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दो त्रासदी, दोहरा रवैया
Thu, 20 Jun 2019 06:22 PM IST
Raman Singh
सुभाषिनी सहगल अली
सुभाषिनी सहगल अली
Published by: Raman Singh
Updated Thu, 20 Jun 2019 06:22 PM IST
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सुभाषिनी सहगल अली
- फोटो : A
देश के तमाम सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा रही हैं। केंद्र और अधिकतर राज्य सरकारों का ध्यान स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के बजाय उनके निजीकरण पर है। दुनिया में कहीं भी जनता के स्वास्थ्य की देखरेख निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों द्वारा नहीं, बल्कि सरकारी अस्पतालों और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं द्वारा की जाती है। पर हमारी सरकारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। ऐसे में प्रसार माध्यमों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। जनता के स्वास्थ्य से जुड़ी सच्चाई दिखाना, सरकारों की उदासीनता का खुलासा करना और अच्छे फैसलों का प्रचार करना जागरूक और जन हितैषी मीडिया का कर्तव्य है। पर पिछले दिनों अस्पतालों में घटी घटनाओं पर मीडिया का रुख निराशाजनक रहा।
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कोलकाता के सरकारी अस्पताल में एक मरीज की मौत के बाद परिजनों ने डॉक्टरों के साथ मारपीट की। निश्चित रूप से डॉक्टरों के साथ हमदर्दी होनी चाहिए और हमदर्दी जताई भी गई। तृणमूल सरकार ने अपने चिर-परिचित अंदाज में डॉक्टरों से बात करने से इनकार कर दिया। ममता बनर्जी पहले भी ऐसा कर चुकी हैं। पर तब उनकी ज्यादा आलोचना नहीं होती थी, क्योंकि उन्होंने माकपा को हराकर गद्दी संभालने का बड़ा काम जो किया था! अब चूंकि भाजपा उनको हटकर गद्दी संभालने की तैयारी में है, तो हालात बदले हुए हैं और मीडिया का रुख भी बदला हुआ है। अस्पताल के दरवाजे पर भाजपा की भीड़ प्रदर्शन करने पहुंच गई। देश भर के डॉक्टरों ने हड़ताल शुरू कर दी। यह चौबीस घंटे देखी जाने वाली खबर बन गई। डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून की जरूरत महसूस हुई, जैसे कि अभी तक उनसे मारपीट करना कानूनी था।
इसी बीच, बिहार में मुजफ्फरपुर के सरकारी अस्पताल में सौ से भी अधिक बच्चे चमकी बुखार से मर गए। कई दिनों तक यह खबर स्थानीय अखबारों में छिपी रही। फिर जब मरने वाले बच्चों की संख्या बढ़ने लगी, तो मीडिया ने इसका संज्ञान लिया, पर मंत्रियों पर टीका-टिप्पणी नहीं की गई। फिर मंत्रियों का दौरा शुरू हुआ और अस्पताल को बेहतर बनाने का वादा किया गया, जो 2013 में भी किया गया था। केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री पधारे और उन्होंने प्रेस वार्ता भी की। अंत में मुख्यमंत्री भी आए। यह ऐसी बीमारी है, जो उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से बिहार के तराई के इलाके में हर साल फैलती है। इसका इलाज है। इससे बचने के लिए टीका भी है। लेकिन कभी टीका नहीं लगाया जाता।
बीमारी और मौतों की गंभीरता पर पर्दा डालने के लिए कहा गया कि वे बच्चे लीची खाने से मरे। गरीबों के पास अपने बच्चों को लीची खिलाने के लिए पैसा होता, तो वे बच्चे कूपोक्षण के शिकार न बनते। दरअसल एक डॉक्टर ने बीमार बच्चों का सर्वेक्षण करते हुए पाया कि वे कुपोषण के शिकार हैं। डॉक्टर ने यह भी पाया कि बच्चे भूख मिटाने के लिए कच्ची लीची खा लेते हैं, जिससे उनका पेट खराब हो जाता है और चमकी बुखार की आशंका बढ़ जाती है।
पिछले साल केरल में एक नई बीमारी-निपाह वायरल-आ पहुंची थी। मरीजों की भर्ती के बाद ही पता चल पाया कि बीमारी का स्रोत क्या है। केरल की सरकार तत्काल सक्रिय हो गई। विदेश से भी संक्रमण के विशेषज्ञ बुलाए गए और बीमारी पर काबू पा लिया गया। संक्रमण और वायरस से संबंधित दुनिया के सबसे बड़े शोध संगठन ने केरल के मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को आमंत्रित कर उनके प्रयासों को सराहा। पर इस बारे में किसको पता है?
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।