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लोकसेवा: परीक्षा के पैमाने पर समय, सबक और समाज
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Ishita Kishore-Garima Lohia
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अमर उजाला
विस्तार
सिविल सेवा परीक्षा के ताजा नतीजे चर्चा में हैं, इसलिए कि पिछली बार की तरह शीर्ष के चार स्थानों पर लड़कियों का कब्जा है। लैंगिक भेदभाव में जीने के अभ्यस्त समाज को लड़कियों की ऐसी सफलताएं चकित करती हैं। ऐसे में इस परीक्षा की वस्तुस्थिति को तथ्यात्मक ढंग से समझना अपेक्षित है।
विदित है कि यह प्रशासनिक सेवा की सबसे बड़ी और सबसे महत्वपूर्ण परीक्षा है। अन्य की अपेक्षा इस परीक्षा में प्रति वर्ष आवेदक संख्या सर्वाधिक होती है, उनमें बड़ी संख्या मुख्य परीक्षा पास न कर पाने वालों की होती है। साक्षात्कारों में सफल होकर निकलने वाले आवेदकों का प्रतिशत एक से भी कम होता है। चूंकि आईएएस आवेदक के लिए एक स्कूल टीचर से भी कम अर्हता मात्र स्नातक उत्तीर्ण होना भर होता है, अंकाधिक्य का आग्रह भी नहीं होता है। 2022 में 11,35,697 आवेदन आए, लेकिन परीक्षा में बैठने वालों की संख्या घटकर 5,73,735 रह गई, जिनमें से 2,529 साक्षात्कार के लिए योग्य पाए गए और अंततः 613 पुरूष और 320 महिलाएं कुल 933 सफल घोषित हुए थे।
जहां तक महिलाओं के शीर्षस्थ होने की बात है, तो इशिता किशोर से पूर्व टीना डाबी, श्रुति शर्मा और नंदनी केआर टॉपर रह चुकी हैं। भागीदारी की दृष्टि से बेटियां लगभग एक तिहाई यानी 933 में 320 सफल हुई हैं। यह 34 प्रतिशत ही है। यह अनुपात आवेदन संख्या से ही कम है। परन्तु रैंकिग लिस्ट में वे लड़कों को पीछे छोड़ रही हैं। समाज में लड़कों की तुलना में लड़कियों की जो स्थिति है, उसके मद्देनजर वे विगत वर्षों की तुलना में उत्तरोत्तर कमाल की प्रगति कर रही हैं, जबकि वे कन्या भ्रूण परीक्षणों के जबड़ों से आज भी पूर्णतया आजाद नहीं है।
हम इसे जेंडर कम्पटीशन से बाहर रखकर एक लोक सेवक/सेविका के महत्व पर विचार करें, तो ज्यादा सार्थक होगा। ध्यातव्य है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (एनईपी) में सरकार ने भारतीय भाषाओं के प्रति समावेशी अनुरूप भूमिका अपनाई। इसका असर यूपीएससी सहित सभी प्रतियोगी परीक्षाओं पर देखा जा सकता है, जिसमें हिंदी की स्वीकार्यता अभूतपूर्व ढंग से बढ़ी है। भारतीय भाषाओं में पुस्तकें आईं। हिंदी माध्यम की प्रतिभाओं को हौसला मिला। आत्मविश्वास बढ़ा। कला विषयों को भी अवसर बढ़े। भाषायी अवरोध कमतर हुए। महाविद्यालयों में गैर हिंदी भाषी छात्र-छात्राएं भी हिंदी अध्ययन की ओर उन्मुख हुए। सन 1980 तक हिंदी विषय संघ सेवा परीक्षाओं के लिए एक दम अछूत जैसा था।
1982 बैच के डॉ. धर्मवीर संभवतया हिंदी माध्यम के पहले ‘लोक सेवक’ थे, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा पूरी करने के साथ-साथ हिंदी की आत्मा, कबीर के आलोचक सहित हिंदी में दो दर्जन से अधिक स्तरीय पुस्तकें लिखीं। सरकारी स्तर पर हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में पुष्पित-पल्लवित करने हेतु आईएएस हिंदी में आने अपेक्षित हैं। हिंदी में उच्च स्तरीय शोध-अध्ययन के प्रति लगाव के नमूने सामने आए हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय ने 2022 में अपनी स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाया है। संयोग था सिविल सेवा मे 2014 बैच के हिंदी टॉपर रहे निशांत जैन ने डीयू के 2022 के दीक्षांत समारोह में हिंदी साहित्य में पीएच.डी.उपाधि प्राप्त की। इन पंक्तियों के लेखक को स्मरण है कि डॉ. हरिओम ने जेएनयू से हिंदी में पीएच.डी. की थी। उन्होंने चार अप्रैल 2003 को कौशाम्बी के डीएम के बतौर राष्ट्रीय स्तर की एक साहित्यिक संगोष्ठी आयोजित करवाई थी। इन पंक्तियों के लेखक को उन्होंने अपना गजल संग्रह धूप का परचम भेंट किया था। आईएएस की सफलता के चमकते पहलू के उलट एक निहायत धुंधला पहलू भी है, जिसे अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की ओर से अधिक देखा जाता है।
इस बार 2022 के बैच में 154 अनुसूचित जाति(एससी) और 72 अनुसूचित जनजाति (एसटी) उम्मीदवार चयनित हुए हैं। इन श्रेणियों में उच्च शिक्षा में पिछड़े होने के बावजूद आवेदन अनुपात सामान्य से भी अधिक रहा है। कारण ये आज भी राजकीय सेवाओं में ही अपनी सामाजिक सुरक्षा का अनुभव करते हैं, भले ही वह सामान्य सिपाही का ही पद क्यों न हो, परंतु शिक्षा क्षेत्र में, मीडिया में, न्यायपालिका में, कला और सिनेमा में जाने के प्रति वे उदासीन रहते हैं, क्योंकि सामाजिक, सांकृतिक पूर्वाग्रहों के कारणों से स्वायत्त क्षेत्र उनका स्वागत नहीं करते। अपितु उनकी काबलियत पर पूर्वग्रह पूर्ण संदेह कर अघोषित बहिष्कार ही करते रहे हैं।
दुखद है कि एससी और एसटी वर्ग के युवा प्रायः जरूरत होने के बावजूद विकल्प लेकर नहीं चलते। सेवा में रहकर तैयारी करना तो छोड़िए, वे शिक्षण, बैंकिंग, एलआईसी लिपिकीय जैसी सेवाओं को आईएएस से तुच्छ समझते रहते हैं। सिर्फ इस वर्ग के युवा ही क्यों, लोकसेवक बनने की चाहत रखने वाले हर युवा को सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि कोई भी काम बड़ा या छोटा नहीं होता।