चुनावी नतीजे: यह वह समय है, जब हम राजनीतिक पंडित देश भर में घूम-घामकर वापस दिल्ली लौट आते हैं
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जिस दिन की प्रतीक्षा महीनों से थी, वह इस सप्ताह आने वाला है। इसी सप्ताह हम जान जाएंगे कि मोदी सरकार एक बार फिर बनेगी कि नहीं। यह वह समय है, जब हम राजनीतिक पंडित देश भर में घूम-घामकर वापस दिल्ली लौट आते हैं और चुनाव अभियान का फुरसत में विश्लेषण करने बैठते हैं। सो यह लिखने से पहले ऐसा मैंने भी किया।
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जिस दिन की प्रतीक्षा महीनों से थी, वह इस सप्ताह आने वाला है। इसी सप्ताह हम जान जाएंगे कि मोदी सरकार एक बार फिर बनेगी कि नहीं। यह वह समय है, जब हम राजनीतिक पंडित देश भर में घूम-घामकर वापस दिल्ली लौट आते हैं और चुनाव अभियान का फुरसत में विश्लेषण करने बैठते हैं। सो यह लिखने से पहले ऐसा मैंने भी किया।
कॉफी का प्याला अपने लैपटॉप के बगल में रखा और पिछले दो महीनों के अखबारों के संपादकीय पढ़ने लगी। यू-ट्यूब पर कामदार और नामदार (बहन-भाई) के भाषण सुने। फिर उस गठबंधन के आला नेताओं के भाषण सुने, जिसको मोदी महामिलावट कहते हैं। ऐसा करने के बाद लगा, जैसे चुनाव आयोग ने आम चुनाव को इतना लंबा घसीट कर अन्याय किया।
ऐसा इसलिए कहती हूं, क्योंकि शुरू में असली मुद्दे सबने उठाने के प्रयास किए थे। विपक्ष की तरफ से बेरोजगारी और किसानों की समस्याओं की बातें हुई थीं। विकास, सुरक्षा और गरीबी हटाने के सफल प्रयासों के मुद्दे नरेंद्र मोदी और उनके साथियों ने उठाए। इन बातों के बीच ही पुलवामा का वह आत्मघाती आतंकवादी हमला और इसके बाद बालाकोट पर भारत का जवाबी हमला हुआ। कुछ हफ्ते यही बातें चलीं। इस दौरान मैं जब राजस्थान गई, तो ऐसा लगा, जैसे इस चुनाव में देश की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बनकर रहेगा। उन दिनों मोदी की प्रशंसा जगह-जगह सुनने को मिली।
जो कभी पशुपालन से गुजारा करते थे या चमड़ा या मांस उद्योग में काम करते थे, वे अब मजदूरी करते हैं। हिंदू किसान भी परेशान हैं, क्योंकि अब बूढ़ी गाएं बेची नहीं जातीं, सो भूखी, आवारा गाएं फसल बर्बाद कर रही हैं। अगले प्रधानमंत्री के लिए यह बहुत बड़ी समस्या बन सकती है। समाधान ढूंढना मुश्किल हो गया है, क्योंकि गोरक्षकों को अब कौन रोक सकता है?
इसके बावजूद यह कहना ज़रूरी है कि मैंने अपने चुनावी दौरों में सौ से ज़्यादा लोगों से बातें की होंगी और उनमें दस से भी कम ऐसे लोग मिले होंगे, जिन्होंने मोदी की आलोचना की। अधिकतर ऐसे लोग मिले, जिन्होंने बेझिझक कहा कि वे मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। जिनको झिझक थी, वे स्पष्ट कर देते थे कि मोदी ने अपने सारे वादे तो पूरे नहीं किए हैं, फिर भी राहुल गांधी से अच्छे हैं, सो उनका वोट मोदी को मिलेगा। मोदी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है कि मतदाता देख चुके हैं कि वह दिन रात देश की भलाई के लिए काम कर रहे हैं, अपने परिवार की भलाई के लिए नहीं।
कुछ ही दिनों में पता लग जाएगा कि प्रधानमंत्री निवास में किसका प्रवेश होगा। काश कि वह दिन हम कुछ घंटों में ही ला सकते। यह चुनाव इतना लंबा चला है कि अगली बार चुनाव आयोग को कोई ऐसा उपाय ढूंढना होगा, जिससे इतना लंबा चुनाव अभियान फिर से बर्दाश्त न करना पड़े। इतने लंबे चुनाव अभियान से नुकसान राजनीतिज्ञों का इतना नहीं हुआ है, जितना देश का हुआ है। चुनाव आयोग को अगली बार कम दिनों में आम चुनाव को समाप्त करने का प्रयास करना होगा।