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यह बासठ का दब्बू भारत नहीं है

Wed, 22 May 2013 09:57 PM IST
तरुण विजय
तरुण विजय Updated Wed, 22 May 2013 09:57 PM IST
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this is not meek india of 1962

चीन के प्रधानमंत्री ली केचियांग भारत की अपनी यात्रा पूरी कर पाकिस्तान गए हैं, जिसे बीजिंग अपना आजमाया हुआ दोस्त बताता है। लेकिन यहां अपने दो औपचारिक भाषणों में ली ने आर्थिक मुद्दों पर ही जोर दिया। लद्दाख में चीनी सैनिकों की घुसपैठ का मामला भारत ने पहले ही दिन दृढ़ता के साथ उठाया था।

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इसी का नतीजा था कि द्विपक्षीय संयुक्त वक्तव्य में भारत यह पंक्ति जुड़वा पाया कि जब तक वार्ता की मेज पर सीमा विवाद का हल नहीं निकलता, तब तक सीमा पर शांति और तनाव रहित वातावरण बनाए रखना आवश्यक होगा। यानी यदि चीन सीमा पर गड़बड़ करेगा, तो वार्ता और व्यापारिक संबंधों पर भी असर होगा।
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पहली बार इस वक्तव्य में मानवाधिकारों की भी बात की गई और भारत ने चीन के साथ व्यापारिक असंतुलन का मुद्दा भी आग्रहपूर्वक उठाया। इसी कारण ली ने कहा कि वह भारतीय वस्तुओं को चीन के बाजार में आने के लिए ज्यादा सुविधा देने को तैयार हैं, ताकि चीन के पक्ष में झुके द्विपक्षीय व्यापार को संतुलित किया जा सके।
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ली के भारत आने से पहले लद्दाख की घटना के कारण भारत में उपजे गुस्से और आक्रोश को चीन ने समझा है। जनता क्रुद्ध रहे, चीन के प्रति अविश्वास का भाव आम भारतीयों में बढ़ता रहे और चीन तथा भारत की सरकारें आपस में सहयोग करती रहें, ऐसा नहीं चल सकता। दिल्ली में किसी भी पार्टी की सरकार हो, वह आम जनता की सर्वव्यापी और एकजुट भावनाओं की अनदेखी नहीं कर सकती। लद्दाख की घटना ने एकजुट भारत का दर्शन कराया। चीन ने समझा कि 2013 का भारत 1962 की तरह का दब्बू नहीं है।

दिल्ली में अपने भाषण में ली ने कहा कि भारत और चीन के बीच आर्थिक सहयोग की तीव्र आवश्यकता है। चीन के साथ हमारे समझौतों में विज्ञान-प्रौद्योगिकी में सहयोग, मीडिया के लोगों के और अधिक संपर्क, कैलाश-मानसरोवर यात्रियों के लिए और बेहतर सुविधाएं तथा दोनों देशों के युवाओं के मेलजोल के बारे में भी समझौते हुए। ली ने भारत के ढांचागत क्षेत्र में निवेश की बात कही।

भारत के ढांचागत क्षेत्र में पहले से ही चीन के 55 अरब डॉलर का निवेश है। चार-पांच वर्ष पूर्व से ही हिमाचल जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में भी चीन को सड़क बनाने के ठेके मिले हैं। मुंबई में ली ने टीसीएस के साथ बातचीत में भारतीय सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को चीन आने का न्योता दिया। सॉफ्टवेयर क्षेत्र में चीन ने बहुत अधिक प्रगति की है, लेकिन अंग्रेजी ज्ञान की कमी पूरी करने के लिए वह भारत की मदद चाहता है।

ली ने इस यात्रा में आर्थिक सहयोग, व्यापारिक विनिमय, दोतरफा व्यापार को सौ अरब डॉलर तक ले जाने की आवश्यकता और दोनों देशों के बीच मित्रता को विश्व के लिए जरूरी बताकर पिछली कड़वाहट दूर करने का प्रयास किया। इन सब  बातों का प्रमाण तो तब मिलेगा, जब जमीनी धरातल पर हम इनका क्रियान्वयन देखेंगे।

पकिस्तान को चीन की परमाणु तकनीक तथा अन्य महत्वपूर्ण सैन्य सहायता भारत के लिए बड़ा सिरदर्द है। चीन पकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर में भी निर्माण कार्यों के बहाने अपने पीएलए सैनिकों को रखे हुए है। ग्वादर, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश में उसकी सामरिक महत्व की उपस्थिति है।

भारत के सामने चीन की घेरेबंदी रोकना, अमेरिका के साथ मित्रतापूर्ण संबंध बनाए रखते हुए पकिस्तान में आईएसआई तथा सेना की भारत-विरोधी शत्रुता को कुंद करना यदि एक बड़ी चुनौती है, तो पकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार के साथ वास्तविक मित्रता के लिए कूटनीतिक प्रयास करना भी उतना ही जरूरी है।


ऐसे में, लद्दाख जैसी घटना दोबारा होती है, तो चीन के साथ व्यापार और अन्य संबंधों में गिरावट आएगी तथा भारतीय सेना चुप नहीं बैठेगी, यह संदेश जाना ही चाहिए। कूटनीतिक रूप से यह संदेश बीजिंग को दिया भी गया है। ली ने इस नए भारत के मन को समझा है, ऐसा लगता है।

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