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वह भविष्यवाणी आज भी रहस्य है
कैलाश वाजपेयी
Updated Sun, 06 Apr 2014 12:24 AM IST
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बर्लिन में वहां के सांस्कृतिक मंत्रालय ने सौभाग्य से हमें जो दुभाषिनी दी, वह वहां के विश्वविद्यालय में जर्मन साहित्य और संस्कृति पर शोध कर रही थी। उसका नाम था इंगे। इंगे का अपनी मातृभाषा के ही साथ अंग्रेजी पर भी अधिकार था। दूसरे महायुद्ध के बाद बर्लिन दो टुकड़ों में बंट गया था। हमारे पास श्वेत-पारपत्र था इसलिए इंगे ने कहा- चलिए आपको बर्लिन की दीवार के उस पार का बर्लिन पहले दिखाया जाए।
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उस पार का बर्लिन-विपन्न और उदास था। वहां के लोग युद्ध और अपनी तबाही की कहानी कहते-कहते रो पड़ते थे। शाम को डॉ लोथार लूत्से के घर पर चाय थी। लूत्से क्योंकि पांच वर्ष तक दिल्ली में मैक्समुलर केंद्र के डायरेक्टर थे और आधुनिक हिंदी कविता के अच्छे जानकार भी, इसलिए उनसे पुराना परिचय था। बर्लिन में डॉ.लूत्से ने हमें वहां के एक-दो नए कवियों से मिलवाया। अगले दिन इंगे ने हिटलर की मृत्यु का विवरण दिया।
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कहा, 'जब बर्लिन पर गोलाबारी हो रही थी तब हिटलर बंकर के भीतर अपनी सहेली ईवाब्रान के साथ था। हमें याद आया कि ‘लाइफ’ पत्रिका ने वर्षों पूर्व ईवाब्रान का एक चित्र भी हिटलर के साथ छापा था। बहुत लंबी छरहरी हंसती आंखों वाली ईवा ने हिटलर जैसे तानाशाह को क्यों चाहा?
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हमारे प्रश्न पर विदुषी इंगे ने कहा, 'कैलाश! प्रेम के संबंध में कुछ न कहकर मैं सिर्फ इतना भर कहूंगी कि दोनों ने दोनों को संकट की उस घड़ी में मुक्त किया। कहा तो यह भी जाता है कि हिटलर दुनिया का सबसे कोमल वाद्य ‘वायलिन’ सीखकर प्रसिद्ध होना चाहता था। मगर अपने शिक्षक द्वारा किए गए तीखे कटाक्ष से विक्षुब्ध होकर वह ठीक उल्टी दिशा में चल पड़ा और वह भी शायद इसलिए कि उसने आगे के वर्षों में नीत्से द्वारा लिखित पुस्तक ‘विल टु पावर’ पढ़ ली थी। तुम्हें शायद पता न हो सन् 1933 में जब सत्ता हिटलर के हाथ में आई उन दिनों में यहां जर्मनी में ज्योतिर्विद्या खासी लोकप्रिय थी। मगर हिटलर के आते ही, ऐसे कई पत्र बंद कर दिए गए। फिर भी स्विट्जरलैंड के ब्लैक फॉरेस्ट में रहने वाला एक भविष्यवक्ता जिसका नाम क्राफ्ट था, ने बर्लिन में रहते हुए एक भविष्यवाणी की कि म्यूनिख के बियर सैलार में नवंबर के दूसरे सप्ताह में हिटलर पर आक्रमण होगा। संयोगवश उसी सप्ताह हिटलर वहीं थे, लेकिन उसकी हत्या के लिए फटने वाले बम से पहले ही हिटलर को वहां से निकल आना पड़ा, बम देर से फटा। हिटलर को जब क्राफ्ट के इस वक्तव्य की खबर मिली तो उसने यह पता लगाने की कोशिश की कि कार्ल अर्नेस्ट क्राफ्ट कहीं किसी विरोधी दल का तो सदस्य नहीं। उसे हिटलर ने गिरफ्तार कर लिया।
इस बीच पता नहीं किन कारणों से हंगरी का एक ज्योतिर्विद्याविद् लुइ दे वोह्ल जो क्राफ्ट का भी मित्र था, लंदन के सत्ताधीशों के पंजों में जा फंसा। इंगे ने बताया कि गोएबल्स को क्राफ्ट की प्रतिभा पर भरोसा हुआ। उसने बर्लिन में कैद क्राफ्ट से संपर्क बनाए रखा। उसने बताया कि हिटलर युद्ध छेड़कर रहेगा। जैसा कि हुआ सन् 1939 में हिटलर ने युद्धं देहि की घोषणा कर दी। क्राफ्ट ने बताया कि शुरू के चार वर्षों में हिटलर की तूती बोलने लगेगी। लंदन में बैठा चर्चिल जो ज्यादा बड़ा कूटनीतिज्ञ था। उसने लुई दे वोह्ल को सुझाया कि किसी तरह हिटलर के विश्वासपात्र गोएबल्स तक यह हवा फैलाओ कि वह अब इस स्थिति में है कि अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए लेनिनग्राद तक जा सकता है। यह खबर छनकर हिटलर के पास पहुंची। गोएबल्स ने पहले क्राफ्ट से पूछा- क्राफ्ट ने इस प्रश्न के उत्तर के लिए समय मांगा। इस धर्मसंकट में हाम्बुर्ग में रह रहा एक अन्य भविष्यवक्ता वुल्फ जो भारतीय ज्योर्तिविद्या और पाश्चात्य दोनों को मिलाकर भाग्य पढ़ता था और जिसका जिक्र, ब्रितानी इतिहासकार हयूज ट्रेवर रोपर ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ हिटलर’ में भी किया है, से भी यही सवाल किया गया।
इंगे ने आगे कहा,' यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि क्राफ्ट या वुल्फ दोनों में से किसने कहा था कि स्टालिन जिसका पूरा नाम योसिफ विसारिआनोविच जुगाशविलि है हिटलर के लिए महाकाल सिद्ध होगा।'