फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   US in fire of racism

नस्लवाद की आग में अमेरिका

Thu, 04 Dec 2014 08:00 PM IST
मुनीश रायजादा
मुनीश रायजादा Updated Thu, 04 Dec 2014 08:00 PM IST
विज्ञापन
 US in fire of racism

विगत बुधवार को अमेरिका के न्यूयॉर्क में संयुक्त पीठ (ग्रैंड ज्यूरी) ने अश्वेत एरिक गार्नर की मृत्यु के मामले में श्वेत पुलिस ऑफिसर डेनियल पेंटालियो को बेकसूर बताया है। ज्यूरी के इस नए फैसले से अश्वेत लोग सड़कों पर उतर आए हैं। उल्लेखनीय है कि जुलाई महीने में पुलिस ने गार्नर को खुली सिगरेट बेचने के संदेह में बाजार में पकड़ कर जमीन पर पटका दिया था, तथा उनके यह कहने के बाद भी कि उन्हें सांस लेने में दिक्कत हो रही है, उन्हें छोड़ा नहीं। उधर फर्ग्युसन शहर अब भी सुर्खियों में बना हुआ है, जहां 18 वर्षीय माइकल ब्राउन को गोली मारने के आरोपी पुलिस अफसर डैरन विल्सन के खिलाफ एक ज्यूरी ने मामला चलाने से इन्कार कर दिया था। पूरे देश में आग की तरह फैले इन विरोध-प्रदर्शनों ने नस्लवाद से संबंधित अमेरिका की  संवेदनशीलता को फिर से उजागर कर दिया है।

विज्ञापन


असल में, भारत में जातिगत आरक्षण के मुद्दे की तरह ही नस्लवाद अमेरिका में हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है। बेशक अमेरिका ने गुलामों की मुक्ति के लिए चलाए गए अब्राहम लिंकन की दास मुक्ति घोषणा से लेकर एक जनवरी, 1963 को मार्टिन लूथर किंग के नागरिक अधिकार आंदोलन तक एक लंबा रास्ता तय किया है, मगर आज फिर लग रहा है कि देश में नस्लवाद का दानव सिर उठा रहा है। यहां अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय आर्थिक व समाजिक समानता पाने के लिए तरस रहा है। यहां जातीय भेदभाव व जातीय पूर्वाग्रह किस तरह घर बना चुके हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय के लोग लगातार गरीब होते जा रहे हैं, उनमें शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत निम्न है, और रोजगार पाने के लिए उन्हें श्वेतों की अपेक्षा अधिक बाधाएं पार करनी पड़ती हैं।
विज्ञापन


एमर्सन कॉलेज पोलिंग सोसाइटी की इस साल जारी रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में रह रहे 61 फीसदी अफ्रीकी अमेरिकी यह मानते हैं कि देश में दोनों नस्लों के बीच संबंध निरंतर खराब होते जा रहे हैं। जातीय पृथक्करण आधुनिक अमेरिका की एक कड़वी हकीकत बन चुकी है। चाहे न्यूयॉर्क जैसे बड़े शहर हों या स्प्रिंगफील्ड जैसे मझोले शहर, हर जगह श्वेत व अश्वेत आबादी अलग-अलग समूहों में रहती है। शिकागो में तो अफ्रीकी अमेरिकी समुदाय शहर के दक्षिणी हिस्से में रहता है, जबकि अन्य बाकी हिस्सों में। जब बराक ओबामा ने अमेरिका के पहले अफ्रीकी अमेरिकी राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त किया था, तो लगा था कि जातीय भेदभाव व पूर्वाग्रह से मुक्त एक नए अमेरिका का उदय होगा। मगर छह वर्षों का लंबा वक्त बीतने के बाद भी जमीनी हकीकत नहीं बदली है।
विज्ञापन
विज्ञापन


समाजशास्त्रियों का मानना है कि पीड़ितों को न्याय न मिलने की दशा में उनकी हताशा दंगों का कारण बनती है। 1968 में डेट्राइट, लास एंजेलिस, शिकागो व न्यूयॉर्क में हुए भयावह दंगों के बाद स्थापित केर्नर कमीशन ने कहा था कि अमेरिका में श्वेतों व अश्वेतों के रूप में दो अलग-अलग व असमान समाज पनप रहे हैं। यह असमानता की खाई आज 46 वर्ष बाद भी मौजूद है। फर्ग्युसन जैसी घटना ने हमें एक और अवसर दिया है कि हम इस मुद्दे पर चिंतन करें तथा नस्लवाद को खत्म करने की दिशा में गंभीरता से बढ़ें।

(लेखक शिकागो में डॉक्टर और राजनीतिक टिप्पणीकार हैं)

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed