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करजई की जिद से नुकसान काबुल का
कुलदीप तलवार
Updated Fri, 13 Dec 2013 07:51 PM IST
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अमेरिका और नाटो फौज का अफगानिस्तान से निकलने का समय जैसे-जैसे निकट आता जा रहा है, अमेरिका और अफगानिस्तान की सरकार के बीच कटुता बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण है, हाल ही में करजई और अमेरिकी सरकार में हुआ द्विपक्षीय सुरक्षा समझौता, जिस पर करजई दस्तखत करना टाल रहे हैं। ऐसे में दोनों के बीच के बेहतर संबंध पटरी से उतर सकते हैं। अमेरिकी फौज की वापसी की प्रतीक्षा कर रहे उनके प्रतिद्वंद्वियों, खासकर तालिबान को फायदा मिल सकता है।
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द्विपक्षीय समझौते के तहत यह तय पाया गया कि 2014 में अफगानिस्तान में आतंकवाद विरोधी अभियान और अफगान फौज को प्रशिक्षण देने के लिए अमेरिका 15 हजार सैनिकों को छोड़कर शेष को वापस बुलवा लेगा। इस समय 84 हजार अमेरिकी फौज अफगानिस्तान में मौजूद हैं। अफगान सरकार ने यह बात भी मान ली कि अगर अमेरिकी बल किसी आपराधिक गतिविधि में लिप्त पाए गए, तो उनके खिलाफ मामला स्थानीय अदालत के बजाय अमेरिकी अदालत में चलेगा। इसके लिए लोया जिरगा की बैठक बुलवाई गई, जिसने गहन विमर्श के बाद इसे मंजूरी दे दी।
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लेकिन उसके बाद करजई ने समझौते पर हस्ताक्षर टालने की यह कहते हुए घोषणा कर दी कि अप्रैल, 2014 में अफगान राष्ट्रपति का चुनाव होना है। इसलिए उसके बाद ही इस पर फैसला लिया जाएगा। यही नहीं, उन्होंने कुछ नई शर्तें भी रख दीं। दरअसल करजई खुद को पक्का राष्ट्रवादी और अफगानियों का मार्ग दर्शक मनवाना चाहते हैं। उनका मानना है कि अगर उन्होंने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए, तो अपना रसूख खो देंगे। हो सकता है कि ऐसे महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले वह अपने उत्तराधिकारी से विचार करें। वह अपने किसी नजदीकी को ही अगला राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं। चूंकि वहां कोई भी शख्स तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकता, इसलिए करजई चुनाव से बाहर हैं।
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दूसरी तरफ अमेरिका ने करजई को चेतावनी दी है कि इस साल के अंत तक उन्होंने या उनके मंत्रिमंडल के किसी सदस्य ने अगर समझौते पर हस्ताक्षर न किए, तो अमेरिका वहां से अपनी सारी सेना निकाल लेगा। नाटो देशों ने भी धमकी दी है कि अगर समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए, तो काबुल को दी जाने वाली आठ अरब डॉलर की माली मदद बंद कर दी जाएगी। अगर करजई सरकार ने दस्तखत नहीं किए और अमेरिका व नाटो देश अपनी जिद पर अड़े रहे, तो इसका काबुल की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। पहले ही अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान का राज खत्म करने के बाद वहां कोई स्थायी व्यवस्था बनाने की गंभीर कोशिश नहीं की। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी खराब है। ऐसे में अगर बाहरी मदद न मिली, तो अर्थव्यवस्था बद से बदतर हो जाएगी। अफगानिस्तान में निवेश करने वालों का विश्वास डिग जाएगा व आने वाली अरबों डॉलर की रकम रुक जाएगी। नतीजतन अफगानिस्तान एक दूसरे के खिलाफ लड़ रहे जातीय गुटों के हाथ में चला जाएगा और गृहयुद्ध जारी हो जाएगा।
दुनिया जानती है कि करजई सरकार का शासन काबुल तक ही कायम है और उसका बाहरी क्षेत्रों पर कोई नियंत्रण नहीं रहा। तालिबान ताक में हैं कि कब अमेरिकी फौज जाएं और वे काबुल पर फिर कब्जा करें। पाकिस्तान दिखावे के लिए कहता है कि वह काबुल में एक स्थायी सरकार के पक्ष में है। लेकिन परदे के पीछे उसकी इच्छा है कि वहां तालिबान के किसी गुट की सरकार कायम हो जाए, जो उसके इशारे पर नाचे। अफगानिस्तान में भारत द्वारा चलाई जा रही परियोजनाएं भी उनको खटकती रहती हैं। करजई के बदले रुख पर पूरी दुनिया अचंभित है। सवाल किया जा रहा है कि अगर इस सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करने थे, तो उन्होंने लोया जिरगा की बैठक क्यों बुलवाई। अब देखना है कि अगले चंद दिनों में करजई और अमेरिका के बीच जारी कशमकश क्या शक्ल लेती है। भारत चाहेगा कि अफगानिस्तान में हालात सुधरें और अमन कायम हो।