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सुधारों की रफ्तार बढ़ाना जरूरी

Mon, 05 Sep 2016 08:35 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 05 Sep 2016 08:35 PM IST
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to promote The pace of reforms Essential
जयंतीलाल भंडारी

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 7.1 फीसदी रही, जो पिछले वित्त वर्ष की पहली (7.5 प्रतिशत) और आखिरी तिमाही (7.9 फीसदी) से काफी कम है। जीडीपी में इस गिरावट की एक प्रमुख वजह सूखे के कारण कृषि उत्पादन में कमी आना है। कृषि क्षेत्र में 2.2 फीसदी की अनुमानित वृद्धि की जगह महज 1.8 फीसदी की दर से वृद्धि हुई है। यह दर गत वित्त वर्ष की पहली तिमाही (2.6 फीसदी) से काफी कम है। खनन में पहली तिमाही में 0.4 फीसदी की कमी आई, जबकि गत वित्त वर्ष की इसी तिमाही में यह क्षेत्र 8.5 फीसदी बढ़ा था। विनिर्माण क्षेत्र में महज 1.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि गत वित्त वर्ष की समान अवधि में यह क्षेत्र 5.6 फीसदी बढ़ा था। कृषि और उद्योग की विकास दर में कमी के बीच सेवा क्षेत्र की विकास दर से सरकार को थोड़ी राहत मिली है।

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पहली तिमाही में सेवा क्षेत्र की विकास दर बढ़कर 9.6 फीसदी हो गई। पिछले वर्ष आर्थिक विकास के विभिन्न कदमों के साथ-साथ विदेशी निवेश के रास्ते खोलने के लिए एफडीआई में ढील और मेक इन इंडिया जैसी सरकार की बहुप्रचारित योजनाओं के बाद भी देश की विकास दर पिछले साल के मुकाबले कम रही है।
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रिजर्व बैंक की अगस्त, 2016 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि औद्योगिक वृद्धि में ठहराव है और उसमें निकट भविष्य में सुधार होता नहीं दिख रहा। इसकी मुख्य वजह है निजी निवेश में तेजी न आना और सरकारी व्यय का धीमा होना। हाल ही में आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) ने कहा कि भारत में आर्थिक विकास बढ़ाने के लिए आर्थिक सुधारों की गति बढ़ाना जरूरी है। उसके मुताबिक, भारत में कंपनियों और बैंकों की बैलेंस शीट की कमजोरी, श्रम सुधारों की धीमी गति और मंद निर्यात से पैदा चुनौतियां आर्थिक वृद्धि को प्रभावित कर रही हैं।
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बेशक पिछले दो वर्षों में आर्थिक और वित्तीय चुनौतियों के बीच मोदी सरकार ने प्रशासन को नीतिगत पंगुता से कमोबेश मुक्ति दिलाई है। वर्ष 2014 में कच्चे तेल की कीमतों में आई जबर्दस्त कमी ने मुद्रास्फीति पर नियंत्रण के साथ चालू खाते के घाटे और राजकोषीय घाटे को प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित किया है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाई गई। स्पेक्ट्रम, कोयला और खनन क्षेत्र में व्यवस्थागत सुधार हुए हैं। सार्वजनिक उपक्रमों का प्रदर्शन सुधारा जा सका है। कपड़ा नीति में सुखद बदलावों में खासतौर से ड्यूटी ड्रॉ बैंक और श्रम सब्सिडी से रोजगार अवसर और निर्यात बढ़ने की संभावनाएं बढ़ी हैं। सरकार ने सब्सिडी की प्रासंगिकता को भी पुन: परिभाषित किया है। जीएसटी के आगामी एक अप्रैल से लागू होने की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, पर विकास की दौड़ में आगे बढ़ने के लिए आर्थिक सुधारों की रफ्तार बढ़ानी होगी। छिपी हुई सब्सिडी का बोझ कम कर लाभ का इस्तेमाल नकद हस्तांतरण के जरिये जरूरतमंदों तक पहुंचाने में किया जाना चाहिए।


हालांकि अब भी कुछ वजहें हैं, जिनके आधार पर आर्थिक विकास दर के बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। जैसे, खरीफ की फसल आने तक अच्छे मानसून का पूरा प्रभाव नजर आने लगेगा और आय में इजाफा होगा। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग बढ़ेगी। साथ ही, सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद शहरी क्षेत्र की मांग में भी सुधार नजर आएगा।

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