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आंध्र प्रदेश की तीन राजधानियां!
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जगन मोहन रेड्डी
- फोटो : facebook/YSJagan
आंध्र प्रदेश के राजनीतिक हलकों और आम लोगों को तब हैरानी हुई, जब मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी ने घोषणा की कि दक्षिण अफ्रीका की तरह प्रदेश की तीन राजधानियां होंगी। आंध्र सरकार का मत है कि विधायी राजधानी अमरावती में, प्रशासिनक राजधानी विशाखापत्तनम में और न्यायिक राजधानी कर्नूल में होंगी। स्वाभाविक तौर पर विपक्षी तेलुगू देशम पार्टी ने सरकार के इस फैसले का विरोध किया है और मौजूदा राजधानी अमरावती क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी तरफ कर्नूल और विशाखापत्तनम में जश्न का माहौल है। पत्रकार, राजनेता और आम लोग इस मुद्दे पर बंट गए हैं। ऐसे में कोई भी पक्ष लेने के बजाय तार्किक रूप से इस पर विचार करने की जरूरत है।
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आंध्र प्रदेश का रायलसीमा क्षेत्र खराब जलवायु स्थितियों, सिंचाई सुविधाओं की कमी और औपनिवेशिक शोषण के कारण पिछड़ा है। दूसरी ओर प्राकृतिक संसाधनों, नदियों और सिंचाई सुविधाओं के कारण तटीय क्षेत्र समृद्ध रहे हैं। लंबे समय से जनता श्रीबाग समझौते को लागू करने की मांग कर रही थी, जिसमें फैसला किया गया था कि रायलसीमा और तटीय क्षेत्र में से किसी एक क्षेत्र में राजधानी होगी और दूसरे में उच्च न्यायालय। इस तरह आंध्र प्रदेश के उच्च न्यायालय को अमरावती से कर्नूल स्थानांतरित करने का फैसला लेकर मुख्यमंत्री ने रायलसीमा क्षेत्र के लोगों की शिकायतें दूर करने का प्रयास किया है। हालांकि तटीय आंध्र में भी हाई कोर्ट की बेंच स्थापित करने का प्रस्ताव है, जिससे लॉजिस्टिक का मुद्दा नहीं रहेगा। पर विशाखापत्तनम में सचिवालय को स्थानांतरित करने के मामले में ऐसा नहीं है।
प्रशासनिक मशीनरी को विशाखापत्तनम स्थानांतरित करने का प्रस्ताव तर्कसंगत नहीं है। न तो जनता ने इसकी मांग की थी और न ही इसकी कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। सरकार का विचार है कि सचिवालय को विशाखापत्तनम स्थानांतरित करने से उत्तरी तटीय क्षेत्र का विकास होगा। पर विशाखापत्तनम तो पहले से ही विकसित शहर है। इससे नई समस्याएं ही पैदा होंगी। मसलन, विधानसभा और सचिवालय के बीच की दूरी करीब 360 किलोमीटर हो जाएगी। इससे नीतिगत निर्णयों के क्रियान्वयन में भारी देरी होगी, जो राज्य के समग्र शासन को प्रभावित करेगा।
सचिवालय को स्थानांतरित करने के पक्ष में दूसरा तर्क है कि चंद्रबाबू नायडू द्वारा परिकल्पित 'सुपर राजधानी' के निर्माण के लिए सरकार के पास पर्याप्त धन नहीं है। सवाल उठता है कि जब एक राजधानी बनाने के लिए धन नहीं है, तो वह फिर तीन राजधानी क्यों बना रही है। तीन राजधानियों को उचित ठहराने के पक्ष में जो तीसरा तर्क दिया जा रहा है, वह यह कि कथित तौर पर तेदेपा नेताओं ने अमरावती क्षेत्र में अचल संपत्ति की कीमतों में वृद्धि के कारण अवैध लाभ कमाया है। अगर ऐसा है, तो इसकी गहन जांच होनी चाहिए और मुकदमा चलाकर दोषियों को सजा दिलानी चाहिए।
यदि आंध्र प्रदेश की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मौजूदा आर्थिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को देखें, तो तीन राजधानी बनाने का प्रस्ताव राजनीतिक स्थिरता के लिहाज से सही लगता है। पर विशाखापत्तनम को प्रशासनिक राजधानी बनाने के फैसले पर पुनर्विचार करना बुद्धिमानी होगा। अगर धन की समस्या है, तो सरकार सिंगापुर मॉडल की इमारतें बनाने के बजाय किफायती रास्ता अपना सकती है। अंततः राज्य के लिए शासन की गुणवत्ता मायने रखती है। लाख टके का सवाल यह है कि जगन रेड्डी को यह सलाह कौन देगा और क्या वह उसे सुनेंगे!