चुनावी शोर में अनसुनी चीख
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अपनी आंखों के सामने आधे घंटे के भीतर ओले गिरने के कारण हरी-भरी फसल बर्बाद होने से बड़ी विपत्ति किसी किसान के लिए और क्या हो सकती है! कुछ ही मिनटों में फसल के साथ किसानों की तमाम उम्मीदें और आकांक्षाएं ध्वस्त हो जाती हैं। ऐसे में सिर्फ फसलें ही बर्बाद नहीं होतीं, बल्कि किसानों का जीवन भी बर्बाद हो जाता है। पिछले तीन हफ्ते में मध्य प्रदेश में 24 लाख हेक्टेयर, महाराष्ट्र में 18 लाख हेक्टेयर फसल बर्बाद हुई है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक एवं तमिलनाडु से भी भारी नुकसान की खबरें हैं।
लोकसभा चुनाव के पहले चरण में अब कुछ दिन ही बचे हैं, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि चुनाव प्रचार से किसानों की समस्याओं का मुद्दा सिरे से गायब है। कोई भी राजनीतिक दल कृषि या किसानों की समस्याओं के बारे में अपनी सभाओं में बात नहीं कर रहा है। राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में जरूर रस्मी तौर पर किसानों के हितों की बातें होंगी, लेकिन कृषि विकास और किसानों के हित के लिए कोई ठोस रणनीति शायद ही होगी। अगर ऐसा होता, तो आज देश के किसान इतने बदहाल नहीं होते।
कृषि मंत्री शरद पवार के लिए यह कहना आसान है कि भारी वर्षा और ओले गिरने से फसल की बर्बादी कोई नई बात नहीं है। इसलिए वह किसानों से साहस दिखाने की अपील करते हैं। लेकिन जिन लाखों छोटे किसानों ने अपने परिवार का पेट भरने के लिए अनथक मेहनत की, उनका सबकुछ बर्बाद हो गया। मध्य भारत में पिछले तीन हफ्तों के दौरान भारी वर्षा और तूफान के चलते खड़ी फसलों की जो बर्बादी हुई, उसके कारण बुंदेलखंड क्षेत्र में 43 और महाराष्ट्र में 37 किसानों (गिनती अब भी जारी है) ने आत्महत्या कर ली। तूफान की भयावहता का पता इसी से चलता है कि करीब 900 पशु भी मारे गए हैं। जिन किसानों में आत्महत्या करने की हिम्मत नहीं है, उनकी घरेलू अर्थव्यवस्था को इस प्राकृतिक आपदा ने तीन साल पीछे धकेल दिया है। पहले से ही कर्ज में डूबे किसानों के लिए जीवन पहाड़ जैसा हो गया है।
विडंबना देखिए कि जो कृषि मंत्री गन्ने के नुकसान पर ज्यादा चिंतित दिखाई देते हैं, वही कहते हैं कि असामान्य बारिश और विनाश कोई नई बात नहीं है और किसानों को साहस दिखाना चाहिए। इससे पहले कि नुकसान के आकलन के लिए विशेषज्ञ दल गठित किया जाता, शरद पवार ने घोषणा कर दी कि गन्ने की 15 फीसदी खड़ी फसलों का नुकसान हुआ है। यहां तक कि उन्होंने चीनी मिलों को हुए नुकसान की भी बात की। लेकिन बाकी प्रभावित किसानों के लिए उनकी सलाह है कि इस सामूहिक नुकसान का सामना वे बहादुरी से करें। हालांकि नुकसान के आकलन के लिए मंत्रियों के एक समूह का गठन किया गया है।
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश, दोनों राज्यों ने किसानों को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए पांच-पांच हजार करोड़ रुपये की मांग की है। अनुमानित नुकसान का आंकड़ा बढ़ेगा, जब अन्य राज्यों से भी आंकड़े आएंगे। लेकिन पिछले अनुभवों के आधार पर कहा जा सकता है कि फसल नुकसान का मुआवजा शायद ही किसानों को राहत देने वाला हो। हमारे सामने ऐसे भी उदाहरण हैं, जब किसानों को एक से लेकर 20 रुपये, 95 से 1,470 रुपये और तीन हजार से पांच हजार रुपये मुआवजे के रूप में दिए गए। महीनों के इंतजार के बाद जब किसानों को मुआवजे का चेक मिला, तो वह बैंक में जमा करने के लायक नहीं था। इससे यही पता चलता है कि हमारे देश में खेतिहर समुदाय के साथ कितना अपमानजनक और क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है।
वर्ष 2007 में दुनिया के सबसे बड़े मौसम-आधारित फसल बीमा कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी। वर्ष 2012-13 में 15 राज्यों में इसका विस्तार करते हुए करीब एक करोड़ बीस लाख किसानों को इसमें शामिल किया गया। इससे पहले 1972 की शुरुआत में कई फसल बीमा योजनाएं शुरू की गई थीं। वे सारी योजनाएं पायलट प्रोजेक्ट स्तर तक ही रहीं, क्योंकि उन योजनाओं ने जोखिम को खत्म नहीं किया, बल्कि समय और स्थान के आधार पर जोखिम का प्रबंधन करती रहीं। ये योजनाएं वास्तविक नुकसान के मुकाबले सूचकांक के आधार पर या ब्लॉक स्तर पर हुए वास्तविक नुकसान के बजाय औसत दर से मुआवजा देती रहीं।
मुझे नहीं पता कि इन फसल बीमा योजनाओं की क्या उपयोगिता है। फसल बीमा एजेंसियां या कंपनियां किसानों को हुए वास्तविक नुकसान का आकलन आखिर क्यों नहीं करतीं? यदि हर आदमी के जीवन का बीमा, यहां तक कि सुदूर गांवों में रहने वाले लोगों का भी, हो सकता है, तो वही व्यवस्था फसलों के लिए क्यों नहीं लागू की जातीं? यदि चोरी, आग या प्राकृतिक आपदा के खिलाफ हर घर का बीमा हो सकता है, तो उसी तरह से फसलों का बीमा क्यों नहीं हो सकता? बीमा एजेंसियों को क्यों किसी एक क्षेत्र में ही फसलों की बीमा की मंजूरी दी जानी चाहिए? इसका उत्तर स्पष्ट है कि सरकारें इसके लिए उत्सुक नहीं हैं।
ऐसा तभी हो सकता है, जब एक राष्ट्रीय किसान आय आयोग का गठन किया जाए, जो किसानों को सुनिश्चित मासिक आय प्रदान करे और फसल बीमा के लिए उचित प्रावधान भी बनाए। किसानों के लिए सुनिश्चित मासिक आय को फसलों की उत्पादकता और खेतों की भौगोलिक स्थिति से जोड़ा जाना चाहिए। मसलन, फसलों का उत्पादन पहाड़ों और रेगिस्तान में अलग-अलग होता है। इसलिए किसानों के लिए मासिक आय की व्यवस्था करते वक्त खेतों की भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखना होगा।