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बड़े सवालों से टकराने का वक्त

Wed, 08 Jan 2014 09:08 PM IST
मनोज मिश्र
मनोज मिश्र Updated Wed, 08 Jan 2014 09:08 PM IST
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time to face big question

जैसा कि अपेक्षित था, दिल्ली विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित सफलता से उत्साहित आम आदमी पार्टी (आप) ने लोकसभा चुनाव में पूरे दम-खम के साथ उतरने की घोषणा कर दी है। उम्मीद की जा रही है कि पार्टी करीब 300 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।

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विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों ने अपना जोर मुख्यत: बिजली, पानी और सरकारी दफ्तरों में व्याप्त भ्रष्टाचार तक सीमित रखा था। लेकिन अब ऐसा कर पाना संभव नहीं हो सकेगा। भारत जैसे विशाल देश की सत्ता पर दावेदारी करने वाले किसी भी दल को उन सवालों से टकराना ही होगा, जिनसे बाकी सभी राष्ट्रीय पार्टियां जूझ रही हैं।
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विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक संवाददाता सम्मेलन में देश की विदेश नीति के संबंध में सवाल पूछे जाने पर अरविंद केजरीवाल ने प्रतिप्रश्न किया था कि आप मुलायम सिंह या मायावती से यह सवाल क्यों नहीं पूछते। पहले केजरीवाल ऐसा कह सकते थे, पर बदले हालात में यह संभव नहीं है।
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देश के लोग उनसे और उनके साथियों से जानना ही चाहेंगे कि उनकी पार्टी की आर्थिक दृष्टि क्या है? क्या 'आप' उदारीकरण की समर्थक है या इसका विरोध करती है? अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के संदर्भ में कहा है कि वह वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) के सरलीकरण का प्रयास करेंगे। उन्होंने यह भी कहा है कि खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश दिल्ली में लागू नहीं होने देंगे।

लेकिन महज इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह उदारीकरण के विरोधी हैं। ज्यादातर आर्थिक प्रश्नों के जवाब में 'आप' के नेताओं की ओर से मोहल्ला सभाओं और ग्राम सभाओं को सत्ता स्थानांतरित कर निचले स्तर से फैसले लेने की व्यवस्था विकसित करने का तर्क दिया जाता है। लेकिन इसे लागू कैसे किया जाएगा, इसका ठोस जवाब 'आप' के पास नहीं है। मोहल्ला सभाएं न सही, ग्राम सभाएं तो पहले से ही देश में मौजूद हैं। सब जानते हैं कि वह भी क्षुद्र राजनीति का अड्डा बनी हुई हैं। किस चमत्कार से केजरीवाल इनका कायांतरण कर देंगे?

एक तर्क यह दिया जा रहा है कि आर्थिक नीतियों के संदर्भ में केजरीवाल चीन के पूर्व सर्वेसर्वा देंग श्याओ पिंग की नीतियों पर चलने के हामी हैं। यानी मुद्दा यह नहीं है कि बिल्ली काली है या सफेद। महत्वपूर्ण बात यह है कि बिल्ली चूहे पकड़ती है या नहीं। अगर केजरीवाल की यही आर्थिक दृष्टि है, तो भी उन्हें लोगों के सामने इसे विस्तार से रखना होगा। एक बड़ा प्रश्न देश की धर्मनिरपेक्ष विरासत को अक्षुण्ण रखने का भी है। केजरीवाल और उनके साथियों को बताना ही होगा कि उनके लिए सांप्रदायिकता कोई मुद्दा है या नहीं।

अल्पसंख्यकों को संरक्षण दिए जाने के संदर्भ में वह क्या सोचते हैं? वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को सांप्रदायिक संगठन मानते हैं या नहीं। गुजरात के दंगों में मोदी सरकार की भूमिका को लेकर उनकी क्या राय है। अभी तक 'आप' के नेता कांग्रेस और भाजपा को कोसते आए हैं। पर बात जब गुजरात दंगों की हो, तो उन्हें मोदी की भूमिका को अलग से रेखांकित करते हुए अपनी राय सामने रखनी ही होगी। यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि उनके लिए मोदी और राहुल कोई मुद्दा नहीं हैं। जो पार्टी राजनीति में शुचिता की बात करती हो, उसे वैचारिक ईमानदारी भी दिखानी चाहिए।

आरक्षण भी इस देश में एक बड़ा प्रश्न है।

सिर्फ यह कह देना कि हर जरूरतमंद की मदद की जाएगी, एक किस्म की चतुराई है। 'आप' को साफ बताना होगा कि क्या वह आर्थिक आधार पर आरक्षण की पक्षधर है? या क्या वह जातिगत आधार पर आरक्षण की विरोधी है? सवाल और भी हैं, नक्सलवाद व जम्मू-कश्मीर से लेकर बाबरी मस्जिद तक। अरविंद केजरीवाल अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं, तो उन्हें अपने व्यक्तित्व को बदली चुनौतियों के आधार पर ढालना ही होगा। जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य नहीं हुए। उनकी एक बड़ी हैसियत पहले ही बन गई थी। उन्होंने कभी नहीं कहा कि विदेश नीति संबंधी सवालों के जवाब तभी देंगे, जब प्रधानमंत्री बनेंगे। अरविंद केजरीवाल इंजीनियरिंग के छात्र और आयकर विभाग के अधिकारी रहे हैं। राजनीति में उतरने के बाद उन्हें इतिहास का अच्छा विद्यार्थी भी बनना चाहिए।

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