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उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे माननीय

Thu, 31 Oct 2013 06:27 PM IST
अनुराग दीक्षित
अनुराग दीक्षित Updated Thu, 31 Oct 2013 06:27 PM IST
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Uproar in Parliament

हाल ही में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विधायिका की मौजूदा तस्वीर पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि भारत के लोकतंत्र में चर्चा (डिबेट), असहमति (डिसेन्सन) और निर्णय (डिसिजन) के बाद हंगामा (डिसरप्शन) चौथा ‘डी’ बन चुका है, जिससे संसदीय लोकतंत्र प्रभावित हो रहा है। कार्यवाहियों में हंगामा तथा दूसरों को न बोलने देना मतदाताओं द्वारा अपने प्रतिनिधियों के प्रति जताए गए भरोसे का हनन है।

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इस साल की शुरुआत में भी प्रणब मुखर्जी ने संसदीय शोर-शराबे पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि इन व्यवधानों से सरकार पर भले ही कोई गंभीर दबाव न बन पाए, लेकिन इससे दूसरे संसद सदस्यों के विशेषाधिकार का हनन तो होता ही है। महामहिम द्वारा चिंता जताए जाने के बावजूद इसी वर्ष लोकसभा के बीते दो सत्रों में बहुमूल्य 166 घंटे व्यवधान की भेंट चढ़ चुके हैं, जो इससे पूर्व के दो सत्रों के मुकाबले अधिक हैं! साफ है कि हमारे ‘माननीय’ राष्ट्रपति की उम्मीदों पर ही खरा नहीं उतर पा रहे, जनता की तो बात छोड़िए।
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कुछ इसी तरह की बातें बतौर राज्यसभा के मुख्य सचेतक प्रणब मुखर्जी ने करीब 12 साल पहले भी कही थीं। ‘विधायिका में अनुशासन’ विषय पर हुए उस सम्मेलन में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, विधानसभा अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और विभिन्न दलों के सचेतकों ने शिरकत की थी। तब ऐसा लगा था, मानो संसदीय व्यवस्था की अब एक बेहतर तस्वीर सामने आ सकेगी, पर तब से लेकर अब तक हालात बिगड़े ही हैं।
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बीते छह दशकों में बैठकों के लिहाज से लोकसभा की तस्वीर निराश ही करती है। पहली लोकसभा में कुल 677 दिन तक सत्र चला था, जो अब तक की सबसे ज्यादा अवधि रही है। जबकि मौजूदा 15वीं लोकसभा में अब तक यानी बीते 14वें सत्र तक कुल 335 बैठकें ही हो सकी हैं। मतलब आधे से भी कम! जबकि व्यवधान तेजी से बढ़ा है। यहां यह याद रखना जरूरी है कि 15वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा हंगामा हुआ है। बीते छह दशक में अधिकांश दल केंद्र की सत्ता में रह चुके हैं। बावजूद इसके बैठकों की संख्या में अपेक्षाकृत इजाफा नहीं दिख सका है।

दरअसल सत्र की ज्यादा बैठकें सरकार और प्रतिपक्ष, दोनों पर ही दबाव बढ़ाती हैं। वे सोचते हैं कि सत्र की अवधि को लेकर जब कोई कानूनी बाध्यता ही नहीं है, तब ज्यादा बैठकों के बारे में क्यों सोचा जाए? यह अजीब है कि जनता से जिम्मेदार नागरिक बनने की उम्मीद करने वाले राजनीतिक दल खुद की जिम्मेदारियां निभाने से बचते हैं। कुछ वर्ष पहले यूपीए सरकार के तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री ने अवकाशों को गिनाकर संसद की बैठक सौ दिन करने की मांग को सिरे से नकार दिया था। हाल में संसदीय समितियों की बैठकों को गिनाते हुए मंत्रालय ने इस विचार को एक बार फिर ठंडे बस्ते में डाल दिया। जबकि वर्ष 1988 तक सौ दिन तक बैठकें हुआ करती थीं। कई देशों में समितियों के बावजूद आज भी अपेक्षाकृत अधिक बैठकें होती हैं। सरकार का यह रुख तब है, जब स्वयं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पूर्व में 120 दिन बैठकों की वकालत कर चुकी हैं!


बढ़ते व्यवधान पर भी आत्मविश्लेषण जरूरी है। मसलन, लोकसभा अध्यक्ष की सर्वदलीय बैठकों में गंभीर चर्चा का आश्वासन अकसर सत्र के पहले ही दिन भुला दिया जाता है! संसद से लेकर सड़क तक राजनेता स्वयं को सबसे ज्यादा जवाबदेह साबित करते हैं, लेकिन वे विधायिका के प्रति अपना उत्तरदायित्व साबित करने में विफल रहते हैं। उन्हें समझना होगा कि सदन में हंगामे से लोकतांत्रिक प्रणाली में लोगों का विश्वास घटता है। उन्हें कथनी और करनी के अंतर को खत्म करना चाहिए। सिर्फ चुनावी लाभ ही राजनीति का एकमात्र मकसद नहीं हो सकता। खुद जनता को भी आगे आना होगा। विधायिका में गंभीर आचरण पर जनप्रतिनिधियों से सीधे सवाल पूछकर दबाव बनाना होगा। यह भी देखना होगा कि राजनीतिक दल राष्ट्रपति द्वारा जताई गई चिंता पर कितनी गंभीरता दिखाते हैं और संसदीय आचरण पर ईमानदारी से कितना काम हो पाता है। सार्थक चर्चा राजनीतिक दलों की प्राथमिकता का हिस्सा बन पाता है या नहीं। इस सबके लिए आगामी पांच दिसंबर से प्रारंभ होने वाले शीतकालीन सत्र पर सबकी नजरें रहेंगी।

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