ईरान से दोस्ती की चुनौतियां

चिंतामणि महापात्र/जेएनयू में प्राध्यापक Updated Mon, 25 Nov 2013 08:24 PM IST
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US challenges of friendship with iran

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यह सुखद है कि ईरान अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ तीन दशक पुरानी अपनी शत्रुता खत्म कर रहा है।
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 यह राजनीतिक विरोध हालांकि 1979 में ईरान में हुई इस्लामी क्रांति से शुरू हुआ था, लेकिन पिछले 10 वर्षों में उसके परमाणु कार्यक्रमों ने अमेरिका को सबसे ज्यादा चौकन्ना किया। इस दौरान ईरान के खिलाफ कई बार अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाए गए।
तेहरान में एक के बाद एक आने वाली सरकारों ने अपने परमाणु कार्यक्रमों के संबंध में पश्चिम की शर्तों को मानने से इनकार किया, लेकिन कुछ महीने पहले राष्ट्रपति चुने गए रोहानी ने ईरान की विदेश नीति में बदलाव का संकेत दिया।
इसमें कोई संदेह नहीं कि तेहरान का हृदय परिवर्तन अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण हुआ है, जिसकी वजह से न सिर्फ उसका तेल निर्यात आधे से भी ज्यादा कम हो गया, बल्कि हाल के समय में उसकी मुद्रा का भी करीब 60 फीसदी अवमूल्यन हुआ।

बैंकिंग एवं वित्तीय लेन-देन की सुविधा को खत्म कर देना सबसे सख्त प्रतिबंध है, जिसने शेष दुनिया के साथ ईरान की व्यापारिक एवं व्यावसायिक गतिविधियों को ठप कर दिया।

रोहानी ने चुनाव प्रचार के दौरान और चुनाव जीतने के बाद स्पष्ट संकेत दिया था कि वह ईरान का अंतरराष्ट्रीय अलगाव खत्म करेंगे, परमाणु अप्रसार के इरादों से दुनिया में देश की छवि बहाल करने की कोशिश करेंगे और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाएंगे।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह असैन्य परमाणु शोध एवं विकास कार्यक्रमों के मामले में पश्चिम के आगे झुक जाएंगे। 68वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा में जब वह उपस्थित हुए, तो उनकी दिलचस्पी अमेरिका एवं दूसरे देशों को अपने साथ कारोबार के लिए राजी करने में थी।

उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से हाथ मिलाने से बेशक इन्कार कर दिया, लेकिन टेलीफोन पर उनसे बातचीत की इच्छा जताकर संदेश दिया कि वह कमजोर बनकर समझौता नहीं करेंगे।

एक महीने के भीतर ही ईरान और पी-5+1 यानी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांचों सदस्य देश एवं जर्मनी के बीच जिनेवा में वार्ता शुरू हुई। ईरान ने एक लक्ष्मण रेखा यह खींच दी कि वह यूरेनियम संवर्द्धन का अपना अधिकार नहीं छोड़ेगा।

बदले में पश्चिमी ताकतों ने यह आश्वासन मांगा कि ईरान का यूरेनियम संवर्द्धन एक सीमा से ज्यादा नहीं होगा, ताकि वह परमाणु बम न बना पाए। इस समझौते का विवरण हालांकि सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन अब यह ज्ञात है कि फ्रांस के हस्तक्षेप से विगत आठ नवंबर को एक समझौते पर हस्ताक्षर किया गया हो सकता है।

 अमेरिकी विदेश मंत्री का इस्राइल-फलस्तीन वार्ता से उठकर जिनेवा भागना इसका संकेत था कि समझौते के लिए काफी कुछ दांव पर लगाया गया।

ईरान के पश्चिमी देशों के साथ अब तक जैसे रिश्ते रहे हैं, उस पृष्ठभूमि में जिनेवा वार्ता के पहले चरण के नतीजे से किसी को निराशा नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने इस बात की पुष्टि की कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम के विस्तार को आगे तो नहीं ही बढ़ा रहा है, उल्टे उसने दो हफ्ते के भीतर 20 नवंबर को जिनेवा में दूसरे दौर की वार्ता आयोजित करने में मदद की है!

पूरी दुनिया जिनेवा वार्ता के दूसरे दौर के नतीजों की प्रतीक्षा कर रही है। ओबामा प्रशासन, पुतिन सरकार एवं रोहानी सरकार ने उम्मीद जताई है कि शीघ्र ही एक नया और उपयोगी परमाणु समझौता होने की उम्मीद है।

ज्यादा संभावना इसी बात की है कि समझौते में ईरान को यूरेनियम संवर्द्धन कार्यक्रम सीमित रखने और अपने परमाणु उपक्रमों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की समयबद्ध जांच के लिए खोलने के लिए कहा जाएगा।

इसके बदले में अमेरिका अपने कुछ प्रतिबंध, खासकर विदेशों में करीब सौ अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति पर से नियंत्रण खत्म कर लेगा।

जिनेवा वार्ता के सकारात्मक परिणाम से ईरान के अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एक भयानक दौर की समाप्ति होगी। मौजूदा परमाणु कूटनीति ने पहले से ही इस्राइल एवं अरब देशों को परेशान कर रखा है।

इस्राइल ईरान के साथ अंतरिम समझौते के खिलाफ रहा है और मानता है कि यह ईरानी परमाणु कार्यक्रमों को खत्म नहीं कर पाएगा। उसने जिनेवा वार्ता के पहले नतीजे को 'बुरी सौदेबाजी' भी कहा।

वह न केवल अमेरिकी संसद में ईरान के साथ एक कमजोर समझौते के खिलाफ लॉबिंग कर रहा है, बल्कि अमेरिका के मुकाबले ईरान से कठोर सौदेबाजी करने वाले फ्रांस के नजदीक भी आ रहा है।

विडंबना देखिए कि इस मुद्दे पर अब अरब देश भी इस्राइल के साथ हैं।

सऊदी अरब ने सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट की पेशकश ठुकरा दी और ईरान को रिझाने की अमेरिकी पहल पर नाराजगी जताते हुए अमेरिका के साथ जानकारियां साझा करने से भी इनकार कर दिया। सीरिया में असद सरकार द्वारा रासायनिक हथियारों के कथित इस्तेमाल के खिलाफ सैन्य दंडात्मक कार्रवाई में ओबामा प्रशासन की विफलता ने इस्राइल एवं अरब के गुस्से को दोगुना कर दिया है।

साफ है कि ईरान के साथ अमेरिका के बेहतर रिश्ते वाशिंगटन के पश्चिमी एशिया के आजमाए हुए पुराने सहयोगियों के साथ संबंधों को जटिल बना सकते हैं।

दूसरों की बात छोड़िए, ओबामा प्रशासन के इस परमाणु दांव को अमेरिकी कांग्रेस ही पटरी से उतार सकती है। अमेरिकी संसद ने जब स्वास्थ्य संबंधी ओबामाकेयर, बजट घाटा विवाद और कर्ज सीमा के मुद्दे पर ओबामा प्रशासन का साथ नहीं दिया, तो क्या वह ईरान से नए रिश्ते बनाने पर साथ देगी?

अमेरिकी संसद राष्ट्रपति ओबामा का समर्थन करेगी या इस्राइली दिग्गज नेतन्याहू का, यह वक्त ही बताएगा।
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