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जुमले को हकीकत में बदलें

Thu, 11 Sep 2014 08:09 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Thu, 11 Sep 2014 08:09 PM IST
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Transform dialouge in to realty
लालकिले के प्राचीर से दिए गए नरेंद्र मोदी के पहले संबोधन की बात करें, तो उसकी विषय वस्तु, शैली और प्रभाव की हर किसी ने तारीफ की। विस्तृत, समावेशी, दूरदर्शी और प्रेरणादायक होने के साथ ही, संवाद की उनकी अनौपचारिक शैली ने लाखों भारतीयों के दिलों को छूकर, उन्हें मोदी का प्रशंसक बना दिया। यहां तक कि उनके कटु आलोचकों को भी स्वीकारना पड़ा कि आज भारत में शायद ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं होगा, जो बगैर किसी तैयारी के दिए गए अपने एक घंटे के लंबे भाषण से इस तरह लोगों को बांधे रख सके।
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सांप्रदायिक और विभाजनकारी मुद्दों के दस वर्ष के स्थगन की जो बात उन्होंने की उससे भला कौन इन्कार कर सकता है! लेकिन अनेक लोगों को हैरत हुई कि आखिर उन्होंने यह बात किनके लिए कही। उनके भाषण को सुनकर कई श्रोताओं के जेहन में गांधी जी की वह बात कौंध गई कि जो बदलाव आप दूसरों में देखना चाहते हैं, पहले खुद में लाएं। ऐसे में, सवाल उठता है कि क्या मोदी को यह ध्यान दिलाना गलत होगा कि परोपकार को व्यावहारिक जामा पहनाने की शुरुआत घर से होनी चाहिए ?
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इसके अलावा, क्या भाजपा के मंत्रियों, सांसदों, कार्यकर्ताओं और संघ परिवार को मोदी की इस घोषणा पर ध्यान देने की बात कहना उचित नहीं होगा? फिर केवल कांग्रेस पार्टी को ही नहीं, भाजपा के भीतर और सरकार में भी अपने विरोध में उठ सकने वाली हर आवाज को ठिकाने लगाने और संघ परिवार के नियंत्रण को कमोबेश ढीला कर आज नरेंद्र मोदी उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं, जहां से वह अपनी घोषणा को जमीनी हकीकत से जोड़ते हुए सही मायनों में उस राजधर्म का पालन कर सकते हैं, जो कभी अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें सुझाया था।
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दरअसल सवाल यह है कि राष्ट्रीय हित के मद्देनजर क्या बेहतर है- समाज के ध्रुवीकरण के आधार पर होने वाले चुनावी संघर्ष, या सांप्रदायिकता व विभाजनकारी सामाजिक हालातों को दूर करते हुए सामाजिक सौहार्द की भावना के दूरगामी आर्थिक और सामाजिक फायदे। संभव है कि अमित शाह, लक्ष्मीकांत बाजपेयी और योगी आदित्यनाथ जैसे लोग अल्पसंख्यक विरोधी टिप्पणियों और 'लव जेहाद' जैसे मुद्दों की छाया में वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हों, ताकि आगामी विधानसभा चुनावों में उन्हें बहुसंख्यक समुदाय के वोटों का फायदा मिल सके। मगर क्या यह नीति भारत माता के लिए दूरगामी हित वाली साबित हो सकेगी?

चाहे बात बड़े जनादेश की हो, या पार्टी व सरकार पर पकड़ की, मोदी का प्रभाव अटल बिहारी वाजपेयी की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक है। उन पर 25 सहयोगी दलों को साथ लेकर गठबंधन धर्म को निभाने की मजबूरी भी नहीं है। साफ है कि उनके पास बदलाव लाने वाले फैसले लेने और उन्हें लागू करने का सुनहरा राजनीतिक मौका है। लाखों भारतीयों की उम्मीदों पर सवार होकर उन्होंने सत्ता पाई है।

ऐसे मौके कम ही आते हैं, जब किसी एक व्यक्ति के फैसलों पर इतना कुछ टिका होता है। इसलिए मोदी को इस ऐतिहासिक मौके का फायदा उठाते हुए भारत को इक्कीसवीं सदी के एक आधुनिक, आर्थिक तौर पर विकसित, स्थायी, समावेशी, धर्म निरपेक्ष और सजग राष्ट्र में बदलने की कोशिश करनी चाहिए। एक ऐसा देश, जहां गरीबी, भूख, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और अपराध के लिए कोई जगह न हो। साथ ही, जहां लोगों की आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा और बुनियादी तंत्र की जरूरतों का ख्याल रखने के लिए एक ईमानदार, कुशल, प्रभावी और जनमित्र सरकार हो, जिसमें ग्रामीण और शहरी युवाओं के सपनों को भलीभांति पूरा करने का माद्दा भी हो। वह उन सारी बातों पर अमल कर सकते हैं, जिनका जिक्र उन्होंने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले के अपने भाषण में किया था।

'सबका साथ, सबका विकास' के नारे को उन्हें जमीनी हकीकत बनाना होगा। उनसे की जा रही उम्मीदों की सूची बेशक काफी लंबी है। मगर मोदी के लिए नाकामयाबी की तो गुंजाइश ही नहीं है। ऐसा होने पर इतिहास उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। भारत को बेहतर बनाते हुए उसे चीन और जापान की पंक्ति में खड़ा करने को लेकर उनकी निजी प्रतिबद्धता शीशे की तरह साफ है। मगर सवाल उठता है कि क्या वह ऐसे अभूतपूर्व बदलाव गंभीर, प्रतिबद्ध और सेवा भाव व उत्साह से लबरेज नौकरशाही के बगैर ला पाएंगे? उनका जवाब 'हां' में है, जैसा कि उन्होंने खुद को टॉस्क मास्टर करार दिया है। काम करने के मामले में वह भले ही जुझारू हों, मगर क्या वह पूरी सरकारी मशीनरी को बदलाव का एजेंट बनने के लिए जरूरी अनुशासन और उत्साह दे सकेंगे, यह तो समय ही बताएगा।

इस बात का श्रेय भारत के लोकतंत्र, नियति और उनकी कड़ी मेहनत को दिया जाना चाहिए, जिसकी बदौलत आज एक चायवाला उस मुकाम पर पहुंच गया है, जहां से वह 120 करोड़ से ज्यादा लोगों के भविष्य का खाका खींचेगा। मगर उन्हें समझना होगा कि वह केवल गुजरात या भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री न होकर सभी भारतीयों के प्रधानमंत्री हैं। इनमें 69 फीसदी वे मतदाता भी शामिल हैं, जिन्होंने उन्हें वोट नहीं दिया था।


चुनावी समर में विरोधियों को हराना एक बात है, मगर अपने कामों से उनके दिलों को जीतना कहीं बड़ी चुनौती होती है। अतीत को पीछे छोड़कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भरोसे का एक माहौल बनाना होगा। तभी सही मायनों में सभी भारतीयों के लिए अच्छे दिन का उनका वायदा पूरा हो सकेगा। संसद में दिए गए अपने पहले भाषण में मोदी ने विपक्षियों से कहा था कि बहुमत के बावजूद वह उन्हें भी साथ लेकर आगे बढ़ेंगे। वास्तव में यह एक जननेता जैसी बात थी। अब समय आ गया है कि वह अपनी कही बातों पर अमल करें।
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