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पानी का आर्थिक मूल्य समझें

Sun, 13 Nov 2016 06:53 PM IST
देविंदर शर्मा
देविंदर शर्मा Updated Sun, 13 Nov 2016 06:53 PM IST
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Understand the economic value of water
देविंदर शर्मा

सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर को लेकर जो अभी राजनीतिक उथल-पुथल का माहौल है, वह सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद पैदा हुआ है, जिसमें शीर्ष अदालत ने पड़ोसी राज्यों के साथ जल-बंटवारे का समझौता रद्द करने के लिए 2004 में पंजाब विधानसभा द्वारा पारित कानून को असांविधानिक करार दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने लोकसभा से और उनकी पार्टी के विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया है। वास्तव में यह मुद्दा दशकों पुराना है। वर्ष 1966 में जब पंजाब का बंटवारा कर हरियाणा बनाया गया, तभी से दोनों राज्यों के बीच पानी का विवाद जारी है।

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वर्ष 1976 में केंद्र सरकार ने पंजाब के 7.2 एमएएफ यानी (मिलियन एकड़ फीट) पानी में से 3.5 एमएएफ हिस्सा हरियाणा को देने की अधिसूचना जारी की थी। पंजाब से हरियाणा के हिस्से का पानी लाने के लिए सतलुज नदी से यमुना को जोड़ने वाली एक नहर की योजना बनाई गई, जिसे सतलुज यमुना लिंक कहते हैं। 1981 में पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मुख्यमंत्रियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ मिलकर एक समझौते पर दस्तखत किए थे। आठ अप्रैल, 1982 को इंदिरा गांधी ने पटियाला जिले के कपूरी गांव में खुद जाकर नहर की खुदाई की शुरुआत की थी। एसवाईएल की लंबाई 214 किलोमीटर है, जिसमें से पंजाब में 122 और हरियाणा में 92 किलोमीटर हिस्से का निर्माण होना था। लेकिन पंजाब ने 1990 में नहर निर्माण का काम रोक दिया। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जब पंजाब पर अपने हिस्से के निर्माण कार्य में तेजी लाने के लिए दबाव डाला गया, तो उससे बचने के लिए पंजाब ने 2004 में पंजाब टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट ऐक्ट, 2004 पारित किया।
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यह कानून जब हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति के पास पहुंचा, तो राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से उस पर सलाह मांगी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब जाकर राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह पर जवाब देते हुए कहा कि 1981 के समझौते को रद्द करके वास्तव में पंजाब अपने उस वायदे से पीछे हटा है, जिसके तहत उसे हरियाणा और राजस्थान के साथ पानी साझा करने और उसके लिए सतलुज-यमुना लिंक का निर्माण करना था। शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि कोई भी राज्य किसी विधेयक के जरिये ऐसा काम नहीं कर सकता, जो देश की शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए अंतिम फैसले के खिलाफ जाता हो।
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इस लिंक नहर के निर्माण के लिए किसानों से जमीन अधीगृहीत करने की अधिसूचना 1978 में जारी की गई थी, पर 2016 में कहा गया कि किसानों की जमीन लौटा दी जाएगी, जबकि नहर निर्माण का 90 फीसदी काम हो चुका है। वास्तव में 2004 का कानून ठीक नहीं था, क्योंकि एक तरफ जहां यह संघीय ढांचे के नियमों का उल्लंघन करता था, वहीं अंतरराज्यीय जल विवाद से संबंधित कानूनों के भी खिलाफ था। इसलिए न्याय के सिद्धांतों के समक्ष 2004 के कानून के टिकने की संभावना पहले से ही कम थी।

असल में पंजाब और हरियाणा के बीच पानी का यह विवाद उसी तरह है, जैसा कि पिछले दिनों कावेरी नदी के पानी बंटवारे को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच देखा गया था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अंततः कर्नाटक को तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना पड़ा। लेकिन यहां दोनों जल विवादों का एक साथ जिक्र करने का मकसद यही बताना है कि पानी के बंटवारे को लेकर सिर्फ इन्हीं राज्यों में ही विवाद नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों के बीच जल बंटवारा एक बड़ा मुद्दा है। पंजाब की 98 फीसदी भूमि सिंचित है, जबकि हरियाणा की 80 फीसदी कृषि भूमि ही सिंचित है। इसलिए पंजाब का उसे पानी देने से इन्कार करना सही नहीं है।

पंजाब में आगामी कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं, इसलिए इसको लेकर राजनीति होनी स्वाभाविक बात है। लेकिन हैरानी की बात है कि अकाली दल और कांग्रेस जैसे परस्पर कट्टर राजनीतिक विरोधी दल सतलुज-यमुना लिंक नहर मामले में एक स्वर में बोल रहे हैं और साफ कह रहे हैं कि हरियाणा को एक बूंद पानी नहीं देंगे। इसी तरह की बात आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल भी कर रहे थे, लेकिन जब हरियाणा ने कहा कि तब हम भी दिल्ली को पानी नहीं देंगे, तो आम आदमी पार्टी ने इस पर चुप्पी साध ली। दरअसल चुनाव के कारण सभी दल अभी यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, वही राज्य के हितों के सबसे बड़े संरक्षक हैं।


एसवाईएल के मुद्दे पर विचार करते हुए इस महत्वपूर्ण तथ्य पर गौर करने की जरूरत है कि देश को उसकी जरूरत का करीब 45 फीसदी पानी हिमालय से मिलता है। इसलिए भविष्य के लिए पानी के संरक्षण की जरूरत को समझते हुए  उसके आर्थिक मूल्य के आकलन की तरफ भी अब हमें सोचने की जरूरत है। हैरानी की बात है कि जिन पहाड़ी राज्यों से नदियां निकलती हैं, वहां पानी का भयानक संकट पैदा हो रहा है और मैदानी इलाके के राज्य न केवल उन नदियों के पानी का उपभोग करते हैं, बल्कि वहां पानी का भयंकर दुरुपयोग भी होता है। पंजाब में पानी का कितना ज्यादा दुरुपयोग होता है, यह सभी जानते हैं। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि सतलुज का पानी सिर्फ बीस वर्षों तक ही उपलब्ध है, तो फिर यह झगड़ा क्यों! अगर पानी बचाना है, उसका दुरुपयोग रोकना है, तो उसके आर्थिक मूल्य का आकलन शुरू करना होगा और राज्यों को नदी के स्रोत हिमालयी राज्यों को उपभोग के अनुसार रॉयल्टी देने के लिए कहना होगा। इसका राजनीतिक हल ढूढ़ने में काफी समय लगेगा। अतः सुप्रीम कोर्ट को एक कमेटी का गठन करना चाहिए, जो पानी का आर्थिक मूल्य निर्धारित करे और पानी के उपभोग के आधार पर राज्यों को उसकी रॉयल्टी चुकाने के लिए कहे। अगर राज्यों को रॉयल्टी चुकाना पड़ेगा, तो वह न सिर्फ नदियों के संरक्षण के प्रति सजग होंगे, बल्कि पानी के दुरुपयोग को भी कम करने की कोशिश करेंगे।

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