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दो मजबूत स्तंभ ढहे: ममता-स्टालिन की हार से डगमगाई विपक्ष की इमारत, इंडिया गठबंधन के लिए बड़ा झटका

Tue, 05 May 2026 08:23 AM IST
Devesh Tripathi आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार
आरती आर जेरथ, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Devesh Tripathi Updated Tue, 05 May 2026 08:23 AM IST
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सार
ममता बनर्जी की पार्टी और एमके स्टालिन की हार इंडिया गठबंधन के लिए बहुत बड़ा झटका है। इसके दो सबसे मजबूत स्तंभ ढह गए हैं, जिससे विपक्ष की पूरी इमारत कमजोर और डगमगा गई है। जाहिर है, अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में इसका असर जरूर दिखेगा।
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Two strong pillars collapse Mamata Stalin s defeat shakes opposition edifice major blow to India alliance
इस हार की गूंज - फोटो : ANI

विस्तार

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में भाजपा की शानदार जीत भारतीय राजनीति में एक जबर्दस्त बदलाव का संकेत है। यह न केवल तृणमूल कांग्रेस नेता ममता बनर्जी, जो आज देश की सबसे कद्दावर महिला नेता हैं, की विदाई का प्रतीक है, बल्कि यह संभवतः क्षेत्रीय दलों और उनकी उप-राष्ट्रवाद तथा स्थानीय सांस्कृतिक पहचान की राजनीति के अंत की शुरुआत भी है। इसलिए, पश्चिम बंगाल का ‘भगवाकरण’ भाजपा के प्रभाव क्षेत्र में एक और राज्य के जुड़ने से कहीं ज्यादा है। यह एक धार्मिक-राजनीतिक विचारधारा के रूप में ‘हिंदुत्व’ की बढ़ती लोकप्रियता को दर्शाता है।


ममता बनर्जी की पार्टी की हार, जिसे तमिलनाडु के कद्दावर क्षेत्रीय नेता एमके स्टालिन और द्रमुक की हार के साथ मिलाकर देखा जाए, इंडिया गठबंधन के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। इसके दो सबसे मजबूत स्तंभ ढह गए हैं, जिससे विपक्ष की पूरी इमारत कमजोर और डगमगाती हुई रह गई है। जाहिर है, अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में इसका असर जरूर दिखेगा, जहां ‘इंडिया’ गठबंधन के एक और अहम स्तंभ (अखिलेश यादव और उनकी समाजवादी पार्टी) के सामने अब एक मुश्किल चुनौती है: भाजपा के खिलाफ लड़ाई में अपने कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल को बढ़ाना।


भले ही इस बात को लेकर सवाल उठते रहेंगे कि चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों की जल्दबाजी में की गई ‘विशेष गहन समीक्षा’ (एसआईआर) और 2.5 लाख अर्धसैनिक बलों की तैनाती जैसे सरकारी हस्तक्षेपों का चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ा, लेकिन एक ऐसे राज्य में, जहां लंबे समय से वामपंथी राजनीति का दबदबा रहा है (पहले माकपा और फिर बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का), यह पहली बार होगा, जब भाजपा का कोई मुख्यमंत्री बहुमत वाली सरकार की कमान संभालेगा। एसआईआर के दौरान लगभग 90 लाख नाम हटा दिए गए थे, जिनमें से 27 लाख नामों को ‘जांच के अधीन’ सूची में डाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने सत्यापन के लिए जो दस्तावेज जमा किए थे, उनमें तकनीकी त्रुटियां थीं। पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया को लेकर जो विवाद लगातार बने रहे हैं, उनका कोई संक्षिप्त जवाब नहीं है। हालांकि, दो बातें साफ हैं। पहली यह कि ममता ने भाजपा के हर हमले का जिस जोरदार और जोशीले अंदाज में मुकाबला किया, वह तारीफ के काबिल है। यहां तक कि उनके आलोचकों को भी मानना पड़ेगा कि उन्होंने अपने ‘बंगाल की शेरनी’ उपनाम को पूरी तरह से सही साबित किया। उन्होंने यह दिखा दिया कि वह ऐसी इन्सान नहीं हैं, जो आसानी से किसी के आगे झुक जाएं। आखिरकार, उन्होंने पश्चिम बंगाल की सड़कों पर कई दशकों तक वाम मोर्चा की सरकार से लोहा लेते हुए अपनी पहचान बनाई है।

दूसरी बात यह है कि 2021 के चुनावों में उनसे करारी हार मिलने के बाद, भाजपा ने उनकी हार की पटकथा बेहद बारीकी से तैयार की। पार्टी ने जमीनी स्तर पर मतदान के रुझान का विस्तृत अध्ययन करने के लिए काम शुरू कर दिया, जिसमें आरएसएस ने भी मदद की। हर निर्वाचन क्षेत्र का नक्शा तैयार किया गया, कमजोर क्षेत्रों की पहचान की गई, लोगों के मिजाज का लगातार सर्वेक्षण किया गया और एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई। भाजपा ने दो ऐसे कारकों का लाभ उठाया, जो ऊपरी तौर पर स्पष्ट नहीं थे। पहला, तृणमूल कांग्रेस के प्रति बढ़ता असंतोष; और दूसरा, वह कार्यप्रणाली, जिसे तृणमूल ने वामपंथियों से हूबहू अपना लिया था, यानी फुटबाल क्लबों, सामाजिक और सांस्कृतिक समितियों में बाहुबलियों के स्थानीय दस्तों को पालना-पोसना।

दिलचस्प बात है कि जहां एक ओर ममता खुद बेहद लोकप्रिय बनी हुई हैं, खासकर महिलाओं के बीच, वहीं मौजूदा विधायकों और पूरी सरकार के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर साफ तौर पर मौजूद थी। इसे राज्य के बाहर से आए पत्रकारों ने तो भांप लिया, लेकिन बंगाल में रहने वाले इसे समझने से चूक गए। हालांकि, ममता ने सत्ता-विरोधी लहर का मुकाबला करने के लिए अपने मौजूदा विधायकों में से लगभग 40 फीसदी को बदल दिया था, लेकिन भाजपा ने लोगों की नाराजगी को पहले ही भांप लिया था तथा उसे और हवा दी। दूसरी बात थी बंगाली हिंदुओं में छिपा हुआ इस्लामोफोबिया। भाजपा घुसपैठियों (बांग्लादेशी मुसलमानों) के बारे में लगातार अभियान चलाकर बता रही थी कि किस तरह वे ममता की मदद से पश्चिम बंगाल की आबादी का ढांचा बदल रहे हैं। इस अभियान ने न केवल बंगाली ‘भद्रलोक’ को प्रभावित किया, जो उदारवादी परंपराओं को बहुत पहले ही भुला चुके हैं, बल्कि उन महत्वाकांक्षी ग्रामीणों को भी अपनी ओर खींचा, जो बढ़ती कीमतों, बेरोजगारी और विकास के अवसरों की कमी के बोझ तले दबे थे। ये ग्रामीण लोग अपनी असंतुष्टि के लिए मोदी सरकार के बजाय, तृणमूल सरकार को जिम्मेदार ठहराते नजर आए।

बंगाल में भाजपा की शानदार जीत का श्रेय काफी हद तक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को जाता है, जो लगभग एक महीने तक पश्चिम बंगाल में ही डटे रहे और चुनावी गतिविधियों पर नजर रखते रहे। भाजपा के बारे में यह कहा जाता है कि एक बार किसी राज्य पर पूरी तरह से नियंत्रण हासिल कर लेने के बाद, वह उसे कभी नहीं गंवाती।

आज, भाजपा के प्रभुत्व का दायरा पश्चिम में महाराष्ट्र और गुजरात से लेकर, उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों से होते हुए पूर्व में पश्चिम बंगाल और असम तक, और देश के सबसे पूर्वोत्तर छोर तक फैला हुआ है, जहां वह स्थानीय पार्टियों के साथ गठबंधन सरकारों में सत्ता में है। इससे उसे अपनी पूरी ताकत दक्षिणी राज्यों को जीतने पर लगाने की आजादी मिल जाती है। इन पांच राज्यों में से तीन (केरल, तेलंगाना और कर्नाटक) में उसका मुख्य मुकाबला कांग्रेस से है, जो उत्तर भारत में ‘भगवा लहर’ को रोकने में ज्यादातर नाकाम ही रही है। पश्चिम बंगाल में ‘भगवा लहर’ इस बात को रेखांकित करती है कि भारत बदल रहा है। यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनीतिक परिदृश्य में एक समतलीकरण देखने को मिल रहा है, जो भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति को बल प्रदान करता है।

हर लोकतंत्र को फलने-फूलने और मजबूत बने रहने के लिए एक विपक्ष की जरूरत होती है। बाजार के विकास और एक जैसी जन-संस्कृति के फैलाव से जो नया भारत उभर रहा है, उसे शायद पारंपरिक पार्टियों से बिल्कुल अलग तरह के विपक्ष की जरूरत है। मौजूदा विपक्षी पार्टियां भाजपा की जबर्दस्त चुनावी मशीनरी के आगे ताश के पत्तों की तरह ढहती नजर आ रही हैं।
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