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बेवजह का विवाद

Wed, 25 Jun 2014 10:48 AM IST
प्रो. यशपाल
प्रो. यशपाल Updated Wed, 25 Jun 2014 10:48 AM IST
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Unnecessary controversy

इन दिनों दिल्ली विश्वविद्यालय में अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिले को लेकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच खींचतान चल रही है। इस खींचतान के केंद्र में है, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पिछले वर्ष से शुरू किया गया चार वर्षीय पाठ्यक्रम। विश्वविद्यालय प्रशासन जहां इसी चार वर्षीय पाठ्यक्रम के तहत छात्रों का दाखिला करना चाह रहा है, वहीं यूजीसी का कहना है कि चूंकि चार वर्षों का यह पाठ्यक्रम राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के प्रारूप (10+2+3) का उल्लंघन करता है, इसलिए कोर्स की अवधि पहले की तरह ही तीन वर्ष रखी जाए।

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अंडरग्रेजुएट कोर्स में दाखिला लेने के लिए जो छात्र आते हैं, वे काफी ऊर्जावान, रचनात्मक एवं कल्पनाशील होते हैं। उनमें नई-नई चीजें सीखने और करने की ललक होती है। छात्रों की इसी कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को लक्ष्य कर दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने पिछले वर्ष से चार वर्षीय अंडरग्रेजुएट कार्यक्रम लागू किया। इसके अनुसार, छात्रों को अनिवार्य रूप से 11 फाउंडेशन कोर्स एवं दो मुख्य विषय पढ़ने होते हैं, जिनमें से एक ऑनर्स का विषय होता है। इसमें छात्रों को कई नई चीजें पढ़ने और जानने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इस कार्यक्रम के लिए कोर्स को ठीक तरह से डिजाइन नहीं किया गया। सिर्फ शिक्षकों ही नहीं, छात्रों के साथ भी व्यापक संवाद के बाद इसके लिए कोर्स तैयार किया जाना चाहिए था। वैसे भी हकीकत यह भी है कि इतनी जल्दी ठीक से पाठ्यक्रम तैयार किया नहीं जा सकता। कोर्स डिजाइन करने में काफी वक्त लगता है। नतीजतन छात्रों पर पढ़ाई का दबाव बढ़ गया और विरोध की आवाजें उठने लगीं।
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लेकिन अब जो कहा जा रहा है कि इस चार वर्षीय कार्यक्रम को खत्म कर फिर से तीन वर्षीय पुराना कार्यक्रम लागू करना चाहिए, वह मेरी समझ से ठीक नहीं होगा। अगर नए कार्यक्रम से छात्रों को नई चीजें सीखने को मिल रही हैं, तो इसमें बुराई क्या है? जहां तक चार वर्षीय कार्यक्रम में त्रुटियों का सवाल है, तो वे ऐसी नहीं हैं, जिन्हें ठीक नहीं किया जा सकता। बेशक उसमें समय लगेगा, लेकिन उसे सुधार कर लागू किया जा सकता है। हर नई चीज की शुरुआत के साथ गलतियों एवं त्रुटियों की संभावना रहती है, तो क्या नई शुरुआत की ही नहीं जाए? जहां तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 के प्रारूप के उल्लंघन का मामला है, तो मैं समझता हूं कि यह निरर्थक तर्क है। आज दुनिया कहां से कहां जा रही है और हम हैं कि पुराने कायदों को पकड़ के बैठे रहना चाहते हैं। अगर बच्चों को इस नए कोर्स से नई-नई चीजें सीखने को मिल रही हैं, तो क्या शिक्षा नीति के प्रारूप में बदलाव नहीं किया जा सकता है? शिक्षा का उद्देश्य ही होता है, बच्चों को नई-नई जानकारियों से अवगत कराना। इसलिए यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और दिल्ली विश्वविद्यालय को मिल-बैठकर इस पर फैसला करना चाहिए। दोनों पक्षों को यह ध्यान में रखना चाहिए कि वे जो भी फैसला लें, उनमें छात्रों का हित शामिल हो और छात्रों के लिए पढ़ाई बोझ की तरह न हो। इसे आत्मसम्मान या राजनीति का विषय नहीं बनाना चाहिए।
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नेशनल रिसर्च प्रोफेसरशिप के तहत देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में छात्रों के आग्रह पर मुझे पढ़ाने के लिए बुलाया जाता रहा है। उस दौरान मैं छात्रों से खुलकर बात करता था कि उन्हें क्या पढ़ना अच्छा लगता है और वह क्या जानना चाहते हैं। इस संवाद से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला। असल में जितनी रचनात्मकता और कल्पनाशीलता छात्रों में होती है, उतनी पढ़ाने वाले शिक्षकों में नहीं। वैसे भी जितनी नई खोजें दुनिया भर में हुई हैं, उनमें से ज्यादातर युवाओं ने की हैं। मेरा तो मानना है कि ज्ञान दिया नहीं जाता है, बल्कि बांटा जाता है। इसलिए इस विवाद को बेवजह खींचने के बजाय दोनों पक्षों को छात्रों के साथ संवाद कर इस कोर्स को और लाभप्रद बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

अगर कोई कहता है कि इस खींचतान में छात्रों का समय बर्बाद होता है, तो उन्हें समझना चाहिए कि जिज्ञासु लोगों के लिए समय कभी बर्बाद नहीं होता। क्या होगा अगर एक साल परीक्षा नहीं होगी? मैं अपनी बात बताता हूं, पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र में मेरी तबीयत बेहद खराब हो गई थी। मेरी मां मुझे खींचकर जबलपुर ले जा रही थी। रास्ते में जाते हुए मैं यह सोचकर उदास था कि मेरा एक साल बर्बाद हो गया। मैं उसे कैसे पूरा कर पाऊंगा। उसी बस में एक किसान भी सवार था। उसने मुझे चुप-चुप और उदास देखकर इसका कारण पूछा, तो मैंने उसे समय खराब होने की बात बताई। उसने हंसते हुए कहा, समय कभी खराब नहीं होता, आप चाहो तो कुछ नई चीजें सीख सकते हो। यकीन मानिए, उस दौरान मैंने कई सारी ऐसी किताबें पढ़ीं, जो कभी मैं पढ़ नहीं सकता था, क्योंकि उन किताबों का मेरे कोर्स से कोई लेना-देना नहीं था। लेकिन उन किताबों ने मेरी सोच को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई और बहुत सारी नई चीजें मुझे सीखने को मिलीं।


दिल्ली विश्वविद्यालय के पास पाठ्यक्रम निर्धारण, शिक्षण की प्रवृद्धि और पाठ्यक्रम की अवधि का निर्धारण करने के लिए कार्यकारिणी समिति, शैक्षणिक समिति और अध्ययन परिषद हैं। वह इस कार्यक्रम में जरूरी सुधार करने में सक्षम है। जहां तक बुनियादी संरचनाओं की कमी का सवाल है, तो उसे दूर किया जा सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी उदारवादी संस्थान है। कुछ लोग आयोग के इस संदर्भ में दिए गए ताजा निर्देश को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में दखल बता रहे हैं, लेकिन यह भी मामले को बढ़ा-चढ़ाकर देखने जैसा है। एक लोकतांत्रिक देश में किसी भी स्वायत्तशासी संस्था को कोई रौंद नहीं सकता।

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