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दो महिलाएं और एक आईना
कुमार प्रशांत/वरिष्ठ पत्रकार
Updated Sat, 03 Aug 2013 08:23 PM IST
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दो महिलाओं ने तूफान बरपा रखा है। एक ने हिला दिया है लखनऊ, तो दूसरी ने मुंबई की धुआंधार बारिश में आग लगा दी है। दोनों ने एक साथ कुछ ऐसा किया है कि जिससे हमारी आज की राजनीति एक बार फिर बेपर्दा हो गई है।
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राजनीति बेपर्दा हो तो इससे किसका फायदा है, इस बहस में पड़े बगैर मैं कहना चाहता हूं कि राजनीति के बारे में इस देश के आमलोगों का मोहभंग जितनी जल्दी हो, उतना ही शुभ है। यह राजनीति, राजनीति को गंदे धंधे में बदल रही है जिसके कारण लोगों का लोकतंत्र पर से भरोसा उठता जा रहा है।
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यह राजनीति लोगों को भ्रष्ट बनने पर मजबूर कर रही है और चौतरफा काहिली का माहौल बनाती जा रही है, इसलिए जरूरी है कि इस राजनीति से लोगों का मोहभंग हो, जल्दी हो और लोक शुरू करें लोकतंत्र के नये स्वरूपों के बारे में सोचना-समझना।
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अब हम फिर से लौटते हैं दोनों महिलाओं की तरफ यानी दुर्गाशक्ति नागपाल और शोभा डे की तरफ। दुर्गा देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के निकट के जिले गौतमबुद्ध नगर की सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट थीं- अभी-अभी निलंबित की गई हैं।
शोभा डे, महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की विशिष्ट नागरिक हैं, फैशन-जगत की मान्य हस्ती हैं और लेखिका-पत्रकार हैं। अभी-अभी शिव सेना, महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस ने उन्हें 'औकात में रहें वरना....' की चेतावनी दी है।
आपके मन में सवाल उठे कि यह सब क्या है, क्यों है इससे पहले ही मैं बात साफ कर दूं कि दुर्गा का निलंबन इसलिए हुआ है कि उत्तर प्रदेश सरकार की जातिवादी-अवसरवादी राजनीति के लिए वह असुविधाजनक बनती जा रही थीं।
शोभा डे को चेतावनी इसलिए मिली है कि महाराष्ट्र की अस्मिता का नारा उठा कर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाने वाले सारे राजनीतिक दल मानते हैं कि उनके अलावा दूसरे किसी को भी महाराष्ट्र की बात करने का अधिकार नहीं है। दोनों महिलाओं ने राजनीति का यह खतरनाक चेहरा उजागर कर दिया है।
दुर्गा पर आरोप यह है कि उन्होंने कदलपुर गांव में बन रही एक मस्जिद की दीवार इसलिए गिरवा दी कि वह गैर-कानूनी तरीके से सरकारी जमीन पर बन रही थी। यह भी कहा गया कि इससे मुसलमानों की भावना आहत हुई है और रमजान के पाक महीने में राज्य में सांप्रदायिक तनाव का खतरा बना है।
धरती पर देखें तो इनमें से एक बात भी सही नहीं उतरती है। उत्तर प्रदेश के जिस इलाके की बात हो रही है, अवैध खनन उद्योग यहां का मुख्या धंधा है और सारे ही दलों के भाईलोग इसमें लगे हैं। रेत माफिया के नाम से मशहूर यहां के एक सज्जन कपड़े समाजवादी पार्टी के पहनते हैं और ऊंची पहुंच रखते हैं।
दुर्गा ने इनका धंधा मुश्किल कर रखा था। ट्रकें जब्त कर ली थीं और ड्राइवरों पर मुकदमें चला रखे थे। राजनीतिक हलकों से कई बार ऐसा संकेत भी गया कि दुर्गा, देखो, प्रशासन का काम है कुर्सी पर बैठना और बीच-बीच में नारे लगाना कि सब ठीक-ठीक है।
लेकिन दुर्गा कोई संकेत समझने को तैयार ही नहीं थीं। रेत माफिया ने जब देखा कि यह लड़की किसी भी तरह मुट्ठी में नहीं आ रही है तो उसने इसकी आंखों में ही रेत डालने की योजना बनाई। फिर जो हुआ सो हुआ।
अब अखिलेश सरकार को जो जवाब देना है वह इतना ही है कि दुर्गा ने रेत माफिया के खिलाफ जो कदम उठाए, क्या वे गलत थे? क्या अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई करने का अपना निर्देश प्रशासन ने वापस ले लिया है? दुर्गा जानती हैं कि उनका निलंबन उनकी ही बिरादरी के उन उच्चाधिकारियों ने किया है, जो रात-दिन कुर्सी की सेवा में कायरों-चापलूसों की तरह लगे रहते हैं।
दुर्गा जानती है कि उनकी बिरादरी निहायत ही अवसरवादी, भ्रष्ट और आदमखोर है। इनके बीच से आपको राह बनानी हो तो इस्पाती मन लेकर, लंबी लड़ाई का इरादा करना होगा। दूसरी तरफ शोभा डे हैं, जो तेलंगाना नाम का नया राज्य बनने से ऐसी उत्कंठित हुईं कि ट्विटर पर लिख बैठीं कि मुंबई के साथ भी ऐसा ही क्यों नहीं हो सकता है? उन्होंने लिखा और सब उन पर पिल पड़े कि वे मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करना चाहती हैं।
सुभाषित देखिए- पेज 3 की लड़की..... राजनीतिक बयानबाजी करती है तो लोग सड़कों पर इसका जवाब मांगेंगे। शराबबाजी की पार्टियों में रहने वाली ऐसे मामलों में कैसे बोलती है। राज्य को तोड़ना तलाक लेने जैसा आसान काम नहीं है शोभा डे। एतराज के शब्द और तेवर! सबसे कैसे गंध उठती है।
शोभा डे भी शायद अब यह समझ सकें कि वे जिस दायरे में घूमती-जीती हैं, वह पूरा समुदाय कितना अवसरवादी और स्वार्थी है। इन दोनों महिलाओं को इसलिए बधाई कि इन दोनों ने हमें अलग-अलग कारणों से आईना दिखाया है और खुद भी देखा है शायद।