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यूपी बोर्ड का नतीजा चौंकाता है

Fri, 07 Jun 2013 10:23 PM IST
अमर दीप तिवारी
अमर दीप तिवारी Updated Fri, 07 Jun 2013 10:23 PM IST
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यूपी बोर्ड ने 12वीं के नतीजों में सीबीएसई को पीछे छोड़ दिया। इस कामयाबी के पीछे के कारणों की पड़ताल के लिए सीबीएसई के चेयरमैन रहे अशोक गांगुली से अमर दीप तिवारी ने बातचीत की -

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-यूपी बोर्ड के 12वीं के परिणाम वाकई में आश्चर्यजनक हैं?

निश्चित रूप से। ये परिणाम आश्चर्यजनक रूप से बहुत अच्छे हैं। यूपी बोर्ड ने न सिर्फ सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड को पीछे छोड़ा है, बल्कि शायद ये नतीजे देश के तकरीबन 40 बोर्ड में सबसे अधिक हैं। दरअसल, मुद्रास्फीति की तरह यह एक तरह से अंकस्फीति है। सवाल यह है कि क्या आपने मूल्यांकन की प्रणाली में कोई बदलाव किया है? या फिर पूछे जाने वाले प्रश्नों के स्तर में कोई तब्दीली की गई? या क्या आपने गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कोई ऐसे कदम उठाए, जिसकी बदौलत इतने अच्छे नतीजे आ गए। अगर ऐसा कुछ भी नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
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-पर इस तरह के सवाल अन्य बोर्ड के नतीजों पर क्यों नहीं उठते?
आईसीएसई बोर्ड और सीबीएसई बोर्ड में पढ़ने वाले बच्चों में काफी हद तक समानता की स्थिति होती है। जैसे, वे लगभग एक जैसे स्कूलों में पढ़ते हैं। वहां पढ़ने वाले बच्चों की क्षमता भी तकरीबन एक जैसी होती है। साथ ही, उन्हें पढ़ाने वाले शिक्षकों के स्तर में भी समानता होती है। पर यूपी बोर्ड में ऐसा नहीं है। यहां कुछ बच्चे बहुत अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां मेधावी बच्चों को ही प्रवेश मिलता है। वहां के शिक्षक बहुत योग्य होते हैं। वहां बच्चों को हर तरह की सुविधाएं मिलती हैं। दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या काफी ज्यादा है और ज्यादातर सरकारी स्कूलों की हालत बयान करने की जरूरत नहीं है। यूपी बोर्ड के बच्चों में चूंकि वैसी समानता नहीं है, इसलिए इसके शानदार नतीजे हमें चौंका रहे हैं।
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- नकल को लेकर यह सूबा काफी बदनाम रहा है। यहां तक कि पड़ोसी राज्यों के छात्र भी यहां परीक्षा देने आ जाते हैं?
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। पर सिर्फ नकल के भरोसे पूरा बोर्ड इतना शानदार परिणाम देगा, ऐसा नहीं है। नकल से बच्चे उत्तीर्ण तो हो सकते हैं, पर वे बहुत अच्छे अंक लाने में कामयाब नहीं हो सकते। जबकि इस साल तो यूपी बोर्ड के बच्चों को बहुत अच्छे अंक मिले हैं। सवाल सिर्फ नकल का नहीं है। अगर किसी भी असामान्य तरीके के इस्तेमाल करने की वजह से ऐसा हुआ है, तो यह हमारे लिए फील गुड नहीं, बल्कि चिंता की बात होनी चाहिए।

- यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षाओं की पद्धति में बदलाव का असर तो नहीं है?
यह वजह भी हो सकती है। दरअसल, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपल आईटी) समेत दूसरे अन्य केंद्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में प्रवेश के लिए अब 12वीं बोर्ड के अंकों का 40 फीसदी और जेईई-मेन्स के अंकों का 60 फीसदी वेटेज देते हुए मेरिट लिस्ट तैयार की जाएगी और इसके आधार पर ही इन संस्थानों में प्रवेश दिया जाएगा। ऐसे में विभिन्न शिक्षा बोर्डों में अपने बच्चों को ज्यादा से ज्यादा अंक देने की प्रतिस्पर्धा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।


- तो क्या अब देश भर में एक बोर्ड की प्रणाली लागू करने का समय आ गया है?
बिल्कुल नहीं। हमें अपने देश के संघीय ढांचे को समझना होगा। उससे छेड़छाड़ की जरूरत भी नहीं है। दरअसल, सबसे पहले हमें काउंसिल ऑफ बोर्ड्स ऑफ स्कूल एजुकेशन को मान्यता देनी चाहिए। फिर विभिन्न बोर्डों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम, परीक्षा तकनीक, स्कोरिंग और पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृत्ति में एकरूपता लाने की दिशा में पहल करनी चाहिए।

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