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यह चादर मैली नहीं होगी!

Sat, 18 May 2013 09:43 PM IST
देव प्रकाश चौधरी
देव प्रकाश चौधरी Updated Sat, 18 May 2013 09:43 PM IST
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this sheet will not be unhygienic

मैकबेथ का खूनी अंत, ब्रेख्त की राजनीति, सुरजीत पातर की कविताएं और बच्चों की दर्जनों कहानियां इन दिनों पंजाब के गांवों की हवाओं में सांस ले रही हैं।

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कटते गेहूं और फिर धान के लिए तैयार होते खेतों के लिए किसानों और मजदूरों की आपसी बतकही के बीच लोगों को अचानक डफली की ताल के साथ ब्रेख्त के गीत सुनाई पड़ते हैं -"शार्क से तो मैं बच आया/शेरों को मैंने छकाया/मुझे जिन्होंने हड़प लिया/ वे तो खटमल थे।"
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तो क्या पंजाब के गांव किसी क्रांति की तैयारी कर रहे हैं? जवाब देते हैं, मशहूर पंजाबी अभिनेता और रंगकर्मी सेम्युअल जॉन-"क्रांति तो बड़ा शब्द है। हम लोग उम्मीद पर टिके हैं। यह रंगमंच से खुद को बदलने का एक ईमानदार प्रयास है। पहले खुद, फिर गांव और समाज। उसके बाद राज्य और देश की बारी। इसके लिए रंगमंच को घर-घर जाना होगा या फिर लोगों को रंगमंच के पास आना होगा।
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ये दंभ नहीं, साथ जुड़े उन लोगों का विश्वास है, जो समानता की चादर पर बैठना चाहते हैं।" सेम्युअल जॉन की इस रंगयात्रा में चादर एक आसमान की तरह उनके साथ रही है। बिछ गई तो बैठने की जगह बन गई, तन गई तो मंच बन गई, फैल गई तो आने वाले कल के लिए उम्मीद बन गई। लेकिन पटियाला से रंगमंच में ग्रेजुएट जॉन के लिए जब मुंबई से बार-बार संदेशा आता हो..तो फिर वह संगरूर इलाके के ठेठ गांवों में क्या कर रहे हैं?

शायद पिछले 15 सालों में सेम्युअल ने कई बार ऐसे सवालों के जवाब दिए हैं। चेहरे पर एक मुस्कान तैरती है,"थियेटर की पढ़ाई के बाद मुंबई गया था। पहली फिल्म मिली ‘ढूंढते रह जाओगे'। काम अच्छा किया था तो और भी ऑफर मिले। वहां मैं गोरेगांव ईस्ट में रहता था। सामने एक झोपड़पट्टी थी। मुझे लगा कि यहां रहने वाले बच्चों के साथ कुछ करना चाहिए।

साधन नहीं के बराबर थे, फिर भी मैंने उन छोटे घरों के बच्चों को साथ लेकर थियेटर करना शुरू कर दिया। फिर गांव की याद आई, वापस आ गया। अब यहां गांववालों के साथ रंगमंच को जोड़कर कुछ नया कर रहा हूं। " सेम्युअल मुंबई जाना नहीं चाहते तो मुंबई को ही यहां आना पड़ता है। पंजाबी फिल्मों को बार-बार जॉन की जरूरत पड़ती है।

कुछ दिन पहले ही आई उनकी फिल्म ‘अनहे गोरे दा दान’ ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसा बटोरी है और कई पुरस्कार जीते हैं। इसके पहले आई मिका की फिल्म ‘माटी’ और राजीव शर्मा की फिल्म ‘आतुखोजी’ और मनदीप की फिल्म ‘साडा हक’ के लिए भी जॉन को याद किया जाता है। लेकिन जॉन की यादों में तो अब सिर्फ लैहरागागा गांव बसा हुआ है, जहां वह अपने रंगमंच ‘पीपुल थियेटर’ के साथ जीते हैं और जीना चाहते हैं।

संगरूर जिले के इस बेहद पिछड़े गांव में जॉन ने एक ओपन थियेटर की भी स्थापना की है, जिसमें लगभग 400 लोग एक साथ बैठकर रंगमंच का आनंद लेते हैं। सेम्युअल कहते हैं “असली आनंद तो तब है, जब लोग जाति के भेदभाव से ऊपर उठकर जीएं और लोगों को जीने दें।

पहली बार जब मैंने समानता की बात की थी तो मेरे पास कुछ कॉमरेड आए थे और मुझे एक किस्म से लगभग दबाव देते हुए समझाया था कि यह जाति-वाति का चक्कर छोड़ो और मुंबई जाकर कैरियर बनाओ। मैं उनके चक्कर में नहीं आया और मुझे संतोष है कि आज इलाके के छोटे किसान, गरीब और अनपढ़ लोग, छोटे स्कूलों के बच्चे और ईमानदारी से रोजी-रोटी कमा रहे सैकड़ों लोग मेरे साथ हैं और रंगमंच के जरिए समाज को बदलने का जो सपना देखा है, उसे सच करने में जुटे हैं।''


पंजाबी पोशाक में एक आम किसान की तरह नजर आने वाले जॉन को देख-सुनकर यकीन करना मुश्किल है कि इस शख्स को चाहने वाले दुनिया के कई मुल्कों में हैं। साझा चूल्हे की तरह साझा संस्कृति की बात करने वाले जॉन अक्सर सुबह स्कूलों के चक्कर लगाते हैं, दोपहर खेतों में बिताते हैं और शाम को मजदूर बस्तियो में जाते हैं। मंच पर कोई खास साज-सज्जा नहीं। पहले कोई गीत और फिर बुलंद आवाज के सहारे नाटक शुरू।

अभिनेता भी वे, जो थोड़ी देर पहले खेतों में कुदाल चला कर आए हैं, या फिर वह महिला, जो नाटक के तुरंत बाद गोबर के उपले इकट्ठा करने चल देगी। 15 मिनट में नाटक की तैयारी पूरी और फिर आधे घंटे तक पूरा वातावरण मंत्रमुग्ध होकर सुनता रहता है। नाटक के बाद जॉन के दल के लोग चादर फैलाते हैं, लोग उम्मीदों की मुट्ठी से कहीं ज्यादा अनाज उसमें डाल देते हैं। लोगों की यही उम्मीद समानता की इस चादर को मैली होने से बचाती रही है।

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