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शहरीकरण: शहरों का समावेशी विकास हो ध्येय, आमजन की आजीविका और पर्यावरण का ध्यान जरूरी
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पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी हटाए जाने को लेकर कई विवाद और आंदोलन चल रहे हैं। क्या सही है और क्या गलत, यह अलग विषय है। लेकिन मूल विषय यह है कि जब भी शहरों के विकास की बात आती है, तो पहला कहर झुग्गी-झोपड़ियों या छोटे-छोटे व्यवसायियों पर ही गिरता है। संभवतः ये सुगम लक्ष्य होते हैं, जिन्हें बेदखल करना आसान होता है। उनकी कोई सशक्त आवाज भी नहीं होती और कुछ राजनीतिक उद्देश्यों से उनकी वकालत होती है, किंतु समय के साथ वह भी क्षीण पड़ जाती है।आमतौर पर शहरीकरण का दृष्टिकोण हर व्यक्ति, हर समाज और हर वर्ग के लिए भिन्न होता है। इसमें समग्रता, सततता और संपूर्णता का नितांत अभाव पाया जाता है। वर्तमान में शहरों के विकास की चर्चा में मूलतः सौंदर्यीकरण को प्राथमिकता दी जाती है। सिकुड़ते या लुप्त होते फुटपाथ, उजड़ती हरियाली, बढ़ता धुआं, बेतरतीब बाजारों का विकास, अवैध बस्तियां, विनाशकारी गगनचुंबी इमारतें, अनियोजित नगरीय योजना, अतिक्रमण, जल-मल निकास की अपर्याप्त व्यवस्था, बंद होती नालियां, पर्यावरण के लिए नुकसानदेह परिवहन, अनियंत्रित वाहन बिक्री, बिगड़ती/अनियंत्रित कानून व्यवस्था, शायद यही शहरों की पहचान बन गए हैं।
नीति निर्धारकों एवं कार्यपालिका का संपूर्ण ध्येय या तो शहर को सुंदर बनाना या गाड़ियों के लिए सहज मार्ग विकसित करने तक रह गया है। इसके लिए इन दिनों एक नया चलन चला है- चौराहों को सिग्नल फ्री करने का। लेकिन पैदल यात्री या साइकिल या अन्य पर्यावरण सम्मत साधन कैसे चलेंगे, यह किसी के जेहन में नहीं है। जबकि 80 प्रतिशत से अधिक आबादी अब भी पैदल या सार्वजनिक परिवहन की मोहताज है। स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की दृष्टि से भी निजी वाहनों का उपयोग अनुकूल नहीं है। ऐसे में, सिग्नल फ्री चौराहों की परियोजनाओं पर असीमित व्यय न्यायसंगत नहीं लगते। राजस्थान में कोटा शहर को सिग्नल फ्री बनाने की कवायद तो की गई, लेकिन सार्वजनिक परिवहन को सशक्त बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से समावेशी विकास की ओर कदम बढ़ाया गया है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को भी सिर छिपाने की जगह मिल सके। इससे समावेशी समाज की संकल्पना को साकार करने में मदद मिलेगी। इसी प्रकार छोटे कारोबारियों, रेहड़ी वालों आदि के लिए भी व्यापक कार्यक्रम की आवश्यकता है, ताकि वे निरंतर विस्थापित होने से बचकर अपनी आजीविका कमा सकें। राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में 26 प्रतिशत के भागीदार सूक्ष्म एवं छोटे, अनौपचारिक कारोबारी हैं, जिन्हें अक्सर विस्थापित किया जाता है। जबकि शहरी जीवन के लिए यह वर्ग जीवनरेखा के रूप में कार्य करता है। नई नगरीय योजनाओं में तकनीक सुलभता के बावजूद समेकित सेवाओं का अभाव परिलक्षित होता है। सड़कों, गलियों और उद्यानों में इतनी गाड़ियां होती हैं कि न तो पैदल चलने की जगह रह पाती है और न ही ठीक से सफाई कार्य हो पाता है।
शहरों के विकास में सर्वाधिक अहम भूमिका सार्वजनिक परिवहन की रहती है, जिसके बिना व्यापार एवं सामान्य जीवन निजी वाहनों पर निर्भर रहता है और वातावरण प्रदूषित होता रहता है। हालांकि मेट्रो नेटवर्क के विकास और इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार से थोड़ा सुधार होना शुरू हुआ है। शहरी सार्वजनिक परिवहन को मात्र यात्रा के साधन के रूप में नहीं, बल्कि पर्यावरण, आर्थिक बचत और सामाजिक विकास के साधन के रूप में भी समझा जाना चाहिए।
संभवतः पश्चिम में ऐसा कोई भी विकसित शहर नहीं होगा, जो बिल्डिंग लाइन का अनुसरण नहीं करता हो। वहां सौंदर्यीकरण के साथ-साथ मूलभूत सुविधाओं के विकास पर भी ध्यान दिया जाता है। आज जब हम नए भारत की अवधारणा के साथ विकास की नीतियों का निर्धारण कर रहे हैं, तो हमारा ध्येय समेकित और समावेशी विकास होना चाहिए, जिसके मूल में आमजन, बेहतर पर्यावरण, व्यापक आजीविका के अवसर, सुरक्षित एवं स्वस्थ जीवन हो, न कि मात्र सौंदर्यीकरण। बेहतर जीवन की अवस्थाओं से सौंदर्यीकरण स्वयमेव स्थापित हो जाएगा।