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एक देश की दो तस्वीरें

Mon, 08 Jul 2013 05:03 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Mon, 08 Jul 2013 05:03 PM IST
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two faces of one country

इस देश के दो यथार्थ हैं। एक वह, जो दिल्ली से दिखता है। दूसरा वह, जो दिल्ली के बाहर से दिखता है। जब भी मैं देश के किसी देहाती क्षेत्र के दौरे से दिल्ली लौटती हूं, ऐसा लगता है, जैसे मैं किसी दूसरे देश में पहुंच गई हूं।

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पिछले सप्ताह राजस्थान के गांवों का मैंने लंबा दौरा किया, जहां मैंने देखे ऐसे स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र, जिनका खंडहरों से भी बदतर हाल था। मैंने सड़कें ऐसी देखीं, जो इतनी टूटी हुई थीं कि उन पर गाड़ी लुढ़क-लुढ़क कर चलती थी।
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मुझे मिले ऐसे लोग, जिनकी समस्याएं बिजली, पानी, सड़क, रोजगार को लेकर थीं। इतने तंग थे ये लोग सरकार की नाकामियों से, कि उन्होंने की मुख्यमंत्री की आलोचना। एक सरपंच के शब्दों में, अब बांट रहे हैं खैरात हमारे मुख्यमंत्री पेंशन देकर, सस्ता अनाज देकर, साड़ियां देकर, लैपटॉप देकर।...इतना पैसा था अगर राजस्थान सरकार के पास, तो पहले क्यों नहीं खर्चा गांवों के विकास पर?
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जहां गई, मुझे सुनने को मिले शिकायतें इतनी कि सुनकर थक गई। जहां गई, मिले ऐसे लोग, जिन्होंने साफ बताया कि जरूरत है नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री की। मैंने जब उनसे पूछा कि नरेंद्र मोदी को पसंद क्यों करते हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि उन्होंने टीवी पर उनके भाषण सुने, जो अच्छे लगे। उन्होंने देखा है कि गुजरात में कितना विकास हुआ है।

एक दोपहर ग्रामीण अधिकारियों से बातें करने बैठी, तो उन्होंने अरावली पहाड़ियों में अवैध खनन को बहुत बड़ा मसला बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण को बचाने के लिए प्रतिबंध लगाया था पिछले साल इन पहाड़ियों में हर तरह के खनन पर। इसके बावजूद अवैध खनन इतना बढ़ गया है कि पर्यावरण को नुकसान दोगुना हो रहा है और खनन से पैसे कमाने वालों का धन भी दोगुना हो गया है।

इन अधिकारियों ने मुझे बताया कि खाद्य सुरक्षा कानून बनता है, तो भी न अनाज सुरक्षित रखने का कोई प्रबंध है उनके पास और न ही उसके वितरण का। एक विकास अधिकारी ने कहा, गोदामों का इतना अभाव है कि हम उस अनाज को भी सुरक्षित नहीं रख पाते हैं, जो आता है पीडीएस द्वारा बीपीएल परिवारों में वितरण करने के लिए। कानून बन जाने के बाद इतना अनाज आएगा कि समझ में नहीं आता कि रखेंगे कहां।

जिस दिन वापस दिल्ली आई हूं मैं, उसी दिन खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को सोनिया-मनमोहन सरकार की मंजूरी मिल गई। अगले दिन राष्ट्रपति ने भी इस पर दस्तखत कर दिए। सोनिया जी की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद ने काम किया है इस पर, सो जाहिर है कि न मनमोहन सिंह जी इसका विरोध कर सकते थे और न ही उनके कोई मंत्री।

लेकिन भारतीय जनता पार्टी क्यों समर्थन कर रही है इसका? शायद इसलिए कि दिल्ली दरबार में जो पहुंचते हैं एक बार राजनीतिज्ञ किसी भी दल के, तो उनके लिए यथार्थ बदल जाता है।

ऐसा मेरे पत्रकार बंधुओं के साथ भी हो जाता है। सो उनके लिए सबसे बड़ी खबर पिछले सप्ताह बनी इशरत जहां मामले में गुजरात के सात पुलिस अधिकारियों का आरोपी बनाया जाना।

टीवी पर चर्चाओं का यह सबसे बड़ा मुद्दा बना और अखबारों की सुर्खियों में छाया रहा, क्योंकि अगर पुलिस अफसरों को दोषी ठहराया जाता है फर्जी मुठभेड़ करने का, तो उन राजनेताओं तक तार खिंचेंगे जिनके आदेश के बिना इस तरह की मुठभेड़ नहीं हो सकती।

इस बात को लेकर मेरे कई पत्रकार दोस्त बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी नजरों में मोदी खलनायक हैं। मैंने जब उनसे कहा कि राजस्थान के देहातों में मोदी बहुत बड़े हीरो हैं, तो उनको आश्चर्य हुआ।

कहा था न कि दो यथार्थ हैं भारत देश के। दिल्ली के राजनीतिज्ञ और सरकारी अधिकारी ही नहीं हैं, जिनकी दृष्टि बदल जाती है इस राजधानी में रहकर, हम पत्रकारों की भी बदल जाती है इतनी कि धुंधला-सा दिखता है बाकी देश यहां से।


दूसरी बात यह भी है कि इस गर्मी में कौन जाएगा दिल्ली की गलियां छोड़कर देहातों में। कौन जाएगा ठंडे, सुहाने एसी दफ्तरों को छोड़कर ऐसे गांवों में, जहां बिजली न होने की वजह से न रोशनी होती है न पंखे चलते हैं। सो दिल्ली और भारत में फासले बढ़ रहे हैं दिन-ब-दिन इतने कि हम दिल्ली वाले आजकल समझ ही नहीं पाते कि शीशे के मॉल के अलावा भी है इस देश का कोई यथार्थ।

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