फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Toward strategic self-reliance

सामरिक आत्मनिर्भरता की ओर

Sat, 27 May 2017 10:36 AM IST
बनवारी
बनवारी Updated Sat, 27 May 2017 10:36 AM IST
विज्ञापन
Toward strategic self-reliance
भारत की रक्षा तैयारी

देश की आजादी के 70 वर्ष बाद भारत सरकार में देश की रक्षा चुनौतियों और रक्षा तैयारियों के बारे में सजगता दिखाई दे रही है। सरकार ने सामरिक उद्योग के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए जो नीति घोषित की है, वह इस दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। अब तक हमने अपनी सामरिक तैयारियों और सामरिक उद्योग की तरफ समुचित ध्यान नहीं दिया। भारत जैसा देश विश्व बाजार से हथियारों की खरीद के आधार पर अपनी सुरक्षा के बारे में आश्वस्त नहीं रह सकता। फिर भी हम अब तक 65 प्रतिशत हथियारों की खरीद बाहरी देशों से ही करते रहे हैं।

विज्ञापन


भारत उन चुने हुए देशों में है, जिसकी सुरक्षा को आरंभ से ही और निरंतर खतरा बना हुआ है। देश के विभाजन से पहले ही महात्मा गांधी ने हमें चेता दिया था कि पाकिस्तान बना, तो वह हमारा स्थायी शत्रु सिद्ध होगा। 1949 में साम्यवादी चीन के उदय और अगले वर्ष तिब्बत पर उसके आक्रमण के बाद सरदार पटेल ने जवाहर लाल नेहरू को एक नोट भेजकर चिंता जताई थी कि चीन हमारी सुरक्षा को संकट सिद्ध होने वाला है। पर अपने शांतिवादी आग्रहों के कारण जवाहर लाल नेहरू इन चुनौतियों के प्रति सचेत नहीं हुए। बाद में 1962 के चीन आक्रमण के बाद सरकार चेती, पर हमारा रक्षा उद्योग पनप नहीं पाया। रक्षा उद्योग को सरकारी नियंत्रण में रखकर हमने उसका विस्तार तो किया, पर उसके लिए न पर्याप्त साधन जुटाए गए, न उसमें देश को उन्नत सामरिक तकनीक के बारे में आत्मनिर्भर बनने का संकल्प पैदा किया गया। हमारे वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और प्रक्षेपास्त्रों के मामले में अपना कौशल सिद्ध किया है। इसी तरह जब अंतरराष्ट्रीय बंदिशों के कारण रूस ने हमें क्रायोजनिक इंजन देने में विवशता दिखाई, तो हमारे वैज्ञानिकों ने एक दशक के भीतर ही उसे विकसित करके दिखा दिया। हमारे यहां प्रतिभा या कौशल की नहीं, संकल्प की कमी रही है।
विज्ञापन


अब तक हम मानते रहे हैं कि पहले आर्थिक विकास आवश्यक है। आर्थिक समृद्धि के बाद ही हम रक्षा उद्योग खड़ा करने के लिए आवश्यक साधन जुटा पाएंगे। हम यह भूले रहे कि आज जो देश खुद को औद्योगिक रूप से उन्नत मानते हैं, उन्होंने सामरिक उद्योग खड़े करते हुए ही अपना औद्योगिक विकास किया है। उन्नत देशों में सभी जगह विज्ञान और प्रौद्योगिकी का विकास सामरिक उद्योग के सहारे ही हुआ है। सोवियत रूस ने जब अमेरिका के टक्कर की महाशक्ति बनने का निर्णय लिया था, तो उसके पास अधिक साधन नहीं थे। पर सोवियत रूस के नेताओं के सामने स्पष्ट था कि बिना आधुनिक और उन्नत रक्षा उद्योग के वे आगे नहीं बढ़ सकते। रक्षा उद्योग केवल वित्तीय साधनों से नहीं खड़ा होता। रक्षा को एक चुनौती मानकर अपने वैज्ञानिक प्रतिष्ठान को देशभक्तिपूर्वक इस काम में लगाने से खड़ा होता है। आज रूस संसार की दूसरी महाशक्ति गिना जाता है। वह आत्मनिर्भर ही नहीं है, हथियारों के विश्व बाजार का दूसरा बड़ा खिलाड़ी है। इस विश्व बाजार में अमेरिका का 34 प्रतिशत भाग है तो रूस का 25 प्रतिशत। चीन ने भी अपना आर्थिक विकास अपनी सामरिक तैयारी के साथ ही आरंभ किया था। आज वह हमसे बहुत आगे हैं और हमारी सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


मझोले स्तर की महाशक्तियों में गिनें, तो भारत का रक्षा उद्योग कोई बहुत छोटा नहीं है। हथियारों से संबंधित शोध और उनके उत्पादन के लिए बनाए गए डीआरडीओ के अंतर्गत लगभग 50 रक्षा प्रयोगशालाएं हैं, सार्वजनिक क्षेत्र की पांच औद्योगिक इकाइयां हैं, चार गोदी और रक्षा सामग्री का उत्पादन करने वाले 41 कारखाने हैं। पर हमारी आवश्यकता सामरिक रूप से उन्नत देशों के पीछे चलते हुए हथियार बनाना नहीं है। हमारी चुनौती अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपने विरोधियों से आगे निकलने की होनी चाहिए। इस तरह के संकल्प का क्या परिणाम होता है, यह हम इस्राइल से सीख सकते हैं। अपने शक्तिशाली विरोधियों के बीच वह कब का मिटा दिया गया होता। पर उसने अपनी सामरिक तैयारी में अपना पूरा वैज्ञानिक प्रतिष्ठान लगा दिया।  अरब देश अनेक बार गोलबंद होकर भी उसके लिए चुनौती नहीं बन पाए। जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली इस्राइल यात्रा पर जाने वाले हैं। हमारे लिए उसका विशेष महत्व है, क्योंकि हम अमेरिका, रूस के बाद आज सबसे अधिक उन्नत हथियारों की खरीद इस्राइल से ही कर रहे हैं।

अब तक हम अपने रक्षा उद्योग को सार्वजनिक क्षेत्र तक सीमित रखे रहे हैं। उसका बड़ा कारण यह मान्यता थी कि रक्षा संबंधी तैयारी गोपनीय रहनी चाहिए। पर हमारी सेना अगर विश्व बाजार से खरीदे गए उन्नत हथियारों पर निर्भर रहे, तो क्या गोपनीयता रह सकती है? इधर रक्षा उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोलने की कुछ कोशिश हुई है। उसके अब तक परिणाम नहीं निकले, क्योंकि रक्षा उद्योग का धीरे-धीरे विस्तार नहीं किया जा सकता। रक्षा उद्योग खड़ा करने के लिए आवश्यक होता है कि उसकी उत्पादित सामग्री तत्काल खरीद ली जाए। अब तक डीआरडीओ द्वारा निर्मित अनेक चीजें सेना को रास नहीं आई। यह लगता रहा कि सेना और डीआरडीओ के बीच तालमेल की कमी है। ऐसे में निजी उद्योग आगे आने से हिचकिचाता रहा।


अब लगभग एक वर्ष की तैयारी के बाद सरकार ने एक स्पष्ट नीति घोषित की है, उसके कुछ पहलुओं पर कुछ और विचार होना बाकी है। पर इस बार सरकार की नीति में आगे तक की दृष्टि और एक बड़ा संकल्प दिखाई दे रहा है। सरकार केवल रक्षा उद्योग का विस्तार करने की बात नहीं कर रही। वह अत्याधुनिक लड़ाकू जेट विमान, हेलिकॉप्टर, पनडुब्बियां और टैंक तथा अन्य बख्तरबंद वाहन देश भर में ही बनाने की बात कर रही है। इसके लिए न केवल निजी क्षेत्र से साझेदारी में निर्माण किया जाएगा, बल्कि निजी कंपनियों को उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र की मूल कंपनियों का सहयोग लेने के लिए बढ़ावा दिया जाएगा। इस उद्देश्य से सरकार ने एक रणनीतिक साझेदारी मॉडल तैयार किया है। सामरिक उद्योग खड़ा करने और सामरिक आत्मनिर्भरता की दिशा में यह एक बड़ा कदम है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed