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परिदृश्य: आज की कला यानी नए के नाम पर पुराना और चंद नामों का ताना-बाना
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सार
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कौमुदी मुंशी (ठुमरी गायिका)
- फोटो :
सोशल मीडिया
विस्तार
नई शती के दो दशक बीत गए। दृश्य विद्रूप संसार में हम यह भूल गए कि हमारा भी कोई निजी अस्तित्व है और हमें दूसरों की बात नहीं दोहरानी। पिछली शती तक कम से यह तथ्य जीवित था कि कला, विद्या और शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिभाएं अपनी बात कहने को उत्सुक रहती थीं। पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी के माध्यम से, शिक्षा परिसरों में शिक्षक अपने शोध प्रबंध के जरिये और कला की दुनिया में अपने विचार के जरिये कलाकार अपनी जगह बनाते थे। क्या यह स्खलन पिछली शती के ढलते वर्षों में ही दिखने लगा था या पैसे और प्रसिद्धि के भंवर में वे लोग, जो अपने को अब भी साहित्य, कला और विज्ञान की दुनिया में गर्व से रखना चाहते हैं, यह भूल गए हैं कि उन्हें अपनी मौलिकता के साथ प्रस्तुत होना है।
तमाम पुस्तक मेले, साहित्य उत्सवों और परिसर संगोष्ठियों को देखते हुए तो ऐसा ही लगता है। पिछले दिनों मुझे मुंबई विश्वविद्यालय और पुणे फिल्म संस्थान में एक बार फिर, करीब एक दशक बाद, फिल्म पढ़ाने का अवसर मिला। विश्वविद्यालय में फिल्म की शब्दावलियों से विद्यार्थी परिचित न हों, यह समझ में आता है, लेकिन फिल्म संस्थान में विद्यार्थी 'मेजॉन अबीम' जैसी तकनीकी शब्दावली को आश्चर्य से सुन रहे थे।
ठीक इसी तरह प्रकाशित कविताओं, कहानियों और इनके संग्रहों से होकर गुजरते हुए यह स्पष्ट होता है कि युवा लेखक और कवि तीसरे दर्जे के रचनाकारों को पढ़ने तक ही सीमित हैं या फिर पहले दर्जे की उन्हें भनक नहीं, या फिर ऐसी संवेदन ग्राह्यता ही उनमें पनप नहीं पाई है। कुछ प्रतिभाएं हरी घास पर क्षण भर की तरह दिखती हैं। न कविताओं में काव्य स्पर्श है, न उनके गद्य में। हाल ही में कृष्णबिहारी मिश्र का देहांत हुआ। पत्रकारिता पर लिखी उनकी किताब गद्य के देश में एक किंवदंती है और इसे पढ़कर युवा लेखक भाषिक दृष्टि और मौलिक विमर्श का नया संस्कार खुद में ला सकते हैं। यह किताब पढ़ने से हिंदी साहित्य और भाषा का संस्कार गहन होता है। कृष्णबिहारी मिश्र का आलोकवर्षी साहित्य वैशिष्ट्य देखकर ही हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस किताब की भूमिका लिखी थी।
याद आता है, कभी युवा फिल्मकारों को इंगमार बर्गमैन ने कहा था कि यदि आपके पास कहने को कुछ नहीं है, तो आपको फिल्म नहीं बनानी चाहिए। जिन फिल्म रसिकों ने उनकी सेवेन्थ सील और वाइल्ड स्ट्रॉबेरीज देखी हैं, वे मौलिकता पर उनकी यह बात सहज उष्णता के साथ समझ सकते हैं। हजारी प्रसाद जी इसे ही पुनर्नवा कहते थे।
अपने प्रकाश के वलय में आने से पहले का रचा हुआ सब कुछ मुरझाया हुआ है। वह सब कुछ जब इस प्रकाश के गोलार्ध में आता है, तो फिर से नया हो उठता है, वसंत की नई कोंपलों की तरह और उन्हें नया जीवन मिल जाता है। लेकिन यह प्रकाश, अपना प्रकाश युवा कलाकार या लेखक कहां से लाए! कला दीर्घाओं में तीन दशकीय कैनवास पर वह सब कुछ है, जो कहीं न कहीं हो चुका है। नया के नाम पर पुराना ही है। आज भी भारतीय कलाकार हेनरी मातीस, पॉल क्ली, पॉल सेजान, क्लाउडे मोने और वैन गॉग की प्रशंसा से बाहर नहीं आ पाते। रवींद्रनाथ, अबनींद्रनाथ, जामिनी राय या असित कुमार हालदार से आगे भी हम कभी चलेंगे!उसी तरह निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण और श्रीकांत वर्मा से आगे भी कभी कुछ हिंदी में लिखा जाएगा!
ऋत्विक घटक और कुमार गंधर्व के बाद क्या है? शास्त्रीय संगीत में ध्रुपद आज कोई सुनना नहीं चाहता और ख्याल के कलाकार ट्यूशन पर आश्रित हो गए हैं। ऐसे में जहिर है, हमें कोई दूसरा बड़े गुलाम अली या सिद्धेश्वरी देवी तो मिलने से रहा। संगीत यानी ठुमरी, तबला और कथक का कोई घराना कभी बनारस में भी हुआ करता था, अब नई पीढ़ी को फिल्म बनाकर यह दिखाने की जरूरत है।
एक उदाहरण से समझें। हाल ही में मैंने अपनी फिल्म पद्मकौमुदी की देश भर में सत्तर स्क्रीनिंग की। यह फिल्म ठुमरी साम्राज्ञी सिद्धेश्वरी देवी की शिष्या कौमुदी मुंशी के बहाने बनारस की ठुमरी पर केंद्रित है। सिद्धेश्वरी देवी से सीखने के बाद कौमुदी बेन ने पिछले सत्तर साल में पूरे गुजरात और महाराष्ट्र में विशेष प्रतिष्ठा अर्जित की थी। वह बनारस की ही थीं।
फिल्म प्रदर्शन से यह बात सामने आई कि बनारस समेत पूरे उत्तर प्रदेश में संगीत रसिकों ने कौमुदी मुंशी का नाम ही नहीं सुना था। सभी सिद्धेश्वरी देवी के बाद उनकी बेटी सविता देवी से ही ठुमरी की इस गायकी की इतिश्री मान बैठे थे और फिर इसके बाद से शुरु हुआ गिरिजा देवी का संसार ही देश भर में मुखर हुआ, जो अब उनकी शिष्याओं के साथ अवसान की ओर है, क्योंकि उनकी एकमात्र शिष्या रूपान सरकार के अलावा हर किसी ने ख्याल गाना ही छोड़ रखा है। यह फिल्म बनाने का उद्देश्य ही यह था कि लोग यह जानें कि गिरिजा देवी की प्रतिष्ठा सिद्धेश्वरी देवी के जाने से नहीं हुई, बल्कि सिद्धेश्वरी देवी की ठुमरी धारा आगे भी चलती रही है, जारी है और वह सिर्फ सविता देवी तक सीमित नहीं हैं। हां, सिद्धेश्वरी देवी की जो धारा कौमुदी मुंशी ने गुरुऋण के रूप में आगे बढ़ाई, उसे कौमुदी मुंशी की शिष्याएं भी उसी एकनिष्ठ भाव के साथ आगे ले जा सकती हैं। नहीं तो यह नदी भी उसी तरह सूखती चली जाएगी, जैसे गिरिजा देवी की नदी धारा सूखती दिखती है। यह काम, जाहिर है, मौलिकता से भरी प्रतिभा से ही हो सकता है।