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विकसित होनी चाहिए शौचालय की संस्कृति
क्ष्ामा श्ार्मा
Updated Fri, 10 Oct 2014 12:25 AM IST
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इन दिनों यह चर्चा जोरों पर है कि भारत के हर घर में शौचालय होना चाहिए। इसे मां-बहनों की इज्जत के साथ जोड़कर भी देखा जा रहा है। बताया जा रहा है कि जिन घरों में शौचालय नहीं हैं वहां आंधी, तूफान, बरसात में औरतों, बच्चियों को खुले में जाना पड़ता है, इससे उनके खिलाफ अपराध बढ़ते हैं। बलात्कार जैसे वीभत्स कृत्य होते हैं। ये बातें गांवों की सही तसवीर खींचती हैं, मगर शहरों के भी बहुत कम इलाकों में औरतों के लिए शौचालय की सुविधा मौजूद है। भीड़-भाड़ वाले बाजारों तक में नहीं।
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शायद अब भी कहीं यह सोच मौजूद है कि बाजार में जाना भले घर की औरतों का काम नहीं है। और सच बात भी है, औरतों की जेब में इतने पैसे कभी रहे भी नहीं हैं कि वे खरीदारी कर सकतीं। इसीलिए उनके लिए मामूली सुविधाओं के बारे में सोचा तक नहीं गया।
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इस मुहिम के संदर्भ में जो बार-बार सोचनी पड़ती है, वह यह कि आजकल के शौचालयों के इस्तेमाल के लिए जितना पानी चाहिए वह अभी ही कम पड़ता है, जबकि देश की साठ प्रतिशत जनता के पास शौचालय की सुविधा नहीं है। यदि सबके पास यह सुविधा हो जाए, तो पानी का बंदोबस्त कैसे होगा?
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आज तक शायद ही किसी एजेंसी ने यह आकलन सही तरीके से किया है कि पूरे देश में इस सुविधा को मुहैया कराने के लिए कितने पानी की जरूरत पड़ेगी और हम उसे कैसे जुटाएंगे, क्योंकि शहरों में जो सीवेज सिस्टम है, उसकी गंदगी नाले और नालियों से होकर नदियों में प्रवाहित कर दी जाती है। नदियों के प्रदूषण की यह हालत है कि उनका पानी आदमी के पीने योग्य तो छोड़िए, जानवरों के नहाने लायक तक नहीं है।
हमारे यहां जो जातिवाद है, वह हमारी इस सोच में भी निहित है कि गंदगी करें हम और साफ करे कोई और। तभी तो हम अपना कूड़ा दूसरे के दरवाजे पर खिसकाकर कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। प्रधानमंत्री मोदी जहां लोगों को स्वच्छता की शपथ दिलाते हैं, वहां से वे लोग जब लौटते हैं, तो जिस इंडिया गेट पर वे पूरे देश को साफ करने की शपथ खा रहे थे, उसे ही कचरे से पाटते हुए लौटते हैं। पता नहीं, क्यों कोई शपथ हमारी चेतना का हिस्सा नहीं बनती!
जहां शौचालय नहीं हैं वहां की तो छोड़िए, जहां लोगों की सुविधा के लिए इन्हें बनाया गया है, वहां के क्या हाल हैं। बड़े से बड़े सरकारी दफ्तरों, अस्पतालों, सार्वजनिक स्थानों के शौचालय बेहद गंदे हैं। यहां अधिकांश में पानी भी नहीं होता। यही हाल रेल गाड़ियों का भी है। इसका सारा दोष सिर्फ सफाईकर्मियों के मत्थे नहीं मढ़ा जा सकता कि वे इन्हें साफ नहीं करते। बल्कि इन्हें इस्तेमाल करने वाले इस बात पर कभी ध्यान नहीं देते कि अगर उन्हें यह पसंद है कि वे साफ-सुथरी जगह का इस्तेमाल करें, तो दूसरों को भी उन्हें यह सुविधा प्रदान करनी होगी।
बात फिर वहीं आकर ठहर जाती है कि मेरी फैलाई गंदगी को कोई दूसरा साफ करेगा। इसी कारण हमारे देश में आज भी जातिवाद का राक्षस मुंह फैलाए खड़ा है। यदि हमने यह सोच नहीं बदली तो, महात्मा गांधी की डेढ़ सौवीं जयंती तो क्या ढाई सौवीं जयंती भी निकल जाएगी और कुछ नहीं होगा।