फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Think about farmers of entire country

देश भर के किसानों की सुध लें

Wed, 08 Oct 2014 07:05 PM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Wed, 08 Oct 2014 07:05 PM IST
विज्ञापन
Think about farmers of entire country

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद आक्रामकता के साथ महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल भाजपा ग्रामीण महाराष्ट्र में अपने लिए जमीन तैयार करने की जुगत में है, जहां परंपरागत तौर पर वह ज्यादा मजबूत नहीं मानी जाती है।

विज्ञापन


इस तथ्य को इंगित करने के लिए कि महाराष्ट्र में हर रोज दस से भी ज्यादा किसान आत्महत्या कर लेते हैं, मोदी सरकारी आंकड़ों का सहारा लेते हैं। साफ है कि मोदी किसानों की आत्महत्या को रोकने में नाकामी के लिए कांग्रेस नेतृत्व वाली तत्कालीन केंद्र और राज्य सरकार को जिम्मेदार बता रहे हैं।
विज्ञापन


मगर लगता है कि मोदी आंकड़ों को अपनी सहूलियत के मुताबिक पेश कर रहे हैं, क्योंकि एनडीए सरकार द्वारा संसद में पेश ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2012 की तुलना में 2013 में किसान आत्महत्या की घटनाओं में कमी आई है।
विज्ञापन
विज्ञापन

गौरतलब है कि 2012 में महाराष्ट्र में 3,786 किसानों ने आत्महत्या की, जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने चुनावी भाषणों में कर रहे हैं। जबकि 2013 में इस संख्या में 20 फीसदी से ज्यादा गिरावट आई थी।

केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री संजीव बलियान द्वारा दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2013 में महाराष्ट्र में 3,146 किसानों ने आत्महत्या की थी। यह संख्या 2012 में किसान आत्महत्या के जितने मामले सामने आए थे, उससे 700 कम है।
इसके बावजूद मोदी ने अपने शब्दों के जादुई असर को बनाए रखने के लिए ही शायद 2012 के आंकड़ों के उपयोग का फैसला किया।

दरअसल वह जानते हैं कि जब कोई कहता है, 'महाराष्ट्र में हर दिन दस से भी ज्यादा किसान आत्महत्या कर लेते हैं', तो इसका असर कुछ अलग ही होता है। चूंकि चुनावी भाषणों में दूसरे पक्ष की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर कहना स्वाभाविक माना जाता है, इसलिए विरोधियों के कामकाज के नकारात्मक विश्लेषण के लिए आंकड़ों के अपनी इच्छानुसार चयन की जरूरत को समझा जा सकता है।

मगर किसानों की आत्महत्या के मुद्दे को महज महाराष्ट्र तक सीमित न रखते हुए सही मायनों में एक राष्ट्रीय समस्या का दर्जा देने के लिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री मोदी पक्षपातपूर्ण शब्दों के आडंबर से ऊपर उठें। अगर लंबी अवधि के आंकड़ों पर नजर डालें, जोकि ज्यादा अर्थपूर्ण भी होगा, तो पता चलता है कि किसानों की आत्महत्या के 60 फीसदी से ज्यादा मामले चार राज्यों, यानी, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ समेत), आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में मिलते हैं।

1995 से 2013 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि इन राज्यों में कर्ज न चुका पाने के चलते और फसल बर्बाद होने व खेती से जुड़ी दूसरी परेशानियों की वजह से तकरीबन डेढ़ लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को याद रखना चाहिए कि इनमें से कम से कम दो राज्य ऐसे हैं, जहां लंबे समय तक भाजपा की सरकार रही है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे समय से भाजपा का शासन है, वहीं इस दौरान कर्नाटक में भी कुछ समय तक भाजपा का शासन रहा है।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर सामान्य आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि 1995 से देश के विभिन्न राज्यों में दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। इसके अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य भी हैं, जहां इस दौरान (1995-2013) हर वर्ष 500 से 1, 000 किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आए। मगर किसानों की दुर्दशा के मुद्दे को लगातार उठाने वाले वाम मोर्चा के नेतागण भी इस मुद्दे पर कभी कुछ नहीं कर सके।

यह जानना भी दिलचस्प है कि एनडीए सरकार द्वारा संसद में पेश किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, गुजरात में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कुछ बढ़ोतरी हुई है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक, 2013 में गुजरात में 582 किसानों ने आत्महत्या की, जबकि 2012 में यह संख्या 564 थी। उल्लेखनीय है कि 2003 के बाद से पूरे दशक भर में 10 फीसदी से ज्यादा की कृषि विकास दर के साथ गुजरात अव्वल बना हुआ है। साफ है कि गुजरात में कृषिगत विकास की जो कहानी काफी चर्चा में रही, वह बड़ी संख्या में अपनी जिंदगी को खत्म कर रहे किसानों के लिए कोई उम्मीद साबित नहीं हो सकी।

दरअसल इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि शासन चाहे कांग्रेस का हो, वाम दलों का, या फिर भाजपा का, कृषि अर्थशास्त्र की संरचनात्मक समस्याओं ने सभी राज्यों को परेशानी में डाला हुआ है। ऐसे में, मोदी का केवल महाराष्ट्र के किसानों की आत्महत्या को मुद्दा बनाना जरा कम ही समझ में आता है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कृषि अर्थव्यवस्था पर ध्यान देने की बात की थी, मगर अब तक उसने किसानों को राहत पहुंचाने के लिए कुछ भी नहीं किया है, खासकर खेती के लिहाज से मुश्किल साबित हुए इस वर्ष में तो यह ज्यादा अफसोस की बात है।


मोदी ने लोकसभा चुनाव के समय वायदा किया था कि किसानों को लागत खर्चे का 50 फीसदी मुनाफा मिलेगा। पांच महीने बीत चुके हैं, इन वायदों को पूरा करने के बारे में कोई बात होती नहीं दिख रही। भाजपा सरकार अब तक सिर्फ एक ही ठोस फैसला ले सकी है और वह है, व्यापार सुगमता पर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) समझौते पर इस आधार पर हस्ताक्षर से इन्कार कि भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा जरूरतों के मद्देनजर कृषि अर्थशास्त्र को आकार देने की पर्याप्त स्वतंत्रता की जरूरत है। यही ठीक समय है, जब सरकार किसानों की बेहतरी और भारत की खाद्य सुरक्षा से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए श्वेत पत्र लेकर आए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed