फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   ubar rape case delhi tavleen singh.

उबर पर प्रतिबंध से क्या होगा

Sun, 14 Dec 2014 10:19 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 14 Dec 2014 10:19 PM IST
विज्ञापन
ubar rape case delhi tavleen singh.

कहा जाता है कि महिलाओं की सबसे बड़ी दुश्मन महिलाएं होती हैं। इस सच्चाई का एहसास मुझे पिछले सप्ताह तब हुआ, जब उबर टैक्सी में बलात्कार की खबर मिली। पहले उस महिला की हिम्मत को दाद देती हूं, जिसने ड्राइवर की गाड़ी की तस्वीर ली और एफआईआर दर्ज किया, बावजूद इसके कि इस राक्षस ने जाते-जाते उसे धमकी दी थी। उसकी इस बात से ही जान सकते हैं आप, कि निर्भया की याद हम अगर करते हैं आगामी 16 दिसंबर को, तो दिल से नहीं कर रहे होंगे।

विज्ञापन


ईमानदारी से निर्भया की याद में कुछ किया होता हमने, तो उस दिल दहलाने वाले हादसे के बाद महिलाओं के साथ इस किस्म का अत्याचार कम हो गया होता।

नहीं हुआ है, तो दोष हम महिलाओं का है, क्योंकि हमने भी महिला सुरक्षा की लड़ाई ईमानदारी से नहीं लड़ी है। इस बात का सुबूत चाहिए, तो यू ट्यूब पर उन टीवी चर्चाओं को फिर से देखिए, जो उबर कांड के बाद हुई थी। यकीन के साथ कह सकती हूं कि आप पाएंगे शर्मनाक खोखलापन उन महिलाओं की बातों में, जो महिला सुरक्षा को लेकर सबसे ज्यादा हल्ला मचाती हैं। इनमें वकील हैं, समाज सेविकाएं हैं, राजनीतिज्ञ भी, लेकिन क्योंकि ये महिलाएं अक्सर जुड़ी होती हैं किसी न किसी वामपंथी विचारधारा से, उन्होंने बलात्कार पर कम हल्ला मचाया और उबर कंपनी को भारत से निकाल फेंकने पर ज्यादा। वह इसलिए कि उबर विदेशी कंपनी है और इनको विदेशी निवेशकों से शिकायत है। लेकिन ऐसा करने से ध्यान इस बात से हटा कि निर्भया कोष बन जाने के बाद भी देश के शहरों में महिलाएं उतनी ही असुरक्षित हैं, जितनी वे दो वर्ष पहले थीं।
विज्ञापन


दिल्ली की उस बेटी के साथ 16 दिसंबर, 2012 की रात जो हुआ था, उससे हमको कुछ सीखना चाहिए था। उस समय भी महिलाओं ने असली मुद्दे नहीं उठाए। जोर दिया कानून में परिवर्तन लाने पर इस बात को भूलकर कि महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समस्या कानून की नहीं है, समस्या है व्यवस्था की। सो निर्भया कांड के कुछ ही महीने बाद जब एक दस साल की बच्ची के साथ बलात्कार हुआ और उसके मां-बाप एफआईआर दर्ज कराने गए थाने में, तो पुलिस वाले ने बच्ची को हिरासत में ले लिया और सारी रात लॉकअप में रखा।
विज्ञापन
विज्ञापन


सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्ष 24,923 ब्लात्कार हुए, यानी रोज अपने इस भारत महान में 92 महिलाएं बलात्कार की शिकार बनती हैं, जिनमें से 85 प्रतिशत नाबालिग बच्चियां होती हैं। काफी हद तक इस समस्या का हल तभी होगा, जब समाज में बलात्कारियों का बहिष्कार शुरू होगा। अक्सर ये दरिंदे शादी कर लेते हैं अपराधी होने के बावजूद। ये बचपन से सीखते हैं कि महिलाओं का दर्जा उनके बराबर का नहीं है।

समाज में परिवर्तन लाना आसान नहीं है। लेकिन इतना तो हो सकता है कि पुलिस वालों के प्रशिक्षण में ठोस परिवर्तन लाया जाए। निर्भया कोष बनाया गया था इस तरह के कार्यों को ध्यान में रखकर, लेकिन कुछ नहीं हुआ है अभी तक। कोई महिला पुलिस के पास जाती है शिकायत लेकर, तो इतना संवेदनहीन होता है उसका रवैया कि गरीब महिलाएं शिकायत दर्ज कराने से डरती हैं। नतीजतन भारत में जहां दस में से केवल एक बलात्कार का एफआईआर दर्ज हो पाता है, वहीं अमेरिका में 46 प्रतिशत मामले दर्ज होते हैं।


उबर पर प्रतिबंध लगाकर सरकार ने एक तरह से विषय ही बदल डाला। इससे ध्यान महिलाओं की सुरक्षा से हटकर उबर की गलतियों पर केंद्रित हो गया है। उबर पर कम और कानून-व्यवस्था के अभाव पर ज्यादा ध्यान दिया गया होता, तो अच्छा होता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed