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समाधान के साथ खड़े गांधी: अपने और समाज के अस्तित्व की रक्षा के लिए बचाकर रखनी होगी विरासत
Wed, 02 Oct 2019 02:11 AM IST
रामचंद्र राही
रामचंद्र राही
रामचंद्र राही
Published by: रामचंद्र राही
Updated Wed, 02 Oct 2019 02:11 AM IST
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हम इतिहास के उस मोड़ पर खड़े हैं, जहां गांधी को अस्वीकार करना असंभव-सा और स्वीकार करना अत्यंत कठिन है। कारण यह है कि गांधी अपने प्रारंभिक जीवन से लेकर अंतिम सांस तक संघर्षों में जिए। उनका संघर्ष अपने आप से शुरू होता था और उसका विस्तार वैश्विक स्तर तक होता जा रहा था। उनकी पहली लड़ाई थी सत्य की बुनियादी निष्ठा को अपने अंदर स्थापित करने की।
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गांधी कोई बचपन से ही अद्वितीय अवतार नहीं थे। वह भी मानवीय कमजोरियों के शिकार थे, लेकिन खूबी यह रही कि जब उन्हें अपनी कमजोरी महसूस हुई, तो उसे अपनी भूल के रूप में स्वीकार करने में उन्होंने क्षण भर भी संकोच नहीं किया और फिर उसे कभी दोहराया नहीं। उनके भीतर सत्य को लेकर जो आग्रह पैदा हुआ, वह बाद में उनके कार्यकलापों में भी दाखिल होता गया।
गांधी की जो स्वराज की लड़ाई थी, वह नए जीवन-दर्शन की, एक नए विश्व रचना की लड़ाई की शुरुआत थी। अगर हमने आजादी मिलने के बाद गांधी के बताए विचार के अनुसार देश के पुनर्निर्माण का काम किया होता, तो आज देश की स्थिति कुछ और होती। लेकिन हमने गांधी को भुला दिया। उनके बताए तरीके शायद हमें गए-गुजरे जमाने के लगे।
गांधी ने अपने दर्शन के जरिये पूरी दुनिया को मानवीय मूल्यों पर आधारित एक सहयोगी-सहकारी समाज खड़ा करने का सुझाव दिया। आज जो हो रहा है, उसमें समस्याओं का हल नहीं है। कारों का उत्पादन घट गया, तो कार बनाने वाली कंपनियों को राहत पैकेज देकर आप देश की बेरोजगारी दूर नहीं कर सकते। इसके लिए आपको पूरी तरह से बुनियादी नीतिगत परिवर्तन करना पड़ेगा।
भारत श्रम शक्ति समृद्ध देश है, लेकिन उसके पास पर्याप्त पूंजी नहीं है। हमारे पास जो श्रम शक्ति है, उसे पूंजी निर्माण करने में तब्दील क्यों नहीं कर सकते? जब तक हम यह नहीं करेंगे, हमारे सवाल हल नहीं हो पाएंगे। और जब तक समाधान नहीं मिलेगा, तो तलाश जारी रहेगी। जब तलाश जारी रहेगी, तो गांधी बार-बार हमारे सामने अपने समाधान के साथ खड़े रहेंगे।
विकास की जिस होड़ में हम शामिल हैं, उसमें जिस तरह नागरिक अधिकारों का हनन हुआ है, पर्यावरण का संकट बढ़ा है, जिस तरह मनुष्य को यंत्र के रूप में तब्दील कर दिया गया है, उससे मानवीय विकास की संभावना संभव नहीं दिखाई देती है। आज की चुनौतियों का जवाब गांधी ही प्रस्तुत करते हैं, इसलिए अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए हमें गांधी की विरासत को बचाकर रखना ही होगा।
गांधी ने नए भारत के निर्माण का जो सपना देखा था, वह भारत के गांवों के पुनर्निर्माण की बुनियाद पर आधारित था। उन्होंने एक ग्राम गणराज्य के रूप में स्वतंत्र भारत के राष्ट्र की कल्पना की थी। उस राष्ट्र को अंततः अपने पड़ोसियों से होते हुए वैश्विक स्तर पर परस्पर सहयोगी, सबके मित्र के रूप में एक मानवीय समाज के रूप में विकसित होना था।
उन्होंने उत्पादन का जो मॉडल दिया, उसे खादी ग्रामोद्योग से समझ सकते हैं। मनुष्य जहां रहता है, वहां के प्रकृति प्रदत्त संसाधनों, श्रम शक्ति, मानवीय कुशलता तथा परस्पर सहयोग से जो उत्पादन हो सकता है, उसी से वह अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी कर सके, इसका आधार है खादी ग्रामोद्योग। अगर हमने यह रास्ता अपनाया होता तो समाज का स्वरूप ही कुछ और होता।
इसलिए मेरा मानना है कि गांधी केवल अंग्रेजों से संघर्ष करने के कारण नहीं, बल्कि अपने शांतिमय, शोषण मुक्त मानवीय समाज की रचना के दर्शन के कारण महान हैं। सिर्फ अंग्रेजों से संघर्ष करने के लिए उन्हें याद करना उनके अवदान को संकीर्ण करना है। आज दुनिया के सामने हिंसा, प्राकृतिक विनाश, बेरोजगारी, शुद्ध जल, वायु और मिट्टी का संकट है।
इन संकटों के घिरा आदमी जब समाधान की तलाश करता है, तो उसके सामने गांधी अपने विचारों के साथ खड़े दिखते हैं। गांधी ने पूरी मानव सभ्यता के सामने एक नया जीवन-दर्शन रखा था। आज की व्यवस्थाएं अगर इन संकटों का समाधान देतीं, तो शायद गांधी की जरूरत नहीं होती, लेकिन ऐसा नहीं है, इसलिए गांधी आज भी हमारे लिए और दुनिया भर के लिए प्रासंगिक हैं।
दुनिया में जहां भी कमजोर, शोषित लोग मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे हैं, वहां गांधी का तरीका ही नजर आता है। अभी जलवायु शिखर सम्मेलन में स्वीडन की सोलह साल की लड़की ग्रेटा थनबर्ग ने दुनिया भर के नेताओं को चुनौती दी और कहा कि ‘आपकी हिम्मत कैसे हुई कि आपने मेरा बचपन छीन लिया। आपने मेरे जीवन का सपना छीन लिया।’ उसकी आवाज में भी गांधी की ही आवाज गूंज रही है।
जो संकट बढ़ते दिखाई दे रहे हैं, उनके समाधान का रास्ता गांधी के बताए रचनात्मक कार्यों में से ही निकलता है। आज जो हमारे सामने चिंताएं हैं, उसमें एक यह है कि हमारा लोकतंत्र भी खतरे में है। जिस संविधान की बुनियाद पर इसे चलाया जाना था, उसकी अवहेलना हो रही है। संविधान की शपथ खाने वाले भूल रहे हैं कि संविधान की व्यवस्था ने ही उन्हें देश को चलाने का अवसर दिया है।
गांधी ने केवल बाहरी स्वच्छता की बात नहीं कही थी, उन्होंने आंतरिक स्वच्छता की भी बात कही थी और आंतरिक शुद्धता को ज्यादा महत्व दिया था। गांधी का प्रतीक झाड़ू नहीं है, बल्कि सत्याग्रह है, सत्यनिष्ठा है, अहिंसा है। भारतीय समाज में गंदगी करने वाले को श्रेष्ठ और गंदगी साफ करने वाले को अछूत समझा जाता था।
इसी अन्यायी व्यवस्था को गांधी ने चुनौती देते हुए कहा कि अस्पृश्यता भारत के माथे का कलंक है, जिसे मिटाना है और इसके लिए उन्होंने पूरा संघर्ष किया। गांधी को अप्रासंगिक बताने वाले वे लोग हैं, जो अपनी कल्पना का देश बनाने में गांधी को बाधक मानते हैं। मैं मानता हूं कि दुनिया भर में गांधी अब भी संभावना हैं। गांधी मानवता के भविष्य हैं, इसलिए वह हमेशा जरूरी बने रहेंगे।
(लेखक प्रसिद्ध गांधीवादी चिंतक हैं)