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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Three bright visions of hope, ringing of bells in temples of Habbakdal, a balm for the deep rifts of the 1990s

मुद्दाः उम्मीद के तीन उजले दृश्य, हब्बाकदल के मंदिरों में गूंजती घंटियां, 1990 के दशक में गहरी दरारों पर मरहम

Thu, 02 Apr 2026 08:23 AM IST
Pavan महेंद्र तिवारी
महेंद्र तिवारी Published by: Pavan Updated Thu, 02 Apr 2026 08:23 AM IST
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सार
राजोरी, कुपवाड़ा और श्रीनगर के हब्बाकदल के मंदिरों में गूंजती घंटियां उन दरारों पर मरहम की तरह हैं, जो 1990 के दशक में गहरी हो गई थीं।
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Three bright visions of hope, ringing of bells in temples of Habbakdal, a balm for the deep rifts of the 1990s
हब्बाकदल पुल - फोटो : ANI

विस्तार

कभी-कभी इतिहास शोर के साथ नहीं, बल्कि बहुत धीमे और लगभग दबे पांव लौटता है। जम्मू-कश्मीर की वादियों में इन दिनों जो घट रहा है, वह किसी राजनीतिक घोषणा से अधिक गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक हलचल का संकेत देता है। यह बदलाव आंकड़ों में नहीं, बल्कि भावनाओं में दर्ज हो रहा है और इसकी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति हाल ही में नवरात्र और रामनवमी के दौरान सामने आए तीन दृश्यों में देखने को मिली।


पहला दृश्य राजोरी जिले के थन्नामंडी का है। यहां देवी ढाका मंदिर में सात दशक बाद फिर से सत्संग, जागरण और हवन हुआ। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग जुटे। आजादी के समय थन्नामंडी से अल्पसंख्यक हिंदू पलायन कर जम्मू या राजोरी चले गए थे। तब से इस मंदिर की रौनक गायब थी। हालात भरोसेमंद हुए, तो इस नवरात्र लोग पूजा के लिए वापस लाैटे। मंदिर में अखंड ज्योति जली। भजनों की गूंज, पूजा-अर्चना के बीच सबसे भावुक दृश्य तब दिखा, जब स्थानीय महिलाएं सत्संग में झूम उठीं। सत्संग का आयोजन करने वाले संगीत गंडोत्रा कहते हैं कि दशकों बाद यह दस्तक पुनर्जागरण का प्रतीक है।


दूसरा दृश्य कुपवाड़ा के गुंड गुशी गांव का है, जहां चार दशक बाद कश्मीरी पंडित अपने पैतृक स्थान पर मां शारदा के मंदिर में सामूहिक पूजा-अर्चना के लिए लौटे थे। पारंपरिक नव वर्ष के रूप में मनाए जाने वाले नवरेह की यह सुबह इनके लिए अनेक स्मृतियों का क्षण बन गई। गुंड गुशी गांव कश्मीर की खूबसूरत घाटी की गहराई के बीच बसा हुआ है। इस गांव में जब ‘मां शारदे की जय’ की गूंज पहाड़ों में फैली, तो उसमें खुशी के साथ एक अनकही कसक भी थी। गुंड गुशी जैसे शांत गांव में यह आयोजन बताता है कि कश्मीर की आत्मा अब भी अपनी जड़ों को पहचानती है। चार दशक तक विस्थापन का बोझ ढोते लोगों का अपनी जड़ों की ओर एक दिन के लिए ही सही, लाैटने का साहस जुटाना वाकई बड़े सुकून की बात है। शारदा स्थापना ट्रस्ट के उपाध्यक्ष अमित भट्ट बताते हैं कि पिछले साल यहां मूर्ति की स्थापना की गई थी। नवरेह और नवरात्र मनाने के लिए हम पहली बार आए हैं।

तीसरा और सबसे प्रभावशाली नजारा श्रीनगर के हब्बाकदल में देखने को मिला, जहां 36 वर्षों बाद रघुनाथ मंदिर के कपाट खुले। यहां हवन हुआ और रामनवमी का उत्सव मना। लंबे प्रयासों के बाद इस मंदिर का पुनरुद्धार हुआ है। इस आयोजन को इसलिए ऐतिहासिक कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें कश्मीरी पंडितों के साथ स्थानीय मुस्लिम समुदाय भी शामिल हुआ। ये कश्मीरी मुस्लिम अपने हिंदू साथियों से मिलने और उनका हालचाल जानने पहुंचे थे। इसे कश्मीरियत के उस स्वर के रूप में देख सकते हैं, जो वर्षों से दबा हुआ था। कई लोग इन दृश्यों को उन दरारों पर मरहम की तरह देखते हैं, जो 1990 के दशक में गहरी हो गई थीं। इन साहस भरे उदाहरणों के बीच श्रीनगर में होली का उत्सव और रामनवमी के भव्य आयोजन की निरंतरता सोने पर सुहागा जैसा है।

थन्नामंडी, गुंड गुशी और हब्बाकदल-ये तीनों जगहें भले ही भौगोलिक रूप से दूर हों, लेकिन इनकी कहानियों में एक गहरा संबंध है। यह संबंध है लौटते विश्वास का। धीरे-धीरे बदलते माहौल का। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसके पीछे अनुच्छेद-370 व 35ए की विदाई तथा उसके साथ कई वर्षों की कोशिश है। सुरक्षा की स्थिति में सुधार, प्रशासन के अनवरत प्रयास व अनेक संगठनों की कोशिशों से लोगों के मन में भरोसा लौटता नजर आ रहा है। यही भरोसा सबसे बड़ी बात है। 

हालांकि, यह मान लेना जल्दबाजी होगा कि सब कुछ सामान्य हो गया है। इन घटनाओं में जो खुशी दिखाई देती है, उसके पीछे अब भी कई अनकहे सवाल हैं। ये सवाल हैं-क्या इन सभी मंदिरों की घंटियां नियमित गूंजेंगी? क्या जैसा माहौल पहले दिन दिखा, वैसा ही नियमित बना रह सकेगा? यह वापसी क्या जल्द स्थायी हो पाएगी? क्या विस्थापित समुदाय पूरी तरह से अपने-अपने घर लौट पाएंगे? इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन वर्तमान इतना तो जरूर बताता है कि शुरुआत हो चुकी है और हर बड़ी शुरुआत ऐसे ही छोटे-छोटे कदमों से ही होती है। एक मंदिर में जली ज्योति, एक गांव में गूंजी जयकार और एक शहर में खुला दरवाजा बेहतर कल का संकेत तो कर ही रहा है।

एक और अहम बात ध्यान रखने की है। जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग हिस्सों से सुर्खियां व चर्चा का विषय बने ये घटनाक्रम इसलिए विशेष हैं, क्योंकि पहलगाम जैसी दुस्साहसिक आतंकी वारदात व उसकी प्रतिक्रिया में ऑपरेशन सिंदूर के एक साल के भीतर ही लोगों ने यह साहस दिखाया है।
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