल्द हो सके सत्ता पर कब्जा करना।
यदि वे सत्ता पर दोबारा कब्जा कर लेते हैं, तो क्या वे उन्हीं कायदों के औजारों से शासन करेंगे, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना हुई थी या फिर वे सुधारवादी और कुछ उदार तरीके से शासन करेंगे? तालिबान को पाकिस्तान का समर्थन एक खुला रहस्य है। तालिबान के पिछले शासन में महिलाओं के साथ जिस तरह की बर्बरता की गई थी, उसकी स्मृतियां आज भी ताजा हैं। आज भी वे अफगानिस्तान के समाज का सबसे कमजोर वर्ग हैं। लेकिन क्या 2021 का अफगानिस्तान 2000 जैसा है? वर्ष 2000 में पैदा हुआ बच्चा आज 21 साल का हो चुका है। आमतौर पर वहां के युवा पिछले दो दशक से अपेक्षाकृत सहिष्णु और उदार जीवन जी रहे हैं और सूचना प्रौद्योगिकी की ताकत से वाकिफ हैं और संभवतः तालिबान की ज्यादतियों के सबसे मुखर विरोधी होंगे। तालिबान की इस्लामिक अमीरात की पुनर्स्थापना की कोशिश बेहद विभाजनकारी हो सकती है और उसे चुनौती भी मिल सकती है।
भारत कहता आया है कि अच्छे या बुरे तालिबान जैसी कोई चीज नहीं, दोनों एक ही हैं और तालिबान बुरे हैं (इस धारणा से अमेरिका इत्तफाक नहीं रखता)। अफगान शांति प्रक्रिया अफगानों द्वारा शुरू हो, अफगान के नेतृत्व में हो और अफगानों द्वारा नियंत्रित हो। (विदेश मंत्री जयशंकर ने दोहा में यही कहा था)। लेकिन अमेरिका के वापसी के फैसले और अफगानिस्तान के अंदरूनी हालात ने भारत के लिए तालिबान से संपर्क करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं छोड़ा। कतर के विशेष दूत अल कतानी ने हाल ही में भारतीय अधिकारियों और तालिबान के प्रतिनिधियों की दोहा में हुई मुलाकात की पुष्टि की, तो बहुत से सामरिक विश्लेषक हैरत में पड़ गए। 2018 की शुरुआत में जब रूस ने मॉस्को में अफगान-ताबिलान वार्ता की मेजबानी की थी, तब भारत ने चुपचाप अपने दो राजनयिक वहां भेजे थे।
जयशंकर ने दुसांबे में नौवें हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में कहा था कि भारत अफगान सरकार और तालिबान के बीच वार्ता का समर्थन करता है। 1999 में आईसी-814 विमान के अपहरण में तालिबान की संदिग्ध भूमिका तथा भारत में हमला करने वाले आतंकी गुटों के साथ उसके रिश्ते के बावजूद अफगानिस्तान में अपने हितों की रक्षा, जहां उसने तीन अरब डॉलर का निवेश किया है, तालिबान के साथ कामकाजी रिश्ते रखने की भारत की मंशा को समझा जा सकता है। मगर हमें ध्यान रखना होगा कि तालिबान के साथ यह रिश्ता निर्वाचित सरकार के पतन या उसके कमजोर होने का कारण न बने। अमेरिका, भारत, रूस और ईरान एकजुट होकर अल कायदा और आईएस की वापसी तथा अफगानिस्तान को आतंकियों की सुरक्षित पनाह बनने से रोक सकते हैं।