कश्मीरी पंडितों की त्रासदियां: आखिर क्यों कश्मीर छोड़ भागने को होना पड़ा मजबूर?
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
कश्मीरी पंडितों का जब नरसंहार हुआ था, तब मैं दिल्ली में रहता था और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) में काम करता था। आईईजी के निदेशक जाने-माने समाजशास्त्री त्रिलोकी नाथ मदान थे, जो कि घाटी में ही पले-बढ़े थे और उन्होंने पंडितों के जीवन पर नृवंशविज्ञान से संबंधित क्लासिक काम किया। प्रोफेसर मदान के भाई खुद गांधी मेमोरियल कॉलेज, श्रीनगर के प्रतिष्ठित प्राचार्य थे और उन्हें अपनी मातृभूमि से भागना पड़ा था। उनके पैतृक निवास में तोड़फोड़ की गई थी, परिवार के पास मौजूद अरबी सहित पांच भाषाओं की कीमती पांडुलिपियां जला दी गईं।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
कश्मीरी पंडितों का जब नरसंहार हुआ था, तब मैं दिल्ली में रहता था और इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ (आईईजी) में काम करता था। आईईजी के निदेशक जाने-माने समाजशास्त्री त्रिलोकी नाथ मदान थे, जो कि घाटी में ही पले-बढ़े थे और उन्होंने पंडितों के जीवन पर नृवंशविज्ञान से संबंधित क्लासिक काम किया। प्रोफेसर मदान के भाई खुद गांधी मेमोरियल कॉलेज, श्रीनगर के प्रतिष्ठित प्राचार्य थे और उन्हें अपनी मातृभूमि से भागना पड़ा था। उनके पैतृक निवास में तोड़फोड़ की गई थी, परिवार के पास मौजूद अरबी सहित पांच भाषाओं की कीमती पांडुलिपियां जला दी गईं।
कश्मीर छोड़ने को मजबूर हुए कई पंडितों ने कुछ शानदार संस्मरण लिखे हैं। लेकिन इनमें से सर्वाधिक आधिकारिक ब्योरे सोनिया जब्बार के 'द स्पिरिट ऑफ प्लेस' शीर्षक से लिखे निबंध में दर्ज हैं कि आखिर क्यों उन्हें वहां से भागना पड़ा। इसे सिविल लाइंस नामक पत्रिका ने अपने पांचवें अंक में प्रकाशित किया था। तीन पृष्ठों में जब्बार ने जेहादियों द्वारा मार डाले गए 36 पंडित पुरुष और महिलाओं के नाम, उनकी जन्म तारीख, उनके पैतृक गांव और उनके परिवार के सदस्यों के ब्योरे दिए हैं।
इन तथ्यों के बाद के पैराग्राफ में लेखिका ने लिखा, 'ये उन पंडितों में से थोड़े से नाम हैं, 1989-91 के दौरान आतंकवादियों ने जिनकी हत्या कर दी। मैं इसमें नौ सौ और लोगों के नाम जोड़ना चाहती हूं, ताकि आपके सामने पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सके। इन महिलाओं और पुरुषों की मौत धोखे से क्रॉस फायरिंग में नहीं हुई, बल्कि उन्हें सोच-समझकर बर्बरता से निशाना बनाया गया। हत्या किए जाने से पहले इनमें से कई महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। एक महिला को आरी से काटा गया।
पुरुषों के शरीर में उत्पीड़न के निशान दर्ज थे। गला रेतकर, फांसी पर लटकाकर, अंग भंग कर और आंखें निकालकर लोगों को मारा जाना असामान्य नहीं था। उनके शवों को इस तरह से फेंका गया, जिससे कि उन्हें कोई छू भी न सके। करीब 24 महीनों के दौरान साढ़े तीन लाख पंडितों में से नौ सौ लोगों की हत्या का आंकड़ा आश्चर्यजनक है। कोई भी जो यह कहता है कि पंडितों को घाटी से निर्वासित करने की साजिश जगमोहन ने रची वह झूठा है।'
कश्मीरी पंडितों की पहली और सबसे बड़ी त्रासदी यही थी कि उन्हें अपनी मातृभूमि को छोड़ भागने को मजबूर किया गया। उनके अपने लोगों ने उन्हें पीठ दिखा दी या फिर जब जेहाद ने पंडितों को अपने पागलपन का शिकार बनाया, तो उन्होंने उनकी ओर से मुंह फेर लिया। कभी पंडितों को कश्मीर के अन्य धर्मों को मानने वालों से जोड़ने वाले सांस्कृतिक, काव्यात्मक और आध्यात्मिक संबंधों को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने बर्बरता से नष्ट कर दिया। अब उनकी यादें, जिनमें से अधिकांश कड़वी यादें है, वहीं रह गई हैं।
कश्मीरी पंडितों की तीसरी त्रासदी यह थी कि उनके उत्पीड़न से संबंधित सही तथ्यों से या तो इनकार किया गया या फिर उन्हें दबा दिया गया। पंडितों के संस्मरणों और सोनिया जब्बार के मजबूत तथ्यपरक लेख के बावजूद इस कहानी को बल मिला कि पंडितों के अपनी मातृभूमि से निर्वासन के लिए पाकिस्तान या राज्यपाल जगमोहन या फिर दोनों ही जिम्मेदार थे। इन असत्यों ने कश्मीर के मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व में नकार की भावना को प्रोत्साहित किया। हुर्रियत, पीडीपी और एनसी इन सभी ने यह जतलाने की कोशिश की कि कश्मीरी हिंदुओं के निर्वासन से कश्मीरी मुस्लिमों का कुछ लेना-देना नहीं है।
1990 के दशक से पंडितों ने कश्मीर से बाहर साहसिक तरीके से अपनी जिंदगी को दोबारा से संवारने का प्रयास किया और इस क्रम में उन्होंने खुद को चौथी त्रासदी का सामना करते पाया- उन्होंने पाया कि वे तेजी से बढ़ते हिंदुत्व का मोहरा बनाए जा रहे हैं। उन्होंने जो तकलीफें झेली थीं, उसका उपयोग या अधिक उपयुक्त शब्द है दुरुपयोग 1989 में भागलपुर, 1992 में मुंबई, 2002 में अहमदाबाद और इनके अलावा सैकड़ों अन्य जगहों पर भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ हुई हिंसा से जुड़ी यादों को मिटाने के लिए किया गया। विचारकों ने पंडितों से जुड़े सवाल का इस्तेमाल ऐसे अन्य और पूरी तरह से प्रासांगिक सवालों को चुप कराने के लिए किया। भारत के अन्य हिस्सों में मुस्लिमों के खिलाफ हुए अपराधों में हिंदुत्व की सदोषता को कश्मीर में हिंदुओं के खिलाफ हुए अपराधों में इस्लाम की सदोषता से धोने का प्रयास किया।
पांच अगस्त के बाद से मैंने स्वाभाविक रूप से कश्मीर और उन कश्मीरियों के बारे में विचार किया है, जिन्हें मैं जानता हूं। मेरे दिमाग में सर्वाधिक खयाल जिनका आया वह हैं, मेरे मित्र और मेरे पूर्व बॉस टी एन मदान। वह अब उम्र के आठवें दशक के आखिर में पहुंच चुके हैं, शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके हैं, लेकिन वह अब भी हमेशा की तरह बौद्धिक रूस से सजग और नैतिक रूप से अटल हैं। मैंने उन्हें मेल पर लिखा कि मैं आपके बारे में सोच रहा हूं।
यह है उनका जवाब ः 'यह आपदाग्रस्त समय है। हालांकि अनुच्छेद 370 को लेकर हमेशा मेरे मन में संदेह रहा है और मेरी मां, भाई और उनकी पत्नी को 1990 में हमारा घर छोड़कर जाना पड़ा था, जिसे मेरे पिता ने बनाया था, इसके बावजूद मैं घाटी के लोगों के उत्पीड़न और उनके दमन को लेकर गहरी हताशा महसूस कर रहा हूं कि किस तरह से उन्हें हर किसी से अलग-थलग कर बंदियों की तरह रखा गया है। आज मानवीय तथा सांस्कृतिक रूप से बहुलतावादी भारत का विचार जिन गंभीर खतरों का सामना कर रहा है, उसे लेकर मैं दुखी हूं। लेकिन मैं खुद एक बहुलतावादी और आशावादी बना रहूंगा।'
ये समझदारी और संवेदनाओं से भरे शब्द हैं, एक महान पंडित विद्वान के, एक ऐसे पंडित के, जो कि खुद पंडितों के जीवन और तकलीफों के बारे बखूबी जानते हैं। यदि उनकी जैसी समझ वाले पर्याप्त भारतीय हो जाएं, तो कश्मीर (और भारत) के लिए अब भी उम्मीद की जा सकती है।