निराशा से भरे अंत की ओर
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लोकसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो गई है और सभी की निगाहें नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल पर टिकी हुई हैं। लेकिन प्रधानमंत्री की जिस कुर्सी पर सबकी निगाह है, फिलहाल उस पर विराजमान डॉ. मनमोहन सिंह कुछ और ही सोच रहे हैं। राजनीति की दुनिया के सज्जन पुरुष की पहचान रखने वाला यह शख्स अपने राजनीतिक जीवन की इमारत का अंतिम पत्थर प्रभावशाली ढंग से रखना चाहता है। सार्वजनिक जीवन से सेवानिवृत्ति से पहले वह कांग्रेस और उसके नेतृत्व यानी सोनिया और राहुल गांधी को धन्यवाद ज्ञापन देने की चाह रखते हैं। हालांकि दो पीएचडी डिग्रियां हासिल करने वाले इस शख्स के लिए ऐसा ज्ञापन लिखना कोई मुश्किल बात नहीं है, लेकिन मनमोहन की सोच कुछ अलग ही है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह खोखले शब्दों का सहारा लेने के बजाय कुछ करके दिखाना चाहते हैं। वह सत्ता की बागडोर यूपीए तीन के हाथों में सौंपना चाहते हैं, यानी एक ऐसा गठबंधन जिसका नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में हो।
अल्प और मृदुभाषी मनमोहन ने अपनी इस मंशा को तब प्रकट किया था, जब पिछले वर्ष अक्तूबर में वह चीन की यात्रा से लौटे थे। प्रधानमंत्री महोदय की सोच यह है कि कांग्रेस नेतृत्व को आभार प्रकट करने का सबसे कारगर तरीका यह होगा कि आगामी लोकसभा चुनाव से पहले मई, 2004 जैसे नाटकीय घटनाक्रमों की पृनरावृत्ति हो। उस समय कांग्रेस ने भारतीय जनता पार्टी को सत्ता से अपदस्थ किया और उसके बाद सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा कर उस पर मनमोहन सिंह को नामित किया, जिसे बड़े त्याग के रूप में देखा गया। सच तो यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस 150 सीट भी जीत ले, तो प्रधानमंत्री का धन्यवाद ज्ञापन पूरा हो जाएगा। लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात में ऐसा हो पाना तकरीबन असंभव दिख रहा है। दरअसल, गंभीर आत्मचिंतन के जरिये मनमोहन सिंह यह जान सकेंगे कि कांग्रेस की बुरी हालत के लिए वही, और सिर्फ वही जिम्मेदार हैं।
इसमें संदेह नहीं कि भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत का श्रेय मनमोहन सिंह को जाता है। इसके अलावा अमेरिका और चीन के साथ भारत के रिश्तों के मद्देनजर एक नए युग के सूत्रपात का तमगा भी उनके ही खाते में है। इसके बावजूद भ्रष्टाचार को राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बनाने की कालिख उन्हीं की सरकार के साथ जुड़ी है। हालांकि उनके लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि अर्थव्यवस्था को खोलने और भूमंडलीकरण की प्रक्रिया किस तरह भ्रष्टाचार की समस्या से जुड़ी है। लेकिन सच यही है कि व्यापार के अंधाधुंध बढ़ते अवसरों ने आर्थिक फायदों के साथ रिश्वत और भ्रष्टाचार को पनपने का मौका भी दिया है। यही नहीं, इसी भ्रष्टाचार ने नागरिकों की नाराजगी को पहले एक आंदोलन में, और फिर एक राजनीतिक मंच में बदल दिया है। आज भ्रष्टाचार का आलम यह है कि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल ने अपनी नई रिपोर्ट में 177 देशों की सूची में भारत को 94वीं पायदान पर रखा है।
मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए का दूसरा कार्यकाल कई नाकामियों का गवाह बना। यह दुःखद ही माना जाएगा कि 1991-96 में जिस शख्स को देश का बेहतरीन वित्त मंत्री माना गया, वह आज स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे प्रभावहीन प्रधानमंत्री माना जा रहा है। हालांकि उनकी व्यक्तिगत छवि को साफ-सुथरा माना जाता है। बावजूद इसके पार्टी की कोर समिति की बैठकों में भ्रष्टाचार के आरोपी मंत्रियों को जिस मजबूती के साथ मनमोहन सिंह बचाते दिखे, उससे कई वरिष्ठ कांग्रेसी हतप्रभ रह गए। कई तो यह भी मानते हैं कि शांतचित्त मनमोहन सिंह ने दोषियों को बचाने की कला को नया आयाम दिया है। सभी जानते हैं कि सब कुछ स्पष्ट होने के बावजूद उन्होंने किस तरह केंद्रीय कानून मंत्री अश्विनी कुमार और रेल मंत्री पवन कुमार बंसल को पद से हटाने के फैसले में नाहक विलंब किया। जब उनके पसंदीदा माने जाने वाले पुडुचेरी के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर इकबाल सिंह का नाम 2जी घोटाले में उछला, तब भी प्रधानमंत्री ने मुस्तैदी नहीं दिखाई।
कांग्रेस तो आम आदमी की बात करती है, लेकिन मनमोहन सिंह इस आम आदमी से हमेशा दूरी बनाते दिखे। वह बेशक कमजोर वक्ता हैं। लेकिन इस कमी की आड़ में वह इस इल्जाम से नहीं बच सकते कि उनके भाषणों में आम आदमी की जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाले महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर प्रभावी ढंग से कुछ नहीं कहा गया। दस वर्षों में दिए गए कुल 1,379 भाषण में केवल 106 भाषण ही ऐसे थे, जो भ्रष्टाचार पर केंद्रित थे। यह हालत तब है, जब विपक्ष और मीडिया लगातार मनमोहन सरकार को 'स्वतंत्र भारत की सर्वाधिक भ्रष्ट सरकार' बता रहे हैं। इसके अलावा केवल 88 भाषणों में महंगाई और 307 भाषणों में सीमा पार आतंकवाद या राष्ट्रीय सुरक्षा पर बोलना उन्होंने मुनासिब समझा। कहना होगा कि इन नाजुक मसलों को पर्याप्त तवज्जो न देने की वजह से ही शायद वह आम आदमी का भरोसा नहीं जीत पाए हैं।
मनमोहन सिंह कांग्रेस का खोया गौरव लौटाने की इच्छा तो रखते ही हैं, साथ ही खुद को आंकने का काम इतिहास पर छोड़ने की बात करते हैं। विख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा मनमोहन सिंह के बारे में कहते हैं, 'वह बुद्धिमान हैं, ईमानदार हैं और सरकार के साथ काम करने का उनके पास चार दशकों का लंबा अनुभव है। लेकिन आत्मसंतुष्टि, कायरता और बौद्धिक बेईमानी की वजह से हमारा समय उन्हें एक निराशाजनक शख्सियत के तौर पर याद रखेगा।'