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दलित राजनीति में उथल-पुथल, मौजूदा दुर्दशा के बावजूद मायावती की अपनी छवि

Mon, 26 Aug 2019 07:03 PM IST
अजय बोस अजय बोस
अजय बोस Published by: अजय बोस Updated Mon, 26 Aug 2019 07:03 PM IST
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Upheaval in Dalit politics
मायावती - फोटो : a

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों दलित संत रविदास के पांच शताब्दी पुराने मंदिर को ध्वस्त किए जाने के खिलाफ दिल्ली और आसपास के दलित समुदाय ने इकट्ठा होकर जिस तरह विरोध किया, उसे मायावती की दलित राजनीति के लिए खतरा बताया जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मायावती ने जहां एक बयान देकर मंदिर को तोड़े जाने की आलोचना की, वहीं पश्चिम उत्तर प्रदेश में सक्रिय भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने दिल्ली में दलितों के विराट प्रदर्शन का नेतृत्व किया।


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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पिछले दिनों दलित संत रविदास के पांच शताब्दी पुराने मंदिर को ध्वस्त किए जाने के खिलाफ दिल्ली और आसपास के दलित समुदाय ने इकट्ठा होकर जिस तरह विरोध किया, उसे मायावती की दलित राजनीति के लिए खतरा बताया जा रहा है। ऐसा इसलिए, क्योंकि मायावती ने जहां एक बयान देकर मंदिर को तोड़े जाने की आलोचना की, वहीं पश्चिम उत्तर प्रदेश में सक्रिय भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने दिल्ली में दलितों के विराट प्रदर्शन का नेतृत्व किया।

हालांकि एक घटना के आधार पर मायावती के बारे में प्रतिकूल राय बना लेना निराधार है। अपने लंबे और संघर्षपूर्ण राजनीतिक करियर में मायावती ने बहनजी का खिताब पाया है। शुरुआत में एक जमीनी दलित कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बों में अक्सर साइकिल पर अपना अभियान चलाया था। तब वह दलित समुदाय की बहनजी मानी जाती थीं। अपने राजनीतिक उत्थान के साथ उन्होंने न केवल अपना कद बढ़ा लिया, बल्कि खुद को लोगों से अलग-थलग भी कर लिया।

लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की मौजूदा दुर्दशा के बावजूद मायावती की अपनी छवि है। उतना ही कड़वा सच यह है कि पिछले एक दशक से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में लगातार हार ने उत्तर प्रदेश समेत देश में मायावती की राजनीतिक पूंजी कम कर दी है।

दलित विद्वान चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, 'बहुत से दलित एक नए नेता की तलाश कर रहे हैं, क्योंकि हाल के दौर में मायावती एक कमजोर नेता के रूप में सामने आई हैं। विरोध रैली और संत रविदास मंदिर के विध्वंस के खिलाफ चंद्रशेखर आजाद का प्रदर्शन बहुत प्रभावशाली था और वह निश्चित रूप से भविष्य में समुदाय का नेतृत्व करने की क्षमता रखते हैं।' अनेक विश्लेषक दलितों के बीच भीम आर्मी प्रमुख के उदय को दलित समुदाय में मायावती की तेजी से घटती लोकप्रियता से जोड़ रहे हैं।

यह कितना सच है, यह तो वक्त ही बताएगा। लोकसभा चुनाव से पहले अपने कट्टर क्षेत्रीय विरोधी समाजवादी पार्टी से गठबंधन ने मायावती के राजनीतिक पुनरुत्थान की उम्मीदें जगाई थीं, जिसे मोदी के रथ ने कुचल दिया। समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन तोड़ने और बसपा में प्रमुख पदों पर अपने परिजनों को लाने के कारण दलित उनसे निराश हुए। सपा के साथ गठबंधन कर लोकसभा चुनाव में शून्य से दस सीट तक पहुंचने के बावजूद बसपा ने जिस तरह सपा से गठबंधन खत्म किया, उससे दलित कार्यकर्ताओं में यह संदेह पैदा हो गया है कि मायावती राजनीतिक पहल करने में न तो सक्षम हैं और न ही इच्छुक।

उत्तर प्रदेश के प्रमुख दलित कार्यकर्ता रामकुमार कहते हैं, 'मुझे डर है कि सपा के साथ गठबंधन तोड़ने के फैसले के बाद, दलित समुदाय तेजी से बहनजी में अपना विश्वास खो रहा है।  दलितों को गंभीरता से यह लगता है कि युवा और राजनीतिक रूप से आक्रामक नेता के उभार का समय आ गया है।' आश्चर्य की बात नहीं कि मायावती युवा दलित नेता के खतरे को भांपते हुए अक्सर बिना किसी उकसावे के चंद्रशेखर आजाद से दुश्मनी बढ़ा लेती हैं।

मायावती के आलोचक कहते हैं कि बहनजी और उनके परिजनों के खिलाफ सीबीआई के पास भ्रष्टाचार के मामले हैं, इसीलिए मायावती का केंद्र सरकार के प्रति रुख नर्म है। दूसरी ओर, खुद मायावती आजाद पर आरोप लगाती रही हैं कि वह सत्ताधारी पार्टी के एजेंट के रूप में उन्हें और उनकी पार्टी को तबाह करने का प्रयास रहे हैं।

इसके विपरीत भीम आर्मी प्रमुख हाल तक मायावती की आलोचना न करने के प्रति सतर्क थे और उन्हें बुआ कहते थे, हालांकि मायावती ने हमेशा उन्हें झिड़का ही। जून के अंतिम सप्ताह में संवाददाताओं से बात करते हुए आजाद ने सपा से बेवजह चुनावी गठबंधन तोड़ने और अपने परिजनों को राजनीति में आगे बढ़ाने के लिए पहली बार मायावती पर सीधा हमला करते हुए कहा कि यह कांशीराम की विरासत और बहुजन समाज आंदोलन के खिलाफ है। यह दलित नेता के रूप में आजाद की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को इंगित करता है, जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों से पहले पुणे में एक शाखा शुरू करने के साथ भीम आर्मी द्वारा इसी महीने लखनऊ में एक छात्रसंघ की शुरुआत करने की योजना बनाए हुए हैं।

फिर भी संसाधनों और संगठनात्मक पहुंच की कमी के चलते आजाद द्वारा फिलहाल बसपा के समानांतर कोई पार्टी बनाने की संभावना नहीं है। मायावती वर्षों के संघर्ष और आंदोलन से यहां तक पहुंची है, जबकि भीम आर्मी ने अभी महज शुरुआत की है। फिर अभी तो यह भी तय नहीं है कि भीम आर्मी दलितों के हक में आंदोलन ही करेगी या अपनी राजनीतिक जमीन बनाने की भी कोशिश करेगी। अगर चंद्रशेखर आजाद की राजनीतिक महत्वाकांक्षा है भी, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता, तो भी भीम आर्मी को बसपा की तरह राजनीतिक पहचान और छवि बनने में बहुत समय लगेगा।

हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि भीम आर्मी दलित समुदाय से जुड़े मुद्दों पर उत्तर प्रदेश के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी जमीनी आंदोलन का नेतृत्व करने का प्रयास करेगी। सच तो यह है कि दलितों के आंदोलन के लक्ष्य से मायावती और उनकी पार्टी पूरी तरह दूर चली गई हैं।
   
राम कुमार कहते हैं, दलितों को सिर्फ चुनावी लाभ पाने के बजाय खुद को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने के लिए सामाजिक आंदोलनों में उतरने की जरूरत है। इस लक्ष्य को हाल के वर्षों में बसपा ने भारी नुकसान पहुंचाया है। इस लिहाज से देखें, तो दिल्ली में चंद्रशेखर की रैली बसपा और मायावती के लिए एक खतरा तो है ही। अब देखना यह है कि मायावती दलित राजनीति में चंद्रशेखर के उभार का मुकाबला करने के लिए क्या करती हैं!
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