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संत बाजिल की अनूठी निर्भीकता

Sun, 04 Aug 2013 08:33 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Sun, 04 Aug 2013 08:33 PM IST
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Unique spirit of Saint Bajil

रोम में एक संत थे बाजिल। वह लोगों को सदाचार और धर्म के अनुसार चलने की प्रेरणा देने के साथ ही अन्याय के आगे न झुकने पर भी जोर देते थे। रोमन सम्राट बहुत दुर्व्यसनी और अत्याचारी था। उसके कर्मचारी प्रजा पर जुल्म करते थे। जो कोई राजा का विरोध करता, उसे फांसी पर लटका दिया जाता।

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राजा के अत्याचारों की घटनाएं सुनकर संत बाजिल ने खुलकर उसका विरोध शुरू कर दिया। राजा तक यह बात पहुंची। वह जानता था कि संत का जनता पर अमिट प्रभाव है। यदि उनके साथ सख्ती की गई, तो प्रजा विद्रोह पर उतारू हो जाएगी।
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राजा ने अपने दूतों द्वारा उन्हें संदेश भिजवाया कि आप कुटिया में रहकर दयनीय जीवन बिता रहे हैं। आपके नाम संपत्ति कर दी जाएगी। जीवन आनंदमय बीतेगा। राजा का विरोध बंद कर दो। एक दूत ने यह भी धमकी दे डाली कि यदि राजा अपनी मर्जी पर उतर आया, तो आपको देश से निकाल देगा।
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संत बाजिल ने राजा को संदेश भेजा, मैं इस देश की प्रजा का दिया खाता हूं। मेरा कर्तव्य है कि उसकी रक्षा के लिए तत्पर रहकर अत्याचारों के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देता रहूं। राजा मेरे शरीर को नष्ट कर सकता है, आत्मा को नहीं।


यह बात सुनकर राजा का विवेक जाग उठा। पहली बार उसका पाला एक निर्भीक महात्मा से पड़ा था। वह स्वयं उनकी कुटिया में पहुंचा और भविष्य में अत्याचार न करने का संकल्प लिया।

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