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आज भी सुरक्षित नहीं हैं बाघ

Wed, 26 Feb 2020 06:22 PM IST
Raman Singh ज्ञानेन्द्र रावत
ज्ञानेन्द्र रावत Published by: Raman Singh Updated Wed, 26 Feb 2020 06:22 PM IST
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Tigers are not safe even today
ज्ञानेन्द्र रावत - फोटो : a

बीते दिनों भाजपा सांसद एवं राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की सदस्य दीया कुमारी ने राजस्थान के रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान से 26 बाघों के गायब होने का आरोप लगाते हुए कहा है कि विलुप्तप्राय जीवों की रक्षा करना और उनकी तादाद बढ़ाना राष्ट्रीय उद्यान की जिम्मेदारी है। दीया कुमारी ने केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भेजे पत्र में अपील की है कि वह बाघों के गायब होने की उच्च स्तरीय जांच कराएं और वन्य जीवों का शिकार करने वाले लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई करें। एक ओर जहां सरकार बाघ के संरक्षण और उनकी बढ़ोतरी का दावा करते नहीं थकती, वहीं बाघों के गायब होने और उनकी हत्या की घटनाएं हो रही हैं।


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बाघों के संरक्षण के लिए काम करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल टाइगर फोरम के अध्ययन में बताया गया है कि भारत की स्थितियां बाघों के आवास के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। अध्ययन के मुताबिक, भारत में कुल मिलाकर 38,915 वर्ग किलोमीटर का इलाका बाघों के रहने लायक है। यह इलाका पूरी तरह जंगलों से घिरा है और उच्च तापमान विविधता और मध्यम शुष्क स्थिति बाघों के लिए बेहद अनुकूल है। इन इलाकों में उन्हें पानी के लिए भटकना नहीं पड़ता और इंसानी दखल भी बहुत कम है।

सरकारी दावों के मुताबिक, बीते चार वर्षों में (2014 से 2018 के बीच) बाघों की संख्या में 34 फीसदी यानी 741 बाघों की बढ़ोतरी हुई। इसे दुनिया की सबसे बड़ी वन्यजीव गणना कहा जाता है। यह गणना असलियत में कुल 15 महीनों में पूरी हो सकी। 2014 में देश में बाघों की तादाद 2,226 आंकी गई थी, जो 2018 में बढ़कर 2,967 हो गई थी। हालांकि वन्यजीव विशेषज्ञ सरकारी आंकड़ों को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। जहां तक बाघ संरक्षित क्षेत्र की बात है, 2014 में यह आंकड़ा 692 था, जो अब बढ़कर 860 हो गया है। यही नहीं, सामुदायिक संरंक्षित क्षेत्र की तादाद भी बढ़कर 43 से 100 हो गई है। 2018 की गणना की मानें, तो मध्यप्रदेश देश में सबसे ज्यादा 526 बाघों वाला प्रदेश बन गया, जबकि कर्नाटक 524 बाघों के साथ दूसरे और 442 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे स्थान पर है।

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि बाघों को बचाने के जो प्रयास हुए हैं, उनकी गति और तेज की जानी चाहिए। निश्चित रूप से यह प्रशंसनीय और स्वागतयोग्य कथन है। लेकिन एक ओर जहां बाघों की तादाद में बढ़ोतरी के दावे किए जा रहे हैं, वन्यजीव अभयारण्यों के प्रबंधन को बेहतर माना जा रहा है, वहीं देश में बाघों के शिकार में बढ़ोतरी होना चिंतनीय है। बाघों के आपसी संघर्षों में मौतों के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है।

बीते चार वर्षों में करीब 300 करोड़ से अधिक के वन्यजीव उत्पादों की बरामदगी बताती है कि तस्करों को किसी का भय नहीं है। सरकार बीते दस वर्षों में तकरीब 530 बाघों की मौत का दावा करती है, जबकि वन्यजीव विशेषज्ञ यह तादाद उससे भी कहीं अधिक बताते हैं। इनके आवास स्थल जंगलों में अतिक्रमण, प्रशासनिक कुप्रबंधन, चारागाह का सिमटते जाना, जंगलों में प्राकृतिक जलस्रोत के खात्मे से इनका मानव आबादी की ओर आना घातक है। आपसी संघर्ष और दिनोंदिन बढ़ते अवैध शिकार के चलते इनकी मौतों का आंकड़ा भी हर साल बढ़ता ही जा रहा है। विचारणीय है कि जब वन्यजीव अभयारण्यों का प्रबंधन इतना बढ़िया है, तो बाघ कैसे गायब होते या शिकारियों द्वारा मारे जाते हैं, इसका जबाव किसी के पास नहीं है।

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