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फिर पाकिस्तान पर भरोसा करते ट्रंप

kuldeep talwarकुलदीप तलवार Updated Thu, 05 Dec 2019 06:41 AM IST
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप - फोटो : PTI
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले महीने अचानक अफगानिस्तान पहुंच गए और विगत सितंबर में तालिबान के हाथों एक अमेरिकी सैनिक के मारे जाने के बाद रद्द की गई शांति वार्ता दोबारा शुरू करने की घोषणा की। ट्रंप के बयान के एक दिन बाद तालिबान ने कहा कि इस बारे में कहना अभी जल्दबाजी होगा। ट्रंप का यह दौरा वाशिंगटन और काबुल के बीच कैदियों की अदला-बदली के बाद हुआ है और इसने तालिबान के साथ शांति समझौते की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। दरअसल तालिबान ने अगस्त, 2016 में काबुल यूनिवर्सिटी के एक अमेरिकी व ऑस्ट्रेलियाई प्रोफेसर का अपहरण कर लिया था, जिन्हें उन्होंने अब रिहा किया है। इस रिहाई के बदले अफगान सरकार ने तालिबान से जुड़े हक्कानी नेटवर्क के तीन खूंखार आतंकवादी छोड़े थे। आम ख्याल यह है कि अदला-बदली की यह डील तालिबान और अमेरिका के बीच सीधे तय हुई। इसमें पाक की कोई भूमिका नहीं थी।
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ट्रंप को शायद अब भी उम्मीद है कि पाकिस्तान शांति समझौता कराने में योगदान करेगा। जबकि अफगान सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा के मुखिया कह चुके हैं कि शांति  वार्ता का नतीजा तब तक सामने नहीं आएगा, जब तक पाकिस्तान अपनी दखलअंदाजी नहीं रोकता। अमेरिकी संसद की स्वतंत्र और द्विदलीय कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) की रिपोर्ट के अनुसार अफगानिस्तान में भारत की सामरिक, कूटनीतिक और वाणिज्यिक उपस्थिति से पाक भयभीत है। वह काबुल में एक कमजोर सरकार चाहता है और वहां भारत का असर भी कम करना चाहता है। जबकि अफगानिस्तान में भारत के भारी निवेश और सामाजिक ढांचे को लेकर किए गए उसके काम की अमेरिका ने तारीफ की है।

अफगानिस्तान के अंदरूनी मामलों में हमेशा दखल देने के कारण पाकिस्तान के साथ उसके संबंध तनावपूर्ण ही रहे हैं। नौबत सीमापार से छोटे हथियारों की फायरिंग से बढ़कर भारी हथियारों और रॉकेटों के साथ एक-दूसरे की चौकियों पर हमलों तक पहुंच जाती है। वैसे में पाकिस्तान को अफगानिस्तान के साथ अपनी सरहद बंद करनी पड़ती है। पाकिस्तान से खुराक और रोजमर्रा की चीजों की आपूर्ति बंद होने से आम अफगानी को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसके कारण अफगान अवाम में पाक के प्रति भारी रोष है। असली मसला तो साझा सरहद का है, जिसे डुरंड लाइन कहा जाता है। पाक डुरंड लाइन को साझा सरहद मानता है, पर अफगानिस्तान इसे स्वीकार नहीं करता। इन हालात में पाकिस्तान पहले की तरह अफगानिस्तान में एक ऐसी सरकार चाहता है, जो उसकी उंगलियों पर नाचे।

तस्वीर का एक रुख यह है कि पिछले दो-तीन महीने में तालिबान और दूसरे आतंकी समूहों ने अफगानिस्तान और उसके सीमावर्ती क्षेत्र में अपनी विध्वंसक कार्रवाई तेज की है। अफगानिस्तान में अमेरिकी बलों के लंबे अभियान के बावजूद वहां आतंकवाद की जड़ों को कमजोर नहीं किया जा सका। हिंसा के दौरान अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के चुनाव के समय मतदान के लिए बहुत कम लोग घर से बाहर निकले थे।

अंततोगत्वा कहा जा सकता है कि पाकिस्तान से कई बार धोखा खाने के बावजूद ट्रंप उम्मीद पाले हुए हैं कि पाकिस्तान अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाएगा। ट्रंप को इस गलतफहमी से बाहर निकलना होगा और पाक के तथाकथित सहयोग के बिना तालिबान व अफगान सरकार से सीधी बातचीत करनी होगी। तभी अफगानिस्तान में शांति बहाली का कोई ठोस हल निकलेगा।
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