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त्रिकोणीय चुनावी मुकाबले में केरल
के जी सुरेश
Updated Fri, 28 Feb 2014 06:56 PM IST
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कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) क्या केरल में 2009 के अपने प्रदर्शन को दोहरा सकेगा? पिछले लोकसभा चुनाव में उसने 20 में से 16 सीटें जीती थी। सवाल यह भी कि क्या केंद्र में तीसरे मोर्चे के विकल्प का नेतृत्व कर रहा वाम दल दक्षिण के इस गढ़ में अपनी संभावनाओं को पुनर्जीवित कर सकेगा। क्या मोदी के जादू की बदौलत भाजपा यहां पहली बार अपना खाता खोल पाएगी? आप का उभार इन प्रमुख दलों को किस कदर प्रभावित करेगा? आगामी लोकसभा चुनाव में केरल के मद्देनजर ये कुछ ज्वलंत सवाल सामने हैं।
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दरअसल केरल में तीनों प्रमुख दलों के लिए 'करो या मरो' जैसी हालत है। तेलंगाना के गठन के बाद सीमांध्र में कांग्रेस को कई सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए केरल में कांग्रेस पिछले चुनाव की कामयाबी को जरूर दोहराना चाहेगी। वहीं, विधानसभा चुनावों में केरल और पश्चिम बंगाल के रूप में अपने दो प्रमुख गढ़ पहले ही खो चुकी माकपा के लिए राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बहाल रखने हेतु केरल में अपनी स्थिति सुधारना बेहद जरूरी है। दूसरी ओर भाजपा है, जो राज्य में सार्थक नेतृत्व के अभाव से जूझती रही है। केरल में अपनी पहली चुनावी कामयाबी का इंतजार करती भाजपा की सारी उम्मीदें अब नरेंद्र मोदी पर जा टिकी हैं, जिनकी ओर राज्य का ईसाई तबका भी कुछ हद तक आकर्षित होता दिख रहा है। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी के अलावा प्रकाश करात के नेतृत्व में माकपा ने भी राज्य में चुनावी बिगुल बजा दिया है।
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राज्य का मुख्य विपक्ष लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) सोलर पैनल घोटाले समेत तमाम मुद्दों पर सत्तारूढ़ गठबंधन को घेरने की कोशिश तो करता रहा है। लेकिन सच यह भी है कि लोकप्रिय विपक्षी नेता वीएस अच्युतानंदन और पार्टी सचिव पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाले गुटों के बीच तनातनी का नुकसान माकपा को पहुंचा है। विद्रोही नेता टीपी चंद्रशेखरन की हत्या के पीछे पार्टी सदस्यों का हाथ होने बात सामने आने से भी मतदाताओं के बीच पार्टी की छवि बेहद खराब हुई है।
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चंद्रशेखरन कोझीकोड जिले के ओंचियाम गांव में माकपा से अलग हुए एक गुट के स्थानीय नेता थे। राष्ट्रीय सुर्खियों में उनका नाम तब आया, जब चार मई, 2012 को उनकी हत्या कर दी गई। चंद्रशेखरन ने 2009 में माकपा से अलग होकर रिवॉल्यूशनरी मार्क्सवादी पार्टी का गठन किया था। इस मामले में माकपा को झटका तब लगा, जब पूर्व मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने पार्टी लाइन से अलग जाते हुए चंद्रशेखरन की पत्नी की मांग का समर्थन करते हुए हत्या की सीबीआई जांच की बात की। पार्टी में अंदरूनी कलह साफ तौर तब सामने आई, जब अच्युतानंदन ने चंद्रशेखरन को 'सच्चा मार्क्सवादी' कहा।
दूसरी ओर, विजयन ने उन्हें 'भगोड़े' की संज्ञा दी। चंद्रशेखरन हत्या मामले में विशेष अदालत ने तीन माकपा नेताओं को उम्रकैद की सजा सुनाई है, जबकि राज्य सरकार ने पिछले सप्ताह इसकी सीबीआई जांच कराने का फैसला लिया है। इसी तरह कनाडाई कंपनी एसएनसी-लावालिन वित्तीय घोटाले के एक मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने हालांकि विजयन को निरपराध घोषित किया है, लेकिन यह जानना दिलचस्प यह है कि उन पर आरोप लगाने वालों में पार्टी के भीतर के लोग ही ज्यादा थे। गौरतलब है कि विजयन पहले पोलित ब्यूरो सदस्य थे, जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा चला।
जहां तक कांग्रेस की बात है, तो स्पष्टवादी कांग्रेस नेता वीएम सुधीरन की प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक सकारात्मक कदम साबित हो सकती है। लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि पार्टी की अंदरूनी कलह से निपटने के लिए उनके तरकश में कौन-से तीर हैं। इसके अलावा यह देखना भी दिलचस्प होगा कि केरल कांग्रेस (मणि) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग जैसे गठबंधन सहयोगियों के साथ रिश्तों को वह कैसे साधते हैं। ये वे दल हैं, जिनकी न सिर्फ राज्य के ईसाई और मुस्लिम समुदायों में गहरी पैठ है, बल्कि ये ज्यादा सीटों की मांग भी कर रहे हैं।
इसके अलावा राज्य कांग्रेस को केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ चल रही सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने में खासी मशक्कत करनी होगी। रही बात भाजपा की, तो वह अब तक बेशक राज्य की एक विधानसभा सीट भी हासिल नहीं कर पाई है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले आम चुनाव में उसे राज्य के कुल वोटों का 6.31 प्रतिशत हासिल हुआ था, जो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और केसी (एम) को मिले वोटों से कहीं ज्यादा था। आईपीएल विवाद और हाल ही में पत्नी की रहस्यमयी मौत से केंद्रीय मंत्री शशि थरूर की छवि काफी हद तक धूमिल हुई है। यह देखते हुए भाजपा के भीतर तिरुवनंतपुरम सीट जीतने की उम्मीद है। कासरगोड और पलक्कड सीटों से भी भाजपा वरिष्ठ स्थानीय नेताओं को उतारने की तैयारी में है।
इसके अलावा नायर सर्विस सोसाइटी और श्री नारायण धर्म परिपालन योगम जैसे प्रभावशाली जातिगत समूह भी आगामी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वहीं राज्य की नर्सों को लेकर आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास की अपमानजनक टिप्पणी से उपजे बवाल के बाद भी उनकी पार्टी राज्य में जड़ जमाने की कोशिश कर रही है। कुल मिलाकर, देश के सर्वाधिक साक्षर राज्य माने जाने वाले राज्य में चुनावी सरगर्मियां देखना खासा दिलचस्प रहेगा।