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कश्मीर की जटिलता को समझें

Fri, 26 Aug 2016 07:04 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Fri, 26 Aug 2016 07:04 PM IST
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Understand tihe complexity of kashmir issue
एम के वेणु

कश्मीर में मौजूदा दौर के हिंसक प्रतिरोध के दौरान कुछ हफ्तों तक बेहद आक्रामक दिखने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अपना रुख कुछ नरम किया है, जैसा कि उन्होंने कहा है कि केंद्र कश्मीर के सभी हितकारियों से, जिनमें हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अलगाववादी भी शामिल हैं, बात करना चाहता है। यह एक व्यावहारिक और परिपक्व प्रतिक्रिया है, क्योंकि पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कश्मीर घाटी में हालिया हिंसक घटनाओं की जांच की बात कहकर इस मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण की कोशिश की है। पाकिस्तान की शरारत को नाकाम करने के लिए भारत को जितनी जल्दी हो सके, बातचीत शुरू कर देनी चाहिए।

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वैसे भी भाजपा-पीडीपी गठबंधन के दस्तावेज में स्पष्ट उल्लेख है कि दोनों पार्टियां कश्मीर समस्या के राजनीतिक समाधान के लिए हुर्रियत कॉन्फ्रेंस समेत कश्मीर के सभी हितधारकों और पाकिस्तान से निरंतर बातचीत के लिए प्रतिबद्ध है। भारत भले अभी तुरंत नहीं, लेकिन कुछ स्तर पर कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के साथ बातचीत करेगा। भारत को सभी पक्षों की भावनाओं पर नियंत्रण रखते हुए कश्मीर और पाकिस्तान से बेहद तार्किक ढंग से निपटने की जरूरत है।
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केंद्र को यह समझना चाहिए कि इस बार कश्मीर में विरोध प्रदर्शन पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों तक फैल गया है और इस मामले में यह वर्ष 2008 और 2010 की अशांति से अलग है। इसके अलावा इस बार प्रदर्शनकारी स्वायत्तता के दशकों पुराने मुद्दे को पूरी तरह से निपटाने के प्रति दृढ़ संकल्पित दिखते हैं, जिसे कुछ समूह 'आजादी' कहते हैं। यह निश्चित नहीं है कि क्या कश्मीर के लोगों ने वास्तव में 'पूरी आजादी' के आर्थिक और भू-राजनीतिक प्रभावों पर सोचा है या नहीं। भारतीय प्रभाव क्षेत्र में स्वतंत्र कश्मीर का विचार जवाहरलाल नेहरू ने रखा था। यह कुछ ऐसा लगता है कि कश्मीरी भविष्य में समझौता करने के लिए तैयार हो सकते हैं।
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इस बार जो शायद सबसे महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि कश्मीरी बुर्जुआ कुलीन वर्ग (जिसका प्रतिनिधित्व हाई कोर्ट के बार एसोसिएशन के सदस्य, व्यापारी और मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन, विश्वविद्यालय शिक्षकों का एसोसिएशन करते हैं) ने सर्वसम्मति से एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया है, भले ही उन्हें अपनी तमाम आर्थिक गतिविधियां बंद करनी पड़े। भारत में विलय के समय संविधान में परिकल्पित कश्मीर की स्वायत्तता उनका मुख्य मुद्दा है। कश्मीर ट्रेडर्स एवं मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन के एक अधिकारी ने बताया कि यह सेब एवं अन्य बागवानी के उत्पादों को तोड़ने का समय है, लेकिन हालात से संकेत मिलता है कि उत्पादक किसान विरोध स्वरूप अपनी फसलों को घर लाने और बाजार में बेचने से इन्कार कर सकते हैं। यदि होता है, तो यह ग्रामीण कश्मीरियों द्वारा राजनीतिक स्तर पर एक दुर्लभ किस्म का सत्याग्रह होगा।

जाहिर है, केंद्र यह मानकर पिछले 45 दिनों से ज्यादातर मौन रहा है कि कश्मीरी मजबूरी के कारण अपने-आप नियमित आर्थिक गतिविधियों में शामिल हो जाएंगे। लेकिन कश्मीरी समाज द्वारा दिखाए गए नए तेवर ने राजग सरकार को आश्चर्यचकित कर दिया। यहां तक कि काफी समय बीत जाने के बावजूद जनांदोलन के बिखरने का कोई संकेत नहीं दिख रहा है। नतीजतन प्रधानमंत्री मोदी ने जम्मू-कश्मीर के विपक्षी दलों के नेताओं के शिष्टमंडल के सामने पहली बार कश्मीर का स्थायी समाधान तलाशने के लिए संविधान के दायरे में बातचीत की जरूरत पर बल दिया। 45 दिनों की चुप्पी और स्वतंत्रता दिवस के भाषण में कश्मीर का कोई जिक्र नहीं करने के बाद अंततः प्रधानमंत्री ने विपक्षी नेताओं के शिष्टमंडल के सामने अपनी 'गहरी चिंता और दर्द' को व्यक्त किया। यह अपने-आप में नई दिल्ली की स्वीकृति है कि कश्मीर की स्वायत्तता के मुख्य मुद्दे का तत्काल समाधान जरूरी है।

पिछले हफ्ते श्रीनगर दौरे के दौरान इस लेखक ने नागरिक समाज के विभिन्न समूहों के 50 से ज्यादा सदस्यों से बात की, जिसमें वकील, शिक्षक, व्यवसायी और नौकरशाह शामिल थे। वे सभी इस पर सहमत थे कि कश्मीर की स्वायत्तता के मुद्दे का शीघ्र समाधान होना चाहिए। श्रीनगर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष जफर शाह कहते हैं कि कश्मीर में आज जो हो रहा है, वह उन ऐतिहासिक समस्याओं का परिणाम है, जिसे हल नहीं किया गया। हमें इस मूल समस्या का तुरंत समाधान करना होगा।


जाहिर है, कश्मीर इस समय नागरिक अवज्ञा आंदोलन की गिरफ्त में है, जिसके बारे में राज्य एवं केंद्र सरकार ने सोचा भी नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री एवं विपक्ष के नेता उमर अब्दुल्ला ने कहा कि 'किसी भी विधायक में इतना साहस नहीं है कि वे इस समय अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाएं।' मुख्यधारा की ज्यादातर पार्टियां मौजूदा स्थिति में कश्मीर में अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं। अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस केंद्रीय स्थान हासिल करने की दिशा में बढ़ रही है, जिससे नई दिल्ली बात कर सकती है। विडंबना देखिए कि राज्य में सरकार चलाने वाली दोनों पार्टी- भाजपा और पीडीपी ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को हाल ही में अप्रासंगिक बताकर खारिज किया था। लेकिन बदले हुए हालात में केंद्र को अब उसी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से बात करनी पड़ सकती है, क्योंकि कम से कम इस समय कश्मीरी समाज को उसी पर सबसे ज्यादा भरोसा है। यह देखने वाली बात होगी कि मुख्यधारा की पार्टियां ऐसे में क्या करती हैं! नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी, दोनों ने अपने चुनावी घोषणापत्र में स्वायत्त स्वशासन के कुछ स्वरूप का समर्थन किया है। क्या अपना अस्तित्व बचाने के लिए वे उन मुद्दों को पुनर्जीवित करने के लिए मजबूर होंगे? क्या प्रधानमंत्री गठबंधन एजेंडे की प्रतिबद्धता का सम्मान करते हुए अलगाववादी समेत कश्मीर के सभी हितधारकों से बातचीत करेंगे? केवल तभी भाजपा-पीडीपी गठबंधन बचेगा, अन्यथा देर-सबेर उसे तो टूटना ही है। कश्मीर के मुद्दे पर गहरा मंथन करना होगा और इसकी जटिलता अभी सामने नहीं आई है।

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