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कश्मीर की हकीकत को समझें

Wed, 20 Sep 2017 09:54 AM IST
Maroof Raza मारूफ रजा
Updated Wed, 20 Sep 2017 09:54 AM IST
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Understand the reality of Kashmir
कश्मीर

कश्मीर मुद्दे के समाधान की इच्छा जाहिर करने वाले गृह मंत्री राजनाथ सिंह का हालिया बयान यह संकेत करता है कि वह और उनके सलाहकार या तो कुछ विचार प्रस्तुत नहीं कर पा रहे हैं या वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिग्गज भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी की जम्मू-कश्मीर से संबंधित घोषणाओं को उम्मीद से परे जाकर कार्यात्मक स्तर पर ले जाने को उत्सुक हैं। लेकिन समाधान तलाशने की यह इच्छा दिल्ली और श्रीनगर के पूर्व राजनीतिक नेताओं के बयान से अलग नहीं है, जिनके वायदे अब प्रासंगिक नहीं हैं, क्योंकि उन्होंने कश्मीर मुद्दे को निपटाने के लिए यथार्थवादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया। आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से जारी मौजूदा गतिरोध स्पष्ट रूप से स्थिति से खराब तरीके से निपटने का मामला है, जिसके नतीजे के बारे में घाटी की स्थिति और मनोस्थिति की थोड़ी-सी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति अंदाज लगा सकता है।


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भारत-विरोधी भावना को मजबूत बनाने के कारण ही पीडीपी को सत्ता में आने का मौका मिला और बुरहान वानी जैसे आतंकवाद की नई नस्ल पैदा हुई। पीडीपी की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और दिल्ली में उनके सहयोगी, दोनों घाटी की स्थिति की गंभीरता से अनजान थे। लंबे समय तक दिल्ली के नेताओं ने अपने कश्मीरी सहयोगी दल से निपटने पर ध्यान केंद्रित किया, और जब स्थिति नियंत्रण से बाहर चली गई, तो हमारे असहाय भारतीय राजनेताओं तथा दिल्ली व श्रीनगर में बैठे नौकरशाहों की प्रतिक्रिया थी, 'हम और क्या कर सकते हैं?'

शुरू से ही दिल्ली की भाजपा नीत केंद्र सरकार को अपनी चुनावी महत्वाकांक्षाओं को अलग रखकर कश्मीर में पीडीपी-भाजपा सरकार के प्रति सख्त रुख अपनाना चाहिए था। इसके साथ ही घाटी में भारत विरोधी ताकतों और उनके पाकिस्तानी आकाओं के प्रचार के खिलाफ एक व्यापक सोशल मीडिया अभियान चलाना चाहिए। दूसरी बात, संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों को पूरा करने में पाकिस्तान की विफलता के बारे में सच्चाई के साथ पाकिस्तानी कहानी को चुनौती देना चाहिए था, साउथ ब्लॉक के इस डर पर कभी ध्यान नहीं देना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों का जिक्र करने पर कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण हो जाएगा। साउथ ब्लॉक में पाकिस्तानी दूत को बुलाना ही पर्याप्त नहीं है। और अंत में नई दिल्ली को जम्मू-कश्मीर में वित्त पोषण की पहल की प्रतिबद्धताओं को पूरा करना चाहिए, इससे नई दिल्ली को सौदेबाजी करने की ताकत मिलेगी। अब तक केंद्र ने जितना भी जम्मू-कश्मीर को धन दिया है, उससे आम लोगों को कम फायदा हुआ है, दुखद है कि केवल राजनीतिक खिलाड़ियों ने उसका लाभ उठाया।

एक बार जब ऐसा हो जाता है, तो फिर नई दिल्ली को अंतरराष्ट्रीय समुदाय पर पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने का दबाव बनाना चाहिए। इस समय प्रधानमंत्री द्वारा दुनिया भर में भारी भीड़ के सामने भाषण देने के बावजूद किसी को याद नहीं होगा कि उन्होंने सार्वजनिक मंचों पर जोरदार ढंग से पाकिस्तान को आतंकवाद प्रायोजित करने वाला देश बताया है। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति ने ऐसा कहा है, हमने नहीं। केवल परोक्ष रूप से पाकिस्तान पर निशाना साधा गया है। दुर्भाग्य से सरकार में कुछ ऐसे राजनयिक हैं, जो पाकिस्तान की जर्जर नागरिक सरकार से संबंध बनाने और लोकतंत्र के झूठे नृत्य में शामिल होने के लिए दृढ़ हैं, जबकि पाकिस्तानी सेना और उसके मौजूदा प्रमुख जनरल बाजवा लगातार भारत पर दबाव बना रहे हैं। कुछ लोगों का अनुमान है कि पाकिस्तानी सेना शीघ्र ही वहां सत्ता में लौट सकती है। मोदी सरकार को यह मान लेना चाहिए कि पाकिस्तानी सेना सत्ता संरचना में अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए भारत के साथ शत्रुता को जिंदा रखना चाहती है। इसलिए कश्मीर हमेशा उनकी नजर में रहेगा। और भारत-पाकिस्तान के बीच केवल तभी स्थायी समझौता हो सकता है, जब संघर्ष विराम रेखा (सीएफएल), नियंत्रण रेखा (एलओसी) और सिंधु जल समझौते पर पाकिस्तानी सेना भी हस्ताक्षर करेगी। उनकी अनदेखी करने से उन्हें कश्मीर बहस से अलग नहीं किया जा सकता।

लगता है कि कश्मीर मुद्दे को लेकर नई दिल्ली के नजरिये में सरासर अयोग्यता और कल्पना की कमी प्रमुख विषय है। हर बार यही उम्मीद जताई जाती है कि समस्या सुलझ जाएगी, मानो सुरक्षा बल स्वयं सब कुछ ठीक करने के लिए पर्याप्त हैं। तो फिर राजनीतिक समाधान की बात क्यों होती है? क्या यह इस मुद्दे को लंबा खींचने का उपाय है, कि जब तक वहां के हालात पहले की तरह सामान्य नहीं हो जाते, नई दिल्ली को वहां के राजनेताओं को निरंतर धन देना होगा (जो उनमें से कुछ जनता को देंगे), बदले में दिल्ली यह उम्मीद करे कि वे वहां भारत समर्थक माहौल बनाएंगे, जबकि जननेता हल की तलाश में एक से दूसरी विफलता की तरफ बढ़ते रहेंगे!

इस तरह एक बाद दूसरी सरकारों द्वारा बार-बार आतंकी हमलों और पत्थरबाजों के सामने सुरक्षा बलों को चारे के रूप में फेंकते देखते रहना निराशाजनक है। तमाम बाधाओं के बावजूद उन्होंने हमेशा अच्छा काम किया है। विफलता केवल राजनेताओं के साथ है। विद्रोह एक राजनीतिक-सैन्य संघर्ष है, जिसे सिर्फ भारत विरोधी तत्वों को खत्म करके ही नहीं लड़ा सकता, सैन्य बल केवल स्थिति पर नियंत्रण बनाए रख सकता है। नागरिक नेतृत्व को शांतिकाल में वहां के लोगों का दिल-ओ दिमाग जीतने के लिए समाधानों को लागू करना चाहिए। 1990 से हमने कम से कम तीन बार वहां हर सात-आठ वर्षों पर स्थिति को सामान्य होते देखा है, लेकिन हमारे नीति नियंता इसका फायदा उठाने में विफल रहे हैं। इसलिए अगर हम अब भी सुधार नहीं करते हैं, तो भारत को अपनी इस सबसे बड़ी चुनौती को एक लंबे समय तक झेलने के लिए तैयार रहना होगा।

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