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बैंक घोटाले की हकीकत

Tue, 10 Apr 2018 05:55 PM IST
मधुरेन्द्र सिन्हा
मधुरेन्द्र सिन्हा Updated Tue, 10 Apr 2018 05:55 PM IST
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Truth about Bank scam
महिला

पिछले कुछ वर्षों से बैंकों में घोटालों की खबरें लगातार आ रही हैं। नीरव मोदी, जो कभी भारतीय हीरा व्यवसाय का सितारा था, बैंकों के हजारों करोड़ रुपये लेकर अचानक रफूचक्कर हो गया। इसके बाद तो जैसे बांध टूट गया। एक के बाद एक बैंकों में घोटालों की खबरें आने लगीं। गड़े मुर्दे उखाड़े जाने लगे और सरकारी बैंकों के कामकाज पर उंगलियां उठने लगीं। इससे पहले विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर पर हजारों करोड़ रुपये की देनदारी थी, जो न चुका पाने के कारण उनकी तमाम संपत्ति जब्त कर ली गई और वे देश छोड़कर भाग गए। अब तो बैंकों के साथ धोखाधड़ी के कई बड़े-बड़े मामले सामने आ चुके हैं और आ रहे हैं। इस मुद्दे पर जबर्दस्त राजनीति भी हो रही है और एनडीए सरकार बचाव की मुद्रा में है। नीरव मोदी मामले की सीबीआई, ईडी द्वारा जांच चल रही है, पर इसकी संभावना कम ही है कि उसे कर्ज देने वाले पंजाब नेशनल बैंक के डूबे पैसे मिल पाएंगे। नीरव मोदी विजय माल्या की तरह राजनेताओं से जुड़ा नहीं था और उसकी पहुंच वित्त मंत्रालय तक नहीं थी। लेकिन उसने जिस होशियारी से अपनी ब्रांड वैल्यू बनाई और अपने को ग्लैमर तथा चकाचौंध की दुनिया में स्थापित किया, उससे उसके रास्ते खुल गए। उसे कर्ज देने के लिए बैंकों में होड़ लगी रहती थी और पूंजी उसके लिए कोई समस्या नहीं रही। अपना कारोबार बढ़ाने के लिए बाद में उसने धोखाधड़ी का सहारा लेना शुरू किया।


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सरकारी बैंकों के साथ ऐसा क्यों हुआ? इसके लिए हमें बैकों के कामकाज के तरीके को समझना होगा। बैंक अपने यहां जमा राशि को ही कर्ज के रूप में देते हैं और उसके ब्याज से मुनाफा कमाते हैं। बड़ा कर्ज कारोबारियों, व्यापारियों, आयातकों-निर्यातकों वगैरह को दिया जाता है। यह राशि करोड़ों ही नहीं, अरबों रुपये में हो सकती है। जब बड़े-बड़े कारोबारी कर्ज लेते हैं, तो बैंक उनके लिए ज्यादा सिक्योरिटी की मांग नहीं करते। बड़े कर्ज के लिए सिक्योरिटी कितनी हो, यह निर्धारित नहीं है। जाहिर-सी बात है कि 500 करोड़ रुपये का कर्ज लेने वाली कंपनी उतने तो क्या, उसके एक चौथाई की भी सिक्योरिटी दे नहीं सकती। इसलिए बैंक कर्ज लेने वाले की बाजार साख, उसका कारोबारी अनुभव, नए बिजनेस के लिए उसकी योजना, भविष्य की परियोजनाओं और लाभ के संभावित आंकड़ों को ध्यान में रखते हैं। अच्छी साख और नाम वाले ग्राहकों को अपनी ओर खींचने में सभी बैंक लगे रहते हैं। यह स्पर्धा भी कई बार नीरव मोदी सरीखे ग्राहकों को बेईमानी का मौका दे देती है। बैंक अपने मोटे ग्राहकों को हाथ से जाने नहीं देना चाहते, जिसका वे कई बार नाजायज फायदा उठा लेते हैं। विजय माल्या के मामले में तो वित्त मंत्रालय की सिफारिश भी खूब हुई। कुछ अन्य मामलों में बैंकों के बड़े अफसरों की भी अनुशंसा रही और वे संदेह के घेरे में आ गए। साफ है कि बैंकों के काम करने के तरीके के चलते जालसाजों ने अरबों रुपये की राशि हड़प ली और देश छोड़कर चले गए। बैंकों के पैसे वापस लाने का अब कोई तरीका नहीं दिख रहा है, ठीक वैसे ही, जैसे हर्षद मेहता काल में हुआ।
 
ये बड़े घोटाले जहां बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करते हैं वहीं प्रबंधन की लापरवाही को भी दर्शाते हैं। इसके लिए रिजर्व बैंक भी कम जिम्मेदार नहीं है, जिसने अपनी नाक के नीचे इतना कुछ होने दिया। ऐसा नहीं है कि उसके अधिकारियों को चुनींदा ग्राहकों को अंधाधुंध तरीके से कर्ज दिए जाने का अंदाजा नहीं रहा होगा। रिपोर्ट आ रही है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग ने पंजाब नेशनल बैंक के घोटालों के बारे में रिजर्व बैंक को बताया था। आयोग का कहना है कि अगर रिजर्व बैंक ने समय-समय पर ऑडिट कराए होते, तो इस स्थिति से बचा जा सकता था। नीरव मोदी का मामला तो इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि उसमें कारोबार विदेशी मुद्रा में हो रहा था, जो कहीं ज्यादा जोखिम भरा था। आयोग की यह बात भी सही है कि यह बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरी का मामला है और इसके लिए हर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। पर इतना जरूर है कि बैंकों ने ऐसे मामलों में लापरवाही बरती और उचित नियमों का पालन नहीं किया। अगर समय-समय पर ग्राहकों के खातों पर ध्यान दिया जाता, तो इतना बड़ा घोटाला नहीं होता। सच तो है कि बैंक इस तरह की जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे।

अब यह शोर मच रहा है कि बैंकों का फिर से निजीकरण कर दिया जाए, लेकिन ऐसा कहने वाले पुराने दिन भूल जाते हैं, जब प्राइवेट बैंकों में बड़े घोटाले हुआ करते थे। हाल में भी कुछ प्राइवेट बैंकों में बहुत घोटाले हुए, जिनमें से कुछ का बड़े बैंकों में विलय कर दिया गया। इनमें बैंक ऑफ राजस्थान, हिन्दुस्तान कॉमर्शियल बैंक, कराड बैंक वगैरह थे। इनके प्रवर्तकों ने इन्हें लगभग खोखला कर दिया, जिससे सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। प्राइवेट बैंकों में भी ऐसी कोई खास बात नहीं होती कि वे घोटालों से बचे रह सकते हैं। अभी देश का एक प्रमुख प्राइवेट बैंक आईसीआईसीआई सुर्खियों में है और कहा जा रहा है कि वीडियोकॉन को कर्ज देने में वहां भी हेराफेरी हुई है। कमीशन के बदले बड़े कर्ज देने की बात सामने आ रही है। इसी तरह एक अन्य बड़े प्राइवेट बैंक ऐक्सिस बैंक भी आरोपों के घेरे में है। नोटबंदी के दौरान वहां के दर्जनों अफसर-कर्मचारी हेराफेरी करते पकड़े गए थे।

प्राइवेट बैंकों के लालची प्रमोटर मनमानी करते हैं, जिससे छोटे ग्राहकों के पैसे डूबने का खतरा बना रहता है। इसलिए यह कहना कि निजीकरण इस समस्या का हल है, ठोस तर्क नहीं है। बैंकों में पैसा जनता का है, चाहे वह प्राइवेट हों या सरकारी। अब समय सरकारी बैंकों के कामकाज में कमियों को दूर करने और बैंकिंग प्रणाली की खामियों को दूर करने का है। जरूरत है कि इनमें पारदर्शिता लाई जाए। इसके लिए वहां बड़े पदों पर नियुक्तियों तथा तबादलों में मनमानी तथा राजनीतिक हस्तक्षेप बंद किया जाए। लोगों का इनसे विश्वास न हट जाए, ऐसा महती प्रयास होना चहिए। 

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