फिर दोराहे पर नेपाल!

संजय भारद्वाज Updated Mon, 25 Nov 2013 08:07 PM IST
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Undecisiveness in Nepal

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बीते एक दशक से नेपाल संक्रमण के दौर से गुजरते हुए सांविधानिक लोकतंत्र और राजनीतिक स्थिरता के लिए संघर्ष कर रहा है। संविधान सभा के ताजा चुनाव इसी की कड़ी हैं। दूसरी संविधान सभा के लिए हुए चुनावों में पिछड़ने के बाद एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड ने जिस तरह से इन चुनावों पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया है, उससे नए संविधान के निर्माण और एक स्थिर सरकार के गठन की राह कठिन नजर आ रही है। नेपाली कांग्रेस और सीपीएन (एमयूएल) ने जहां बढ़त बना ली है, वहीं पिछले चुनाव में सबसे आगे रहने वाली प्रचंड की पार्टी न केवल तीसरे स्थान पर जाती दिख रही है, बल्कि खुद प्रचंड काठमांडू से चुनाव हार गए हैं।
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उल्लेखनीय है कि राजशाही के खात्मे के बाद पहली संविधान सभा के चुनाव में प्रचंड की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। 2006 में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय ताकतों की पहल पर यूसीपीएन (माओवादी) ने राजनीतिक समाधान का रास्ता चुना और सात दलों के गठबंधन के साथ मिलकर राजशाही के खिलाफ आंदोलन किया था। राजशाही के खात्मे के बाद नेपाल के राजनीतिक दलों और वहां के सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक सहमति और प्रतिनिधित्व के साथ नए संविधान के निर्माण का प्रयास शुरू किया था। वहां 2008 में पहली बार संविधान सभा के चुनाव हुए और तय किया गया कि संविधान सभा ही संसद की तरह काम करेगी। लेकिन पहली संविधान सभा राजनीतिक अवरोधों और टकराव के चलते अपना काम पूरा नहीं कर सकी। उसका कार्यकाल पूरा होने पर सांविधानिक संकट जैसी स्थिति तक पैदा हो गई थी। आखिरकार सभी प्रमुख दलों की सहमति से प्रधान न्यायाधीश को अंतरिम सरकार का मुखिया बनाकर दूसरी संविधान सभा के चुनाव कराने पड़े। हालांकि उनकी नियुक्ति को लेकर भी मतभेद उभरे, जिसके चलते यूसीपीएन (माओवादी) से एक धड़ा अलग हो गया और उसने चुनावों का बहिष्कार कर दिया। इसके अलावा चुनाव के दौरान हिंसा की खबरें भी आती रहीं।
वैसे भी यूसीपीएन (माओवादी) और नेपाली कांग्रेस पार्टी जैसी दूसरी पार्टियां राजशाही के खिलाफ आंदोलन में साथ जरूर थीं, मगर उनकी नीतियों में कोई साम्य नहीं है। दूसरी संविधान सभा के चुनावों के लिए सभी प्रमुख पार्टियों ने अपने घोषणा पत्रों में संघीय ढांचे और नई सरकार के स्वरूप से जुड़े मुद्दों को तवज्जो दी थी। असल में माओवादी पार्टी और दूसरी पार्टियों में सबसे बड़ा फर्क संघीय ढांचे को लेकर ही है। यूसीपीएन (माओवादी) जहां नस्लीय पहचान के आधार पर संघीय ढांचे के निर्माण के पक्ष में है, वहीं नेपाली कांग्रेस और दूसरी पार्टियां चुनाव के दौरान क्षेत्र आधारित ढांचे की बात कर रही थीं। इसी तरह सरकार के स्वरूप को लेकर तीन तरह के विचार थे। पहला, प्रत्यक्ष निर्वाचित राष्ट्रपति, दूसरा, भारत की तरह की व्यवस्था, जिसमें राष्ट्रपति नाम का प्रमुख होता है, सरकार प्रधानमंत्री चलाता है और तीसरा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच सत्ता का बंटवारा। पहली संविधान सभा में भी इन्हीं मुद्दों पर टकराव था, जिसकी वजह से विकास और सुशासन के मुद्दे किनारे लग गए।
दूसरी संविधान सभा के चुनाव में न सिर्फ दोगुना सियासी दलों ने शिरकत की, बल्कि 70 फीसदी से अधिक मतदान बताता है कि लोग राजनीतिक अस्थिरता से आजिज आ चुके हैं। मगर जो नतीजे आ रहे हैं, वह बहुत आश्वस्त नहीं कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यूसीपीएन (माओवादी) की पराजय को माना जा सकता है, जिसने इन चुनावों को ही खारिज कर दिया है। चुनावों से पहले सभी बड़ी राजनीतिक पार्टियों ने वायदा किया था कि वे अगले छह महीने के दौरान सभी तरह के सांविधानिक मसलों पर सहमति बनाने का प्रयास करेंगी और सभी अनसुलझे मसलों को या तो वोटिंग या फिर रायशुमारी के जरिये सुलझा लेंगी। मगर यूसीपीएन (माओवादी) के रवैये से लगता है कि नेपाल एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता के मुहाने पर खड़ा हो गया है।

वैसे यह उम्मीद की जा रही थी कि संविधान सभा में सत्ता संतुलन नेपाली कांग्रेस और सीपीएम (यूएमएल) के पक्ष में हो सकता है, और वे देश को स्थिर सरकार और नया संविधान देने में सक्षम होंगे। मगर माओवादियों की सहमति के बिना ये चुनाव निरर्थक साबित होंगे। वास्तव में प्रचंड की पार्टी की ताकत तभी कम हो गई थी, जब उसका एक धड़ा अलग होकर सीपीएन-माओवादी (वैद्य) से जा मिला था। इसके अलावा उसे सत्ता विरोधी रुझान का भी नुकसान होता दिख रहा है, क्योंकि दो-दो बार सरकार बनाने का मौका मिलने के बावजूद वह प्रमुख मुद्दों पर सहमति नहीं बना सकी। हालांकि इन चुनावों में प्रचंड ने इस नुकसान की भरपाई जातीय आधार पर राजनीति करने वाले मधेशी गुटों से तालमेल के जरिये करने की कोशिश की। दूसरी ओर नेपाली कांग्रेस ने भी मधेशियों का समर्थन जुटाने में कसर नहीं छोड़ी।

नेपाल में कई तरह के जातीय गुट हैं और उनके मुद्दे भी अलग-अलग हैं। पिछली सरकार नेपाल की बहु नस्लीय समाज की समस्याओं को सुलझाने में नाकाम रही। नेपाल की स्थिरता के लिए जरूरी है कि सभी जातीय समूहों की समस्याओं पर गौर किया जाए और वंचित तबकों को मुख्यधारा से जोड़ा जाए। मगर यह तभी संभव हो सकेगा, जब संविधान सभा में विभिन्न समुदायों का व्यापक प्रतिनिधित्व हो। संविधान सभा को नेपाल की बहु नस्लीय और बहु सांस्कृतिक प्रकृति को महत्व देना होगा और उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ाना होगा, तभी यूसीपीएन (माओवादी) की चुनौतियों से निपटा जा सकेगा।
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