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टाइम मशीन: बिस्मार्क ने बुजुर्गों की दुनिया बदल दी; अतीत से सुनें वर्तमान की धड़कन
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सार
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बुजुर्ग महिला (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो :
एएनआई (फाइल)
विस्तार
भयानक आर्थिक मुसीबतों के बीच रानी एलिजाबेथ को नई व्यवस्था करनी पड़ी है। दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी साम्राज्य में ऐसे कानून बनाए गए, जो गरीबों के लिए थे। तख्त के हुक्म पर उन लोगों की पहचान की गई, जिन्हें शासन से मदद दी जानी है। इनमें बेहद गरीब बुजुर्ग और विकलांग शामिल हैं।
रट में पेंशन को लेकर बड़ी ले-दे मची है। चुनावों की गुणा-गणित के बीच राजनीतिक दल तय नहीं कर पा रहे हैं कि भारत की बुजुर्ग और निर्धन आबादी को क्या सामाजिक सुरक्षा दी जाए। कांग्रेस, जिसने कर्मचारी पेंशन की पुरानी प्रणाली को विधानसभा चुनाव में जीत का जरिया बनाया था, वह लोकसभा चुनाव में खुलकर इस स्कीम का वादा नहीं कर रही। इधर भाजपा जो नई पेंशन प्रणाली लागू कर रही है, उसे लग रहा है कि पुरानी प्रणाली के एक हिस्से यानी गारंटीड पेंशन की व्यवस्था को नई प्रणाली में जोड़ा जा सकता है।
पुरानी पेंशन, यानी जिसमें सरकारें अपने रिटायर्ड कर्मचारियों को एक निर्धारित पेंशन की गारंटी देती हैं, जो उनके आखिरी वेतन का लगभग आधा होती है। नई पेंशन में कर्मचारी के पेंशन-योगदान का बाजार में निवेश होता है और रिटर्न के आधार पर कर्मचारियों को पेंशन मिलती है।
यानी होते-करते दुनिया का सबसे रोमांचक, जी हां, सबसे सनसनीखेज सामाजिक सुरक्षा सुधार भारतीय राजनीति की मुख्यधारा में अपनी जगह बना रहा है। दुनिया के कई देशों में बजटों की तस्वीर बदल दी थी इस अनोखे प्रयोग ने, जिसे पेंशन कहते हैं।
आइए, टाइम मशीन का इंजन गुर्रा रहा है।
पकड़िए अपनी सीट और उड़ चलते हैं 16वीं सदी की ओर, जब ब्रिटेन के तख्त पर रानी एलिजाबेथ प्रथम विराज रही थीं। महारानी एलिजाबेथ की प्रजा अकाल से जूझ रही है। चौतरफा बेरोजगारी है और आर्थिक संकट।
इस वक्त तक राजाओं और सम्राटों की योजना और नीतियों में गरीब-गुरबों की कोई जगह नहीं है। यह जिम्मेदारी सामंतों पर थी कि अपने-अपने गुलामों या मजदूर-किसानों की फिक्र करें। भयानक आर्थिक मुसीबतों के बीच रानी एलिजाबेथ को नई व्यवस्था करनी पड़ी है।
क्या आप उस एलान को सुन पा रहे हैं, जिन्हें पुअर लॉज कहा जा रहा है। दुनिया के इतिहास में पहली बार किसी साम्राज्य में ऐसे कानून बनाए गए, जो गरीबों के लिए थे।
तख्त के हुक्म पर उन लोगों की पहचान की गई, जिन्हें शासन से मदद दी जानी है। इनमें बेहद गरीब, बुजुर्ग और विकलांग शामिल हैं। मगर जरा ठहरिए, यह भी देखिए कि इन्हीं कानूनों के आधार पर साम्राज्य ने नए टैक्स लगाने की व्यवस्था भी शुरू की है। 16वीं सदी के ब्रिटेन में विचरते हुए आपको मुश्किल से यह भरोसा होगा कि यही कानून अगले 250 साल तक इस्तेमाल होने वाले हैं।
अब टाइम मशीन की रफ्तार बढ़ाते हैं। 19वीं सदी की तरफ बढ़ते हुए आपको पता चल रहा होगा कि ब्रिटेन में पुअर लॉज तो बन गए, मगर इसके बावजूद तत्कालीन दुनिया के पास लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने की कोई स्थायी व्यवस्था नहीं थी।
अब हम 19वीं सदी में हैं। यह ब्रिटेन का विक्टोरियन युग है, जहां औद्योगिक क्रांति से आर्थिक ताना-बाना बदलने लगा है। मशीनों और विज्ञान की प्रगति के बावजूद इस युग में आर्थिक असमानता बढ़ रही है।
टाइम मशीन अब प्रशा (आज का जर्मनी) की तरफ बढ़ रही है। 21वीं सदी के जर्मनी, बेल्जियम, डेनमार्क, रूस, चेक गणराज्य, पोलैंड और लिथुआनिया इसी जर्मन राज्य से निकले थे। आपको नजर आएगा कि यहां बड़े राजनीतिक बदलाव खदबदा रहे हैं। ठीक पहचाना आपने इस शख्सियत को। यकीनन यह ओटो वॉन बिस्मार्क ही हैं। प्रशा के मिनिस्टर प्रेसीडेंट और जर्मन भाषी राज्यों का एकीकरण करने वाले। अब हम 1881 में हैं। प्रशा में बिस्मार्क का सूर्य तप रहा है। राजनीतिक आबोहवा में सोशलिस्ट और कंजर्वेटिव के बीच जोरदार खींचतान चल रही है। समाजवादी साम्यवादी राज्य की कल्पना जर्मनी के लोगों को उत्साहित कर रही है।
जर्मनी की संसद में कुछ अभूतपूर्व होने वाला है, जो अब तक दुनिया में कभी नहीं हुआ। ओटो वॉन बिस्मार्क ने यहां एक प्रस्ताव पेश कर तहलका मचा दिया है। वह देखिए, बिस्मार्क की तरफ यह प्रस्ताव कौन रख रहा है? जी यकीनन, यह जर्मन सम्राट विलियम द फर्स्ट हैं। इस प्रस्ताव में कहा गया है कि जर्मन समाज के बुजुर्ग लोगों को जिंदगी की शाम गुजारने के लिए मदद दी जानी चाहिए, यानी कि उन्हें रिटायर होने का मौका दिया जाना चाहिए।
आप तो 21वीं सदी से आए हैं न, जहां रिटायरमेंट अब कानून का हिस्सा है। इसलिए शायद आपको इस प्रस्ताव की क्रांतिकारी ऊर्जा का एहसास नहीं होगा, मगर 19वीं सदी तक के यूरोप में लोग जब तक जीवित रहते थे, काम करते थे।
आप जिस जर्मनी में हैं, वहां रिटायरमेंट यानी सेवानिवृत्ति जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। सुना नहीं, बिस्मार्क क्या कह रहे हैं? उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव को आप सोशलिस्ट कहें या कुछ और, मगर जनता के लिए यह जरूरी है।
यह 1890 है। बिस्मार्क जर्मन राज्य के पहले चांसलर बन गए हैं। दुनिया की पहली सार्वजनिक पेंशन प्रणाली शुरू कर दी गई है। अब सरकार बुजुर्गों की पेंशन देने वाली थी। शुरुआत में इस पेंशन की पात्रता के लिए 70 साल की उम्र तय की गई थी। बाद में जर्मनी में इसे घटाकर 65 साल कर दिया गया।
पेंशन की चर्चाओं के बीच 1884 में जर्मनी में वर्कर्स कंपनसेशन कार्यक्रम लागू हो चुका था। कर्मचारियों के लिए स्वास्थ्य बीमा जैसी व्यवस्था भी आ गई थी। पेंशन की लहर चली, तो जर्मनी ने कर्मचारियों के लिए उनके योगदान पर आधारित पेंशन प्रणाली भी लागू कर दी। इन स्कीमों में नियोक्ता और कर्मचारी, दोनों योगदान करते थे। अब विकलांगों को भी बजट से मदद मिलने लगी है। इसके बाद 1927 में जर्मनी में बेरोजगारी बीमा का प्रयोग भी हो गया।
21वीं सदी की तरफ बढ़ते हुए आपको एहसास होगा कि पहली बड़ी जंग के बावजूद जर्मनी में दुनिया का सबसे उन्नत सामाजिक सुरक्षा ढांचा बन गया था। जर्मनी के इन प्रयोगों ने पूरे यूरोप को प्रेरित किया। 1909 में ब्रिटेन में ओल्ड एज पेंशन लागू कर दी गई।
ब्रिटेन से गुजरते हुए आपको ब्रिटेन के प्रधानमंत्री एच एच एक्विथ और वित्त मंत्री डेविड लॉयड जॉर्ज दिखेंगे, जिन्होंने पेंशन देने के लिए दो बार अपनी सरकार गंवा दी। 1935 में अमेरिका में सोशल सिक्योरिटी शुरू हुई। 1965 में बुजुर्गों के लिए मेडिकेयर आया। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यूरोप और अमेरिका में निजी पेंशन प्लान का प्रचलन शुरू हो गया था।
ओटो वॉन बिस्मार्क ने बुजुर्गों की दुनिया बदल दी। पेंशन अब सरकारों की जिम्मेदारी बन गई थी।
टाइम मशीन अब रोम में उतरेगी, क्योंकि हम रोमन सम्राट ऑगस्टस की यादों के साथ यह सफर खत्म करना चाहते हैं। ईसा पूर्व 13वीं सदी में सम्राट ऑगस्टस अपने सैनिकों को बीस साल की सेवा के बाद पेंशन देते थे। इसके लिए अमीरों पर विरासत टैक्स लगाया जाता था।
रोम में टहलते हुए भारत में सार्वजनिक पेंशन की उम्मीद पर बहस कीजिए, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने बताया है कि 2030 तक करीब 20 करोड़ लोग और 2050 तक वरिष्ठ नागरिक यानी सीनियर सिटीजन भारत की आबादी में करीब 21 फीसदी होंगे। फिर मिलेंगे अगले सफर पर...