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Migratory Bird: कहां गए सांभर झील के प्रवासी पक्षी, लम्पी रोग ने रोकी उड़ान
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प्रवासी पक्षी (सांकेतिक तस्वीर)।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
इस बार भारत में विदेशी पक्षियों के सबसे बड़े ठिकाने सांभर झील में आने वाले मेहमान पक्षियों की संख्या करीब आधी रह गई है। शायद कुदरत ने इन बेजुबानों को संभावित खतरे को भांपने की क्षमता दी है, तभी वे मवेशियों में फैले लम्पी रोग के संभावित खतरे के डर से इधर नहीं आए। वैसे भी इस झील के नैसर्गिक स्वरूप से छेड़छाड़ के चलते प्रवासी पक्षियों की संख्या घट गई है। हजारों वर्षों से दीपावली बीतते ही यहां प्रवासी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है।
भारत की सबसे विशाल खारे पानी की झील ‘सांभर’ का विस्तार 190 किलोमीटर और लंबाई 22.5 किलोमीटर है। इसकी अधिकतम गहराई तीन मीटर तक है। अरावली पर्वतमाला की आड़ में स्थित यह झील राजस्थान के तीन जिलों- जयपुर, अजमेर और नागौर तक फैली है। वर्ष 1996 में 5,707.62 वर्ग किलामीटर जल ग्रहण क्षेत्र वाली यह झील वर्ष 2014 में 4,700 वर्ग किलामीटर में सिमट गई। चूंकि भारत में नमक के कुल उत्पादन का लगभग नौ फीसदी (1,96,000 टन) यहां से निकाला जाता है, इसलिए नमक-माफिया भी यहां की जमीन पर कब्जा करते रहते हैं। कोशिश की जाती है कि इस झील के पानी में खारेपन का संतुलन बना रहे।
इस बार राजस्थान में लम्पी रोग के चलते अनुमानतः कोई 72 हजार मवेशी मारे गए हैं। एक तो इस रोग को लेकर भ्रांतियां हैं, दूसरा संक्रामक रोग होने के चलते इस बीमारी से मरे मवेशियों को लोग लावारिस छोड़ देते हैं, जो विदेशी पक्षियों के लिए जानलेवा हैं। इससे पहले जब सांभर झील में पक्षियों की सामूहिक मौत हुई, उसका बड़ा कारण एवियन बॉटुलिज्म नामक रोग रहा है, जो मूलतः मांसाहारी जानवरों में होता है। सांभर झील के आसपास बड़ी संख्या में लम्पी रोग की चपेट में आकर मवेशी मरे हैं, जिनके शव लावारिस पड़े हैं। न तो पशु चिकित्सा विभाग ने इसकी कोई तैयारी की है और न ही वन विभाग ने इन प्रवासी पक्षियों के संरक्षण हेतु कोई इंतजाम किया है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सांभर झील के जल में लगातार प्रदूषण बढ़ने से भी यह पक्षियों के लिए सुरक्षित नहीं रहा है। यहां पर पक्षियों की मौत का एक कारण ‘हाइपर नैट्रिमिया’ भी रहा है। नमकीन जल में सोडियम की मात्रा ज्यादा होने पर पक्षियों के तंत्रिका तंत्र पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। वे खाना-पीना छोड़ देते हैं और उनके पंख व पैर में लकवा मार जाता है। कमजोरी के चलते उनके प्राण निकल जाते हैं। अभी तक ऐसा ही हुआ कि पहले 'हाइपर नैट्रिमिया' के कारण उनकी मौत हुई, फिर उनमें एवियन बॉटुलिज्म के जीवाणु विकसित हुए और ऐसे मरे पक्षियों को जब अन्य पक्षियों ने खाया, तो बड़ी संख्या में उनकी मौत हुई। लेकिन इस बार खतरा कई गुना भयानक है।
वर्ष 2010 में भी लगभग इसी तरह हुई पक्षियों की मौत के बाद गठित कपूर समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों पर अमल नहीं हुआ। दो साल पहले भी हाईकोर्ट ने सांभर झील को रामसर साइट घोषित किए जाने के बाद झील को अतिक्रमण से बचाने के उपायों की जानकारी मांगी। सरकार ने आधी-अधूरी जानकारी दी और झील का पानी खराब होता चला गया। सांभर झील के पर्यावरण के साथ लंबे समय से की जा रही छेड़छाड़ भी पक्षियों के यहां से मुंह मोड़ने का बड़ा कारण है।
यहां जिन कंपनियों को नमक निकालने के ठेके दिए गए हैं, वे बगैर किसी मानक की परवाह किए झील के किनारे दूर तक खारा पानी इकट्ठा करने के लिए खाई बना रही हैं और परिशोधन के बाद गंदगी को इसी में डाल रही हैं। चूंकि इस झील में नदियों से मीठा पानी आने और अतिरिक्त खारे पानी को बाहर निकालने के मार्ग अतिक्रमित हो गए हैं, इसलिए झील में खारेपन का स्तर संतुलित नहीं रह गया है।
पर्यावरण के प्रति बेहद संवेदनशील पक्षी अपने प्राकृतिक पर्यावास में अत्यधिक मानव दखल, प्रदूषण, भोजन के अभाव से भी परेशान हैं। ध्यान रहे कि हमारे यहां साल-दर-साल प्रवासी पक्षियों की संख्या घटती जा रही है। प्रकृति संतुलन और जीवन-चक्र में प्रवासी पक्षियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।