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बदलाव: यूजीसी-मसौदे को सही चश्मे से देखें, विकसित भारत में हो रहे परिवर्तन एक साथ कर रहे कदमताल

Fri, 17 Jan 2025 05:14 AM IST
Badri Narayan बद्री नारायण
Updated Fri, 17 Jan 2025 05:14 AM IST
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सार
यूजीसी का ताजा रेगुलेशन राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की आत्मा का ही प्रसार है, जो एक ही साथ नियुक्तियों में शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता, नवोन्मेष, और दक्षता निर्माण को महत्व देते हुए विकसित भारत के मिशन के लिए बौद्धिक मानस एवं दक्ष कार्यशक्ति निर्मित करने के अभियान को भी आगे बढ़ाता है।
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UGC Regulations and new education policy need right analysis changes in India seems positive
UGC - फोटो : Amar Ujala Graphics

विस्तार

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) रेगुलेशन-2025 बनकर तैयार है। हाल ही में भारत के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इसे जन विमर्श के लिए जारी किया। यूजीसी ने भी इस मसौदे को जन विमर्श एवं विशेषज्ञ सुझावों हेतु अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित कर दिया है। इस पर विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों, राजनीतिक संवर्ग एवं मीडिया जगत में विमर्श प्रारंभ हो गया है। छिद्रान्वेषियों की बात न करें, तो इसे शिक्षा जगत के अनेक हितधारकों के एक बड़े वर्ग से सराहना मिल रही है।


शिक्षा जगत से जुड़े लोग, नौकरी के आकांक्षी तथा उच्च शिक्षा संस्थानों के संकायों से संबद्ध लोग इस पर सकारात्मक राय देने लगे हैं। राजनीतिक हलकों में केरल की वामपंथी एवं तमिलनाडु के द्रमुक नेता इसमें वर्णित वाइस चांसलर के चयन की प्रक्रिया में राज्यपाल की बड़ी भूमिका की आलोचना कर रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री तो यहां तक कह रहे हैं कि अगर केंद्र सरकार अपना विचार नहीं बदलेगी, तो वह मामले को अदालत ले जाएंगे। वहीं अनेक राजनीतिक कर्मी कुलपति पद को राजनीति के प्रभाव से बचाने के लिए सरकारों से ज्यादा राज्यपाल की भूमिका बढ़ाने के पक्ष में दिख रहे हैं। दरअसल, राज्यपालों की तरफ से कुलपति की जिम्मेदारियों के निर्वहन की प्रथा तो आजादी के समय से ही चली आ रही है। यही नहीं, यूजीसी के ताजा रेगुलेशन में चयन समिति की जो संरचना है, वह 2010 के रेगुलेशन पर ही आधारित है। ऐसे में ताजा विवाद का कोई आधार नहीं दिखता।


शिक्षा जगत में किसी भी प्रकार की जड़ता एवं रूढ़िग्रस्तता के खिलाफ यूजीसी रेगुलेशन-2025 अनेक अर्थों में मुक्तिकारी रेगुलेशन है, जो उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नई शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 के उद्देश्यों से प्रभावित है। वस्तुतः एनईपी-2020 की आत्मा को उच्च शिक्षा के ढांचे में रूपायित करने का यह एक सक्षम प्रयास है। यह मुक्तिकारी इस अर्थ में है कि इसने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में संकायों की नियुक्तियों में ‘विषयगत’ खांचे को तोड़ते हुए बहु-अनुशासनिक विचार को महत्व दिया है। इसने अपने दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में शिक्षा जगत की ब्यूरोक्रेटिक जड़ता एवं रूढ़ियों को तोड़ते हुए जरूरी लचीलेपन को बढ़ाने के लिए नीति एवं नियमों का प्रावधान किया है।

यूजीसी रेगुलेशन (2025) हमें बीए, एमए में लिए विषयों में नेट या शोध होने पर उक्त विषयों में प्रवक्ता होने की योग्यता को निर्धारित तो करता ही है, साथ ही साथ यह हमें नेट के विषय, जो संभव हैं कि हमारे बीए/एमए विषयों से भिन्न हों, में प्रवक्ता होने की छूट भी देता है। यह संख्या से ज्यादा गुणात्मकता को महत्व देता है। यह गुणात्मकता शोध की गुणात्मकता से संबंधित है। भारतीय शिक्षा जगत में मौलिक एवं मेधावी मस्तिष्क के लोग आएं, यही यूजीसी रेगुलेशन-2025 की प्रतिबद्धता है। यह उच्च शिक्षा संस्थानों को शोध प्रकाशनों की गुणवत्ता तय करने की स्वायत्तता प्रदान करता है। यह सही अर्थों में उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने लिए प्रवक्ताओं, व्याख्याताओं एवं संकाय सदस्यों के चयन की स्वायत्तता प्रदान करता है। यह हमें इसलिए भी स्वायत्त बनाता है कि उच्च शिक्षा संस्थान ‘जर्नल प्रकाशन’ की गुणवत्ता स्वयं तय कर सकें। इस अर्थ में यह यूजीसी के पहले रेगुलेशन में शिक्षा संस्थान के रूप में ‘गुणवत्ता निर्धारण’ में यूजीसी के स्वयं की केंद्रीयता को भी भंग करता है। यह एक साहसिक कदम है।

यूजीसी रेगुलेशन-2025 में एक महत्वपूर्ण सुझाव शामिल है, जिसे एनईपी-2020 की मूल आत्मा के एक प्रकार के प्रसार के रूप में भी देखा जा सकता है। वह है-भारतीय भाषाओं में शोध प्रकाशनों को महत्व देना। इसमें कहा गया है कि शोध छात्रों एवं विश्वविद्यालय के शिक्षकों द्वारा भारतीय भाषाओं में शोधपत्र के प्रकाशनों को नियुक्तियों के लिए होने वाले चयनों में प्राथमिकता दी जाएगी। यह एक प्रकार से शोध द्वारा भारतीय सामाजिक आत्मा एवं भारतीय मौलिकता की हमारी समझ को विकसित करने में मददगार हो सकेगा। हम लोग बार-बार कहते रहे हैं कि आत्म भाषा में ही सामाजिक आत्म का ज्ञान संभव है। इससे कुछ दशक में भारतीय शिक्षा जगत में अंग्रेजी की प्रधानता को कम कर भारतीय भाषाओं के शोधार्थियों को महत्व मिल पाएगा। इससे शिक्षा की चेतना हमारी सामाजिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ पाएगी।

यूजीसी रेगुलेशन-2025 का यह पाठ एक तरह से एनईपी-2020, जो एक भारतीय शिक्षा के रूपांतरण की परिपूर्ण योजना है, के एक अंश को प्रारूपित करता है। हालांकि, यह अंश भी एनईपी-2020 की मूल आत्मा, यानी अकादमिक लचीलेपन, बहु-अनुशासनिकता, मौलिकता एवं नवोन्मेष, के भाव को ही कार्य रूप में परिलक्षित करता है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रेगुलेशन एक अर्थ में विकसित भारत के मिशन के लिए बौद्धिक मानस एवं दक्ष कार्यशक्ति निर्मित करने के अभियान को भी आगे बढ़ाता है।

एनईपी-2020, जो भारतीय शिक्षा में भविष्यपरक रूपांतरण का प्रतिनिधित्व करता है, को यूजीसी रेगुलेशन-2025 में कार्यरूप देते हुए, उसे उच्च शिक्षा को जमीनी धरातल पर उतारने का प्रस्ताव है। यह एक ही साथ नियुक्तियों में शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता, नवोन्मेष, बहुल अंतः अनुशासनिकता, लचीलेपन और दक्षता निर्माण को महत्व देता है। यह विश्व स्तर पर भारतीय शिक्षा को प्रतियोगी विशिष्टता प्रदान करने में सहायक हो पाएगा।

कुलपतियों की नियुक्ति के लिए यह रेगुलेशन शिक्षा जगत के साथ-साथ अनेक तरह के विशिष्ट मेधावान विशेषज्ञों को भी शामिल होने की छूट देता है। संकाय सदस्यों एवं उच्च शिक्षा के क्षेत्र के चयन में अनेक रूढ़ियों को तोड़ते हुए इस रेगुलेशन ने ‘विशिष्टताओं‘ को महत्व दिया है। विशिष्ट पुरस्कारों एवं बड़े स्टार्टअप विकसित वाले उद्यमियों के द्वार भी शिक्षा जगत के लिए इस रेगुलेशन से खुल पाएंगे। जन विमर्श एवं विशेषज्ञों की सलाह और सुझाव से निकली अनेक अंत: दृष्टियां इसे और ज्यादा प्रभावी एवं परिपूर्ण बना सकेंगी, ऐसा विश्वास है। प्रतीत होता है कि भारतीय शिक्षा, समाज एवं विकसित भारत में हो रहे परिवर्तन एक साथ कदमताल करते हुए आगे बढ़ रहे हैं।
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