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एकादशी उपवास का सच्चा अर्थ
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 15 Apr 2013 09:12 PM IST
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महान विरक्त संत स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी महाराज वृंदावन के एक आश्रम में रहकर धर्म प्रवचन कर रहे थे। वह श्रद्धालुजनों को भगवान की पूजा के साथ-साथ माता-पिता तथा वृद्धजनों की सेवा करने की भी प्रेरणा दिया करते थे।
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एक दिन एकादशी का पर्व था। कुछ साधुजन आश्रम के संचालक के साथ झगड़ने लगे कि एकादशी-उपवास की खाद्य सामग्री तैयार होने में देर हो गई है। स्वामी जी ने यह दृश्य देखा, तो उन्होंने सभी साधुओं को अपने पास बुलाया और कहा, आप लोग उपवास का सच्चा अर्थ नहीं समझ पाए हैं।
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उपवास का अर्थ है, प्रभु के समीप वास करने की साधना करना। जिस सत्कर्म से हम प्रभु के समीप पहुंच सकें, उसे करने का नाम उपवास है। उपवास के नाम पर स्वादिष्ट भोजन करना, फलाहार के नाम पर कई-कई बार फल खाते रहना, उपवास नहीं, बल्कि प्रभु से दूर करने वाला 'अपवास' है।
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स्वामी जी ने कुछ क्षण मौन रहने के बाद कहा, एकादशी के पावन दिन भोजन की लालसा से ही नहीं, स्वाद-अस्वाद की कल्पना से भी बचना चाहिए। आप लोग साधु होकर भी झगड़ रहे थे। एकादशी के दिन तो पूर्ण शांत रहकर इंद्रियों पर नियंत्रण करना चाहिए।
स्वामी जी के मुख से उपवास का सच्चा अर्थ सुनकर सभी साधु पश्चाताप करने लगे। उन्हें दुख हो रहा था कि ऐसे भोजन के लिए वह झगड़ने को उन्मुख थे, जो उन्हें अंततः प्रभु से दूर कर रहा था।