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हर जमाने का सुर कुछ अलग है!
अदिति मंगलदास
Updated Sat, 23 Feb 2013 11:22 PM IST
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शब्द अगर अभिव्यक्ति का माध्यम हैं तो नृत्य अभिव्यक्ति की एक शैली है। सुर, ताल और लय से जुड़कर नृत्य सदियों से हमारी भावनाओं की जुबां बनता आया है। मौसम बदले या माहौल हर अवसर के अनुसार एक अलग नृत्य ने हमारे देश की परंपराओं को समृद्ध किया है। इन परंपराओं का योगदान तब और भी साफ नजर आता है, जब नृत्य के नाम से ही एक प्रांत को पहचाना जाने लगता है। कथकली-केरल, कथक-उत्तर भारत, भारत नाट्यम-तमिलनाडु...।
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हालांकि हर विधा के साथ कलाकार की अपनी विद्वता का भी बहुत महत्व है। जब कोई भी अच्छा कलाकार प्रस्तुति देता है, तो इससे परंपरा मजबूत होती है। इसमें खोज का भी अपना महत्व है क्योंकि कलाकार की कल्पना जितनी ऊंची होगी, प्रस्तुति उतनी ही अच्छी होगी। फिर चाहे राधा-कृष्ण को मंच पर लाएं या किसी और शीर्षक को अपनी कला से जोड़ें। बेशक नए जमाने में लोग नए रंग में रंग चुके हैं, लेकिन इसके साथ ही यह भी दिलचस्प है कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य जैसी प्राचीन कलाओं में रुचि लेने वालों की संख्या बढ़ रही है।
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इसकी सबसे बड़ी वजह कलाकारों का गहराई से काम करना कहा जाएगा। सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े कलाकार के भीतर अपनी कला के लिए आदर, सम्मान और निष्ठा हो तो उसकी विधा हमेशा प्रासंगिक रहती है। यही हमारी सामाजिक-संस्कृति की पहचान है। भारत का शास्त्रीय नृत्य पूरी दुनिया में मशहूर है। वैसे भी नृत्य की कोई सरहद या सीमा नहीं है। अगर हमारे देश में यह प्राचीन पंरपरा है तो दुनिया भर में इसमें रचने-बसने वालों की भी कोई कमी नहीं है। समय के साथ भले ही इसकी विधाओं में ज्यादा बदलाव नहीं आया है, पर इसमें भंगिमाओं और भावनाओं का जो मिश्रण है वह अद्भुत है।
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मेरा निजी तौर पर यह मानना रहा है कि नृत्य कोई भी हो, अगर उसका कुशलतापूर्वक प्रस्तुतीकरण हो और उसे ढंग से कोरियोग्राफ किया जाए, तो दर्शकों के लिए इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। हाल ही में मैं और मेरी टीम ने एडिनबरा के इंटरनेशनल आर्ट फेस्टिवल में क्लासिकल डांस की प्रस्तुति दी थी, जिसका शीर्षक था, ‘अनचार्टेड सीज।’ वहां की मीडिया और जनता ने इसकी खूब तारीफ की थी। इसी तरह हमें एडीलेड में भी ऑल एशिया आर्ट फेस्टिवल में लोगों की तारीफ मिली। ऐसा ही कुछ हुआ जब कंबोडिया और लाओस में हमने अपनी प्रस्तुति दी।
कहने का मतलब यह है कि शास्त्रीय नृत्य के बारे में भारत के लोग जितना जानते हैं, विदेशी उससे भी कम। न तो उन्हें हमारी शब्दावली पता होती है, न ही संस्कृति। इसके बावजूद भी कार्यक्रम के दौरान मिलने वाली जानकारी के सहारे वे कला के आकर्षण से खुद को बांध लेते हैं। यही अनुभव आज के समाज में भी इस प्राचीन कला को पसंद करने का एक नायाब उदाहरण है। एक कलाकार जब अपनी प्रस्तुति देता है, तो उसे कुछ बातों का ख्याल जरूर रखना चाहिए। सबसे पहले तो उसके अंदर क्लासिज्म होनी चाहिए, तभी वह परंपरा के पैमाने पर खरा उतर पाएगा। दूसरा कंटेंट अच्छा होना चाहिए और सबसे बड़ी बात प्रस्तुति के लिए बेहद सावधान रहना चाहिए। इसके बाद उसे दर्शकों की तालियां और वाहवाही जरूर मिलेगी।