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मोदी की मुश्किल राह

Tue, 25 Jun 2013 09:02 PM IST
नीरजा चौधरी
नीरजा चौधरी Updated Tue, 25 Jun 2013 09:02 PM IST
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tough path for modi

भारतीय जनता पार्टी 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में कब और कहां पेश करने, जैसे दो सवालों से जूझती रही है, जिसके चलते उसे लालकृष्ण आडवाणी के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है और नीतीश कुमार तो राजग से ही अलग हो गए। इससे बहुत संभव है कि मोदी को चुनाव से पहले तक भाजपा औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करे, बेशक वह पार्टी के अघोषित नेता बन चुके हैं।

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आडवाणी एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो चाहें तो मोदी का विरोध करके पूरी प्रक्रिया को पटरी से उतार सकते हैं। यदि उनका विरोध जारी रहता है, तो बाहर यह संदेश जाएगा कि भाजपा अपने झगड़ों में उलझी हुई है। संघ नेतृत्व आडवाणी पर नकेल तो कसना चाहता है, लेकिन वह उन्हें संतुष्ट करने के लिए चुनाव से पहले तक मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित न करने की उनकी सलाह पर अमल कर सकता है। अंततः सब कुछ इसी बात पर निर्भर करेगा कि मोदी भाजपा को कितनी सीटों पर जीत दिला पाते हैं। इसके लिए उन्हें चुनाव अभियान समिति के मुखिया होने के नाते रणनीति बनाने से लेकर आम सभाओं और मुद्दे तय करने तक की परोक्ष रूप से खुली छूट होगी।
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मोदी वहीं कुछ कर सकते हैं, जहां पहले से पार्टी का कुछ आधार रहा हो। दक्षिण भारत के राज्यों में पार्टी तस्वीर से बाहर है, हालांकि कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा एवं जनार्दन रेड्डी को पार्टी में वापस लाने की कोशिश हो रही है। देश के पूर्वी इलाकों में भी पार्टी की हालत पतली है। पश्चिम बंगाल में पार्टी की स्थिति कभी अच्छी नहीं रही और हाल के वर्षों में ओडिशा एवं असम में भी पार्टी कमजोर हुई है। असम में तरुण गोगोई ने हिंदू राष्ट्रवादी कार्ड खेलकर असम गण परिषद एवं भाजपा को क्रमशः तीसरे एवं चौथे स्थान पर ला दिया है, वहां मुस्लिम बहुल एयूडीएफ मुख्य विरोधी पार्टी है।
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जहां तक हिंदी पट्टी का सवाल है, मोदी की नजर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्यों के साथ ही उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, राजस्थान और दिल्ली पर होगी। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे दो बड़े राज्यों में भाजपा की सीटें बढ़ाए बिना मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बन सकते। इसलिए अमित शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया है, ताकि नियंत्रण मोदी के हाथ में रहे।

हिंदू हृदय सम्राट की छवि तो उनकी है ही, भाजपा अब मंडल कार्ड खेलते हुए उन्हें देश के प्रधानमंत्री पद के पहले अति पिछड़े दावेदार के रूप में पेश करेगी। उसे उम्मीद है कि इससे गंगा पट्टी में सवर्णों के समर्थन के साथ उसे अति पिछड़े समुदाय का समर्थन मिलेगा। महाराष्ट्र में पिछले चुनाव में भाजपा राज ठाकरे के कारण 50 हजार से कम मतों से दस सीटें हार गई थी, उसे उम्मीद है कि इस बार मोदी के कारण ऐसा नहीं होगा।

मोदी के समर्थक 240 सीटें जीतने की बात कर रहे हैं। उनका तर्क है कि पार्टी ने 1996 में अपने दम पर चुनाव लड़ा था, तब उसने 1977 में (जनता पार्टी में जनसंघ के रूप में) मिली 89 सीटों या फिर 1989 में (जनता दल के साथ सीटों के तालमेल के साथ) मिली 90 सीटों के मुकाबले 80 फीसदी इजाफा करते हुए 161 सीटें जीती थीं। और यह जीत राम जन्मभूमि के अकेले मुद्दे पर मिली थी, लिहाजा पार्टी को लगता है कि देश के मौजूदा जरूरतों के मुताबिक कद्दावर नेता के मुद्दे पर अकेले चुनाव लड़कर वैसी ही जीत हासिल कर सकती है।

भाजपा की योजना 106 लोकसभा सीटों पर ज्यादा ध्यान देने की है, जहां 2009 के चुनाव में वह एक लाख से कम वोटों से हारी थी। पार्टी नेताओं का आकलन है कि महंगाई एवं भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ जनाक्रोश एवं मोदी के नेतृत्व का मुद्दा उसे इन सीटों पर जिता सकता है। आडवाणी गुट भी मानता है कि भाजपा 155 से 160 सीटें जीत सकती है, लेकिन सरकार गठन के लिए जरूरी करीब 115 और सीटों की कमी पूरी करने के लिए उसे अन्य दलों से गठजोड़ करना होगा। इसलिए आडवाणी ने राजग के विस्तार पर जोर दिया था।

मोदी यदि वाजपेयी द्वारा जीती गई 182 सीटों का आंकड़ा पार करते हैं, तो वह प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। उस स्थिति में भाजपा को क्षेत्रीय दलों से 85 से 95 तक सीटें चाहिए। पश्चिम बंगाल (वाम एवं तृणमूल कांग्रेस), बिहार (जदयू एवं राजद), उत्तर प्रदेश (सपा एवं बसपा) की क्षेत्रीय पार्टियों के बारे में साफ है कि वे मोदी के नेतृत्व वाले गठजोड़ के साथ नहीं जाएंगी, क्योंकि इन सभी दलों का अल्पसंख्यकों के बीच जनाधार है।

अतीत में द्रमुक एवं अन्नाद्रमुक ने वाजपेयी सरकार को बारी-बारी से समर्थन दिया था, ऐसा फिर हो सकता है। आज जो भी बयानबाजी हो रही हो, सरकार गठन की बात जब आएगी, तब नवीन पटनायक भी समर्थन कर सकते हैं, चाहे बाहर से ही सही। ऐसा ही चंद्रबाबू नायडु एवं तेलंगाना राष्ट्र समिति कर सकती है। इसी तरह, ओमप्रकाश चौटाला, पीए संगमा, बीएस येदियुरप्पा, जनार्दन रेड्डी, मुफ्ती मोहम्मद सईद और यहां तक कि नेशनल कांफ्रेस जैसी पार्टियां भी हैं। पप्पू यादव जैसे निर्दलीय भी होंगे, जो सरकार बनाने वाले किसी भी गठबंधन का समर्थन कर सकते हैं।


यह सब कुछ न केवल भाजपा के संख्याबल, बल्कि कांग्रेस के संख्याबल पर भी निर्भर करेगा। यदि कांग्रेस 145 से 150 सीटें जीतने में कामयाब रहती है और भाजपा 185 से 190 के करीब सीटें जीतती है, तो खेल काफी कुछ खुल जाएगा। 'सेक्यूलर' सरकार को ही समर्थन देने के लिए मजबूर क्षेत्रीय पार्टियां मौजूदा परिदृश्य में सरकार में नेतृत्व की मांग करेंगी। लेकिन यदि कांग्रेस 110 से 120 सीटों तक सिमट जाती है, तो मोदी की राह आसान हो जाएगी। उनके समर्थकों का मानना है कि वह जादुई आंकड़े को पार करने में कोई गलती नहीं करेंगे।

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