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यह राहुल की कांग्रेस है
एम के वेणु
Updated Mon, 17 Aug 2015 07:36 PM IST
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हाल के दिनों में संसद में कांग्रेस के रणनीतिक दांव-पेच की विभिन्न वर्गों द्वारा आलोचना हुई, जिसमें कुछ प्रमुख व्यावसायिक हस्तियों का वह ऑनलाइन हस्ताक्षर अभियान भी शामिल था, जिसमें राजनीतिक दलों से अपील की गई थी कि वे संसद के कामकाज को सुचारु रूप से चलने दें। उनका उद्देश्य कांग्रेस पर संसद का बहिष्कार खत्म करने के लिए व्यापक दबाव बनाना था।
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इन उद्योग संघों ने तब ऐसा अभियान चलाने के बारे में नहीं सोचा था, जब विपक्षी दलों ने वर्ष 2011-12 में और फिर वर्ष 2013 में एक के बाद एक संसद के कई सत्रों को बाधित किया था, और जब अरुण जेटली ने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि सैद्धांतिक तौर पर भाजपा वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का समर्थन करती है, पर वह यूपीए के साथ सहयोग नहीं करेगी, जिसकी 'राजनीतिक वैधता' समाप्त हो गई है। भाजपा ने तब वह जिद्दी रवैया नरेंद्र मोदी के इशारे पर अपनाया था, जैसे कि अभी कांग्रेस ने राहुल गांधी के इशारे पर यह रुख अपनाया है।
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कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता राहुल गांधी की रणनीति से सहमत नहीं हैं। वे राजनीतिक एवं संसदीय कामकाज में स्थापित मानदंडों का पालन करने के आदी रहे हैं, जो दो बड़े दलों के बीच समझौते के लिए जरूरी हैं। बड़े व्यावसायिक घराने भी इस समझौते में अहम भूमिका निभाते हैं। आप पूछ सकते हैं कि जब भाजपा ने यूपीए-2 के समय निर्ममतापूर्वक आर्थिक कानूनों का रास्ता रोका था, तब इन व्यावसायिक घरानों ने हस्तक्षेप क्यों नहीं किया था।
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खैर, वे कुछ हद तक यूपीए के कल्याणकारी कार्यक्रमों, मसलन, भोजन का अधिकार, भूमि अधिग्रहण से संबंधित प्रस्तावित विधेयकों से दुखी थे। पर लगता है कि उद्योग जगत यूपीए द्वारा अपने पसंदीदा लोगों को स्पेक्ट्रम, कोयला जैसे संसाधनों के आवंटन से भी परेशान था। इसलिए जब यूपीए संसद चलाने में खुद को अक्षम महसूस कर रहा था, तो उद्योग जगत ने उसके पक्ष में आवाज नहीं उठाई। बड़े व्यावसायिक घराने स्पष्ट तौर पर शासन में बदलाव चाहते थे। लेकिन आज वे मोदी से भी कुछ हद तक निराश हैं। मोदी सरकार न तो उद्योग जगत के हित में भूमि अधिग्रहण कानून पारित करा सकी और न ही कल्याणकारी योजनाओं और कानूनों को खत्म कर सकी। तो क्या यह उद्योग जगत के लिए दोहरी मार है?
साफ लगता है कि रणनीतिक स्तर पर संसद के पिछले दो सत्रों से राहुल गांधी के जिद्दी रवैये ने उद्योग जगत को परेशान किया है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण विधेयक पर कांग्रेस ने भारी विजय पाई है। उद्योग जगत अपने हित में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लागू करने के लिए मोदी का समर्थन कर रहा था, जिसने राजग को बार-बार इस अध्यादेश को लागू करने के लिए मजबूर किया। यह राहुल गांधी ही थे, जिन्होंने यह जिद ठान ली कि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून पर कोई समझौता नहीं होगा। कांग्रेस के कुछ पुराने दिग्गज, जो भाजपा और उद्योग जगत के साथ आसान समझौता कर सकते थे, संभवतः भूमि कानून पर समझौता करने के लिए तैयार हो जाते, क्योंकि 'पुरानी कांग्रेस' के काम करने का यही तरीका था। पर राहुल गांधी और उनके करीबी युवा नेताओं ने अपने रुख से एक इंच भी न डिगने का फैसला किया।
कांग्रेस के भीतर उभरा यह नया विभाजन है, जो उतना तीखा भी नहीं है। मानसून सत्र के बीच में कांग्रेस के पुराने दिग्गज सदन में लौटकर बहस और चर्चा में हिस्सा लेने के इच्छुक थे। लेकिन युवा कांग्रेसी नेता तब तक संसद का बहिष्कार करने पर दृढ़ थे, जब तक कि प्रधानमंत्री मोदी ललित मोदी प्रकरण या व्यापम के मुद्दे पर कोई कार्रवाई नहीं करते। सोनिया गांधी भी, जो आम तौर पर पुराने दिग्गजों से सलाह लेती हैं, पूरी तरह युवा नेताओं के साथ खड़ी रहीं। यह लोकसभा में और संसद से बाहर उनकी आक्रामकता से स्पष्ट है।
राहुल के नेतृत्व में युवा कांग्रेसी नेता सत्रावसान से एक दिन पहले चर्चा में हिस्सा लेने के भी संभवतः इच्छुक नहीं थे। वे इसके बजाय पूरी तरह संसद का बहिष्कार करना पसंद करते। लेकिन वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं ने सोनिया गांधी पर संभवतः यह संकेत देने के लिए दबाव बनाया कि कांग्रेस बहस से भाग नहीं रही थी। वास्तव में यह भी एक बड़ा आश्चर्य था कि लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, जिन्होंने पहले आधिकारिक तौर पर स्थगन प्रस्ताव को खारिज कर दिया था, सत्रावसान से एक दिन पहले उसे बहस के लिए स्वीकार कर लिया। इससे लगा कि अंतिम क्षणों में दोनों पक्षों में समझौता हो गया।
राहुल गांधी इस प्रतीकात्मकता से सहमत नहीं थे। उन्हें शायद सोनिया गांधी ने अंतिम समय में चर्चा के लिए मनाया। लेकिन इससे कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ। दोनों तरफ से व्यक्तिगत हमलों के कारण इससे कटुता बढ़ी ही। चर्चा के लिए कांग्रेस के सहमत होने से यह भी नहीं दिखा कि राहुल ने अपना रुख नरम कर लिया है।
कुल मिलाकर, कांग्रेस के पुराने दिग्गज और राहुल गांधी के बीच चला यह नाटक दिलचस्प रहा। संसद में प्रदर्शित कांग्रेस की रणनीति ने स्पष्ट रूप से राहुल के पक्ष में झुकाव दर्शाया। जब तक कांग्रेस राज्यसभा में बहुमत में है, कम से कम तब तक सत्तारूढ़ गठबंधन और मुख्य विपक्षी दल के रिश्तों पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
मात्र 44 सांसदों के साथ कांग्रेस ने भाजपा को उसकी ही रणनीति का स्वाद चखाया। मई, 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद कांग्रेस कोमा की स्थिति में चली गई थी। कांग्रेस नेतृत्व ने सपने में भी नहीं सोचा था कि प्रधानमंत्री एक साल के भीतर इतनी सारी गलतियां करेंगे। बकौल अरुण शौरी, जिन्होंने 2013 में कहा था कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भाजपा के सबसे बेहतर सहयोगी रहे, कांग्रेस को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करना चाहिए, जिन्होंने उसे इतनी जल्दी कोमा से बाहर आने में मदद की।