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नए मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश
कुमार विजय
Updated Tue, 26 Nov 2013 07:47 PM IST
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अब एक ऐसी पीढ़ी वोट दे रही है, जिसका जन्म देश में 1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद हुआ। यह वह दौर था, जब समाज से इतर व्यक्तिगत आकांक्षाएं तेजी से हावी हो रही थीं। आर्थिक उदारीकरण ने सामाजिक ताने-बाने के साथ ही समाज की सोच को भी प्रभावित किया है, जिसका असर देश की सियासत पर पड़ा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह पीढ़ी जब 2014 के लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट डालेगी, तो उसकी प्राथमिकताएं क्या होंगी, उसके मुद्दे क्या होंगे।
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यह बात अक्सर दोहराई जाती है कि भारत आज अपेक्षाकृत युवा है, जहां की आधी से अधिक आबादी की उम्र 18 से 35 वर्ष के बीच है। वास्तव में आज देश का हर पांचवां मतदाता 18 से 23 वर्ष वाले आयु वर्ग से है। देश के कुल मतदाताओं की संख्या के लिहाज से देखें, तो 20.6 फीसदी मतदाता इसी आयु वर्ग से हैं। इनमें 14.32 फीसदी ग्रामीण मतदाता हैं और सिर्फ 6.28 फीसदी शहरी। इस वर्ग का सर्वाधिक 3.9 फीसदी मतदाता उत्तर प्रदेश से है। 1.82 फीसदी के साथ महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर और 1.63 फीसदी के साथ बिहार तीसरे स्थान पर है।
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शिक्षा और रोजगार जैसे स्थायी मुद्दे तो इस वर्ग को प्रभावित करते ही हैं, संचार क्रांति और सोशल नेटवर्किंग के जरिये इस वर्ग की आकांक्षाओं ने भी विस्तार पाया है। इसके अलावा यह वर्ग सुशासन जैसे मुद्दे पर भी कहीं ज्यादा मुखर है। ऐसे में हैरत नहीं कि तमाम राजनीतिक पार्टियों की नजर इस युवा मतदाता पर है।
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान भी देखा जा सकता है कि किस तरह राजनीतिक दल इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा तो बाकायदा नव मतदाता सम्मेलन आयोजित कर रही है। इसके अलावा उसने मोबाइल ऐप भी तैयार किया है, जो नए मतदाताओं को पहचान पत्र बनवाने में मदद करेगा। वहीं कांग्रेस भी इस आयु वर्ग के मतदाताओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने भाषणों में कहते हैं कि केंद्र में अगली सरकार युवाओं और गरीबों की बनेगी।
उत्तर प्रदेश से लेकर छत्तीसगढ़ तक जिस तरह छात्रों और युवाओं को लुभाने के लिए लैपटॉप और टैबलेट से लेकर साइकिलें दी जा रही हैं, उसका मकसद भी युवा मतदाताओं को आकर्षित करना ही है। जिस तरह के वायदे राज्य सरकारों ने किए हैं, उसके मुताबिक अपने देश में आने वाले पांच वर्षों के दौरान विद्यार्थियों को करीब एक करोड़ लैपटॉप मुफ्त बांटे जाने हैं। तमिलनाडु की जयललिता सरकार की योजना के मुताबिक, राज्य में आने वाले पांच वर्षों के दौरान विद्यार्थियों को 68 लाख लैपटॉप मुफ्त में बांटे जाने हैं।
इसी तरह उत्तर प्रदेश में 12वीं पास 15 लाख बच्चों को लैपटॉप बांटे जाने की प्रक्रिया जारी है। राजस्थान में भी ऐसी योजना का ऐलान हुआ है। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि उत्तर प्रदेश के केवल 34.84 फीसदी स्कूलों में और राजस्थान के 44.5 फीसदी स्कूलों में ही बिजली की सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में, ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की भी जरूरत है, ताकि देश में समाहित विकास की अवधारणा को मजबूती मिल सके।
दूसरी बात है कि 18 से 23 वर्ष के बीच के आयु वर्ग का जो मतदाता है, उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की उपलब्धता को लेकर है। पहली बार वोट दे रहे मतदाताओं को लेकर किए गए एक सर्वेक्षण में इस वर्ग के 76 फीसदी से भी अधिक लोगों का कहना था कि बेहतर रोजगार उनकी पहली प्राथमिकता है।
मगर सवाल है कि देश में रोजगार की उपलब्धता कैसे बढ़ाई जाए। यह विडंबना है कि देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के एजेंडे पर ऐसी प्राथमिकता दिखाई नहीं देती है। इसके उलट वे लोकलुभावन योजनाओं के जरिये युवाओं का दिल जीतना चाहती हैं।
एक और चिंता की बात है कि ग्रामीण युवा मतदाताओं की संख्या अधिक होने के बावजूद ग्रामीण विकास भी राजनीतिक दलों की प्राथमिकता में नजर नहीं आता। ले-देकर बात आती भी है, तो मनरेगा जैसी योजनाओं की, जिसे रोजगार का स्थायी जरिया नहीं माना जा सकता। वास्तव में ठोस कार्यक्रम के बिना इस वर्ग को लुभाना आसान नहीं होगा।