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ट्वीट कम करें, पढ़ें ज्यादा
फ्रैंक ब्रूनी
Updated Thu, 02 Jan 2014 11:19 AM IST
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मेरी मां हमेशा सलाह बांटती रहती थीं, जिनमें से कुछ ही मौलिक होती थीं। वर्ष 2013 की विदाई और नए वर्ष के स्वागत के मौके पर जब मैं उनकी चेतावनियों के बारे में सोचता हूं, तो मुझे विशेष तौर पर उनकी एक चेतावनी याद आती है।
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वह अक्सर कहती थीं कि बोलने से पहले दस बार सोचो। उनके कहने का मतलब सिर्फ यही नहीं था कि एक बार जब आप कोई बात बोलते हैं, तो उससे मुकर नहीं सकते, बल्कि उनके कहने का आशय था कि मौन वह जगह है, जहां भावनाएं शांत होती हैं, शिष्टाचार को संजीवनी मिलती है और ज्ञान को उसकी उड़ान के लिए पंख मिलते हैं।
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मैं अक्सर सोचता हूं कि उनकी मृत्य के लंबे समय समय बाद पैदा हुए सोशल मीडिया के बारे में उनके क्या विचार होते। सोशल मीडिया एक ऐसी दुनिया है, जिसमें हममें से कई लोग तीन गिनने से पहले ही त्वरित अभिव्यक्ति का मौका पाने के लिए प्रवेश करते हैं और अनियोजित, अपरिपक्व विचार व्यक्त करते हैं या क्षुब्ध प्रतिक्रिया जाहिर करते हैं। कई बार ऐसा लगता है, जैसे चिंतन की जगह बलगम ने ले ली है और समझ पर गति हावी है।
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मैं दिनोंदिन बढ़ती उस प्रवृत्ति पर बात कर रहा हूं, जिसमें एक सौ चालीस या उससे भी कम कैरेक्टर के जरिये अपनी त्वरित प्रतिक्रिया जताकर एक से एक नामचीन लोग अपनी प्रतिष्ठा और करियर पर धब्बा लगाने का काम कर रहे हैं। अब न्यूयॉर्क की एक नामचीन शख्सियत का ही मामला लीजिए, जिसने हाल ही में ट्वीट किया कि उन्हें दक्षिण अफ्रीका में एड्स के बारे में चिंतित होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि वह श्वेत हैं! मैं यहां मजाक की सहनशक्ति और मारकता के तौर-तरीकों के बारे में बात कर रहा हूं।
हमारे उस ऑनलाइन शिष्टाचार की तरफ हाल ही में अकादमिक जगत का थोड़ा-सा ध्यान गया है, जहां हममें से अनेक लोग ज्यादा समय बिताते हैं। इस तरफ उचित ही ध्यान गया है कि मैसेज बोर्ड और फेसबुक पर असभ्यता कितनी ज्यादा जगह बना रही है और यह वाद-प्रतिवाद किस तेजी से गंदगी में तब्दील होता जा रहा है। बेशक यह काम टुकड़ों-टुकड़ों में होता है, क्योंकि संदेशों का यह आदान-प्रदान तो अदृश्य रूप से ही होता है। इसके बावजूद ये संदेश इतने प्रभावी होते हैं कि उन पर जवाबी टिप्पणियां करना अनिवार्य हो जाता है। इन टिप्पणियों की ध्वनि उनकी शैली की ही पुष्टि करती है। दोनों ही असभ्य होते हैं।
इसके विपरीत, 2013 में एक ऐसी गतिविधि के फायदों पर बात हुई, जो कुछ मायनों में सोशल मीडिया पर लगातार पोस्ट डालने अलग है। वह गतिविधि है, गल्प का पाठ। कुछ शोधकर्ताओं के मुताबिक, पढ़ने वाले लोग अपने आसपास के लोगों की सोच और भावनाओं के प्रति ज्यादा समानुभूति रखते हैं। मैं इसे मानता हूं। ऐसा कहकर मैं सांस्कृतिक दंभ नहीं पाल रहा या ऐसा इसलिए नहीं कह रहा कि मैं तकनीकी विकास का विरोधी हूं। विश्वास कीजिए, मैं बहुत ज्यादा टेलीविजन देखता हूं।
मैं ज्यादातर अखबार और पत्रिकाएं ऑनलाइन ही पढ़ता हूं और मेरी लगभग सारी किताबें मेरे आईपैड पर हैं। मैं अपनी दोस्तियां बचाने के लिए कृतज्ञतापूर्वक ई-मेल और ऑनलाइन संदेशों पर निर्भर हूं। लेकिन मेरा मानना है कि कथा या कथेतर साहित्य का पाठ आपको दूसरों की अनुभूतियों के निकट ले जाता है, आपको शांत रखता और उदार बनाता है। पढ़ने की आदत आपको तेजी से आपके बाहर नहीं ले जाता, बल्कि दूसरों के विचारों को समझने की क्षमता भी देता है। इससे त्वरित अभिव्यक्ति की गति धीमी पड़ती है और व्यक्ति चुप रहने के लिए बाध्य होता है।
पिछले हफ्ते मैंने एक अद्भुत किताब पढ़ी। वह चर्चित समाज-मनोविज्ञानी जोनाथन हेट की 2012 में प्रकाशित किताब द राइटस माइंडः ह्वाई गुड पीपुल आर डिवाइडेड बाइ पॉलिटिक्स ऐंड रिलिजन थी। इसमें भावनाओं और तर्क के बीच के संबंधों पर गहराई से प्रकाश डाला गया है। जिस युग में अपने विचारों के अंध समर्थक खुली बहस करने के बजाय अपनी बात पर अड़े रहने और अपने विचारों की परिधि से बाहर न निकलने के लिए कुख्यात हैं, उस दौर में जोनाथन हेट की यह टिप्पणी बहुत प्रासंगिक है कि लोग ऐसी सूचनाओं को बहुत गंभीरता से लेते हैं, जो न सिर्फ उनके पूर्वाग्रहों को चुनौती देते हों, बल्कि जिनका तत्काल जवाब देना भी संभव न हो। ऐसे में, समाधान चुप रहने और विचारों की गहराइयों में उतरने का है।
पर क्या इन दिनों ऐसी स्थिति है? इसके बजाय ट्वीटर और दूसरे साइबर स्पेस में अपनी अधिक से अधिक मौजूदगी दर्ज कराने की प्रवृत्ति ही देखी जा रही है। वर्ष 2014 और उससे आगे हमारी अनेक चुनौतियों में से एक यही होना चाहिए कि हम सोशल मीडिया का ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाएं, साथ ही, इसके दुर्गुणों को खत्म करें। सोशल मीडिया पर आप जिनसे असहमत होते हैं, उनके पास न सिर्फ जानकारियों का अभाव होता है, बल्कि वे अल्पबुद्धि, भ्रष्ट और बुरे भी होते हैं। शिकायत प्रलाप में बदल जाती है और प्रलाप उग्र भाषण में।
यह प्रवृत्ति टीवी न्यूज शो से लेकर कांग्रेस और प्रांतों के विधानमंडलों तक चलती है, जहां लड़ाकू जनप्रतिनिधि पहले चिल्लाते हैं, फिर सवाल पूछते हैं। दो दशकों से ज्यादा समय से फास्ट फूड के विरोध में स्लो फूड आंदोलन चल रहा है। पिछले कुछ वर्षों से स्लो टीवी भी हमारी आदत में शुमार हो गई है। लेकिन अब हमें जिस चीज की जरूरत है, वह है धीमी बहस। यह बात-बात पर हमारे रैपिड फायर गुस्से पर अंकुश लगाएगा। इससे हम ज्यादा स्वस्थ होंगे और खुश भी।